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मरीजों के दर्द को अपना बना लेती हैं छंदा पांडे

Lakhimpur Updated Sat, 12 May 2012 12:00 PM IST
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जिले में सेवा की मिसाल कायम की
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लखीमपुर खीरी। आज जब चिकित्सा क्षेत्र में भी व्यवसायिकता पूरी तरह हावी हो चुकी है ऐसे में स्टाफ नर्स छंदा पांडे की सेवा भावना गर्म थपेड़ के बीच ठंडी फुहार सी लोगों को सुकून देती है। वह अपनी सेवा से एक अलग मिसाल कायम कर रही हैं। अधिक धन कमाने की सोंच के आगे मानवीय संवेदनाएं महत्वहीन समझी जाने लगी हैं, पर छंदा पांडे को तो दूसरों का दर्द बांटने से मन की शांति मिलती है।
असहाय, मरीजों का दर्द वह अपना दर्द समझती हैं। इसी भाव के साथ मरीजों की सेवा भी करती हैं। उनका यह सेवा कार्य केवल अस्पताल तक ही सीमित नहीं है वह अस्पताल के बाहर भी मरीजों की सेवा करने पहुंच जाती हैं। मदर टरेसा उनकी आदर्श हैं। वह कहती हैं सेवा की कोई सीमा नहीं। जहां भी मौका मिले सेवा से नहीं चूकना चाहिए।
छंदा पांडे जिला अस्पताल में स्टाफ नर्स के रूप में तैनात हैं। मरीजों की क्षमता के हिसाब से स्टाफ नर्स बहुत कम हैं। नियमत: आठ मरीजों पर एक स्टाफ नर्स होनी चाहिए, लेकिन यहां तो पचास मरीजों की देखभाल एक ही स्टाफ नर्स के जिम्मे है। छंदापांडे पर कार्य का यह दबाव कोई असर नहीं डाल पाता। उन्हें तो जितने अधिक मरीजों की सेवा का अवसर मिले उतनी ही खुशी होती है। यदि अस्पताल में कोई लावारिस मरीज है, तो वह उनकी जिम्म्ेदारी बन जाती है। उसकी देखभाल से लेकर खाना पीना तक की जिम्म्ेदारी वह खुद उठा लेती हैं। उनकी दवा से लेकर खाना और कभी-कभी कपड़ की व्यवस्था भी करती हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों के ऐसे मरीज भी आते हैं, जो पैसों की कमी के चलते बीच में ही इलाज छोड़कर घर जाने लगते हैं। छंदा पांडे को ऐसे मरीजों की जानकारी हो जाए तो न सिर्फ वे उन्हें समझाती हैं, बल्कि उनके लिए पैसों का इंतजाम भी करती हैं। कभी-कभी पैसे जुटाने के लिए उन्हें लोगों से चंदा तक लेना पड़ता है। मरीजों केप्रति उनकी सेवा यहीं तक सीमित नहीं है वे हर महीने कुष्ठ रोगियों को दवा रुई व पट्टियां देने जाती हैं।
लगभग तीन साल पहले एक विक्षिप्त युवती जिसे लोग अस्पताल में लावारिस हालत में छोड़ गए थे। उसके शरीर में घाव थे जिसमें कीड़ पडे़ थे। छंदा पांडे को जैसे ही इसकी खबर लगी वे तत्काल मौके पर पहुंच गईं। उसे भर्ती कराया। उसके घावों की सफाई कर उसकी मरहम पट्टी की। युवती ठीक होकर चली गई। कुछ दिन बाद पता चला कि शहर में ही उसकी सड़क दुर्घटना में मौत हो गई। इसका पता चलने पर उन्होंने लाश ढोने वाले कमरुद्दीन के माध्यम से उसका शव उठवाया और चंदे की व्यवस्था कर तथा शव का अंतिम संस्कार करवाया। सर्दियों में कुष्ठरोगियों को कबंल वितरण व बाढ़पीड़तों को लंच पैकेट वितरण वह प्रत्येक वर्ष करती हैं। इस तरह के कार्य उनकी आदत में शुमार है। वह सेवा के लिए अन्य स्टाफ नर्सों को भी प्रेरित करती हैं।

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