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अगाध श्रद्धा का केंद्र है सुथना देवी मंदिर
Lakhimpur
Updated Thu, 18 Apr 2013 05:30 AM IST
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तिकुनियां में नेपाली बाबा शंकर गिरि महाराज ने की थी स्थापना
अमर उजाला नेटवर्क
तिकुनियां। मां सुथना देवी मंदिर भारत-नेपाल सीमा पर बसे लाखों लोगों के लिए अथाह श्रद्धा का केंद्र है। मंदिर की स्थापना सन 1948 में नेपाली बाबा शंकर गिरि महाराज ने की थी।
कभी कस्बे के दक्षिण में स्थित घने जंगल चोर-डाकुओं की शरणस्थली हुआ करते थे। नेपाल से आए बाबा शंकर गिरि महाराज यहां दो वर्ष तक रहे, जब चोर-डाकुओं ने परेशान किया तो वह नेपाल चले गए। इस बीच नेपाल में रात को बाबा को स्वप्न में मां शेरावाली के दर्शन हुए। इसके बाद वह नेपाल से तिकुनियां दोबारा आए और एक पाकड़ के पेड़ के नीचे आश्रम बनाकर रहने लगे। शाम के वक्त आश्रम से कुछ दूरी पर जंगल में बाबा को किसी के रोने की आवाज सुनायी दी। बाबा उस स्थान तक गए लेकिन कहीं कुछ दिखायी नहीं दिया। किसान गयादत्त शाह ने उन्हें बताया कि सुथना ग्राम के निकट आदिशक्ति की एक सुंदर प्रतिमा पड़ी है और उसी से रोने की आवाज आ रही है। बाबा वह प्रतिमा उठा लाए और उन्हें स्थापित कर दिया और देवी का नाम सुथना मां रख दिया। बाबा और गयादत्तशाह प्रतिमा की पूजा-अर्चना करने लगे। कुछ समय बाद मां की प्रतिमा ने स्थान बदल दिया, पेड़ के नीचे स्थापित हो गईं। इस अदभुत घटना को सुनकर आसपास के लोग मां की प्रतिमा के दर्शन और पूजा अर्चना के लिए उमड़ पड़े। बाबा शंकर गिरि ने पाकड़ के पेड़ के नीचे ही मंदिर का निर्माण शुरू कर दिया। क्षेत्र के लोगों ने भी भरपूर सहयोग किया। अन्य प्रांतों से आने वाले व्यापारियों और साहूकारों का रुझान भी मां की पूजा के प्रति हुआ। धीरे-धीरे भव्य मंदिर का निर्माण हो गया। वर्ष 1997 में बाबा शंकर गिरि सौ वर्ष की आयु में ब्रह्मलीन हो गए, उनकी समाधि मंदिर में ही बनायी गयी। इससे पूर्व बाबा की सेवा सुथना गांव के दुजई व मुरली अंतिम समय तक की। इसके बाद मंदिर का कार्यभार उनके शिष्य गिरिराज गिरि ने संभाला। गिरिराज गिरि के बाद थानपति बाबा और अब ओंकार गिरि मंदिर की देखभाल कर रहे हैं। हर नवरात्र में यहां शतचंडी महायज्ञ और श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन होता है।
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मंदिर पर हनुमान गढ़ी व्यापारी स्वर्गीय बद्र्री प्रसाद अग्रवाल, शंकर जी का मंदिर स्वर्गीय जगदीश प्रसाद गुप्ता, संतोषी माता का मंदिर विशालचंद शाह, सत्संग भवन का निर्माण परसराम अग्रवाल और मंदिर का प्रवेश द्वार पंकज चचड़ा के अलावा पानी की टंकी का निर्माण अग्रवाल समाज ने करवाया। मंदिर पर हर वर्ष रामलीला और वट-सावित्री पर्व पर विशाल मेला लगता है।
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