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नोटबंदी के 99 करोड़ पर अभी फैसला नहीं

Sat, 10 Jun 2017 11:44 PM IST
अमित गुप्ता लखीमपुर खीरी।
अमित गुप्ता लखीमपुर खीरी। Updated Sat, 10 Jun 2017 11:44 PM IST
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99 crores of ban on bondage still not decided
fake notes
आरबीआई ने नहीं किया जमा, जिला सहकारी बैंक को प्रतिमाह लाखों बांटना पड़ रहा ब्याज
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गड़बड़ी की शिकायत पर आरबीआई करा रही जांच

नवंबर 2016 में हुई नोटबंदी के बाद जिला सहकारी बैंक (डीसीबी) में जमा कराए गए 500 और 1000 के नोटों को आरबीआई ने अभी जमा नहीं किया है। शाखाओं पर हुई गड़बड़ी की शिकायतों के चलते आरबीआई की टीम अभी जांच कर रही है। 99 करोड़ रुपये डीसीबी का शाखाओं में पड़े हैं। जबकि बैंक को प्रतिमाह लाखों रुपये खाताधारकों को ब्याज देना पड़ रहा है। छह माह बीत चुके हैं, जिसके एवज में करीब 1.38 करोड़ रुपये ब्याज खाताधारकों को देना पड़ा है। आगे भी मामला फाइनल होने में कितना समय लगेगा, जिस पर सस्पेंस बना हुआ है। 
जिले में जिला सहकारी बैंक की 62 शाखाएं संचालित हैं, जिनमें करीब 9.50 लाख खाताधारक जुड़े हैं। इसके अलावा करीब 132 सहकारी समितियां भी डीसीबी से ही संचालित होती हैं। नवंबर में डीसीबी की शाखाओं में 500 और 1000 के नोट जमा हुए तो कुछ शाखाओं में रात को बैंक खोलकर रुपये बदलने की शिकायतें आरबीआई को मिली। इसके बाद आरबीआई ने प्रदेश में सभी सहकारी बैंकों में 500 और 1000 के नोट जमा कराने पर रोक लगा दी थी। इधर कुछ दिनों के अंदर ही डीसीबी की शाखाओं पर करीब 99 करोड़ रुपये जमा कराए गए थे, जिसमें छह शाखाओं में गड़बड़ी की शिकायत हुई थी। खासकर शहर की सांध्य कालीन, रसूलपुर, हसनापुर शाखा में रात को बैंक खोलकर नोट बदलने और एक चालू खाते में 20 लाख रुपये जमा कर रसूखदार के खाते में रुपये ट्रांसफर करने का मामला प्रमुख है। शिकायतों के अलावा अन्य मामलों की जांच आरबीआई की टीम कर रही है।
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फेल हो सकती हैं सहकारी समितियां
डीसीबी की सेहत खराब होने पर बैंक की साख पर बट्टा लगेगा ही, लेकिन सहकारी समितियों के फेल होने का खतरा बना हुआ है। वजह भी यह है कि नाबार्ड ने बैंक में डंप पुराने नोट को आरबीआई में जमा कराने की जिम्मेदारी से इंकार कर दिया है। जबकि डीसीबी को लोन बांटने और आधुनिकीकरण के लिए नाबार्ड ही वित्त पोषण करता है।
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आरबीआई की टीम दूसरी बार शिकायती प्रकरणों की जांच कर रही है। खाताधारकों के लिए चिंता की कोई बात नहीं है। पुराने नोट आरबीआई में जमा नहीं होने से प्रतिमाह ब्याज के रूप में बैंक पर ही अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। निर्णय होने में ज्यादा देरी से डीसीबी के वित्तीय ढांचे को आघात लग सकता है।
- अशोक वर्धन पाठक, मुख्य कार्यपालक अधिकारी/सचिव डीसीबी
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