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Lakhimpur Kheri News: 15 ब्लॉकों में 264 महिलाएं संभाल रहीं ग्रामीण बिजली व्यवस्था की कमान
Mon, 02 Feb 2026 11:03 PM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
Updated Mon, 02 Feb 2026 11:03 PM IST
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ग्रामीण क्षेत्र में अपना काम करती बिजली सखी। स्रोत: बिजली सखी
लखीमपुर खीरी। जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली विभाग और उपभोक्ताओं के बीच सेतु बनकर काम कर रहीं विद्युत सखियां आज खुद आर्थिक तंगी से जूझ रही हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) और उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड के सहयोग से शुरू की गई विद्युत सखी योजना के तहत जिले के 15 ब्लॉकों में 264 स्वयं सहायता समूह की महिलाएं कार्यरत हैं। ये महिलाएं गांव-गांव जाकर बिजली बिल जमा कराने, सरकारी योजनाओं की जानकारी देने, उपभोक्ताओं को जागरूक करने और शिकायतों के समाधान में अहम भूमिका निभा रही हैं।
विद्युत सखियों का कहना है कि वे विभाग के कई ऐसे काम कर रही हैं, जो उनके दायरे से बाहर हैं। फ्यूज उड़ना, तार टूटना, मीटर खराब होना जैसी समस्याओं पर वे पावर हाउस और सबस्टेशन तक जाकर शिकायत दर्ज कराती हैं। इसके बावजूद उन्हें न तो कोई निश्चित मानदेय मिलता है और न ही यात्रा या मोबाइल खर्च के लिए सहायता। उनकी आमदनी केवल प्रति बिल मिलने वाले नाममात्र के कमीशन पर निर्भर है, जो महंगाई के इस दौर में बेहद कम है।
विद्युत सखियों की प्रमुख मांग है कि उन्हें सम्मानजनक मासिक मानदेय दिया जाए और मीटर रीडिंग का कार्य सौंपा जाए। उनका कहना है कि इससे न सिर्फ उनका आर्थिक सशक्तिकरण होगा, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली बिल संग्रहण और व्यवस्था भी अधिक मजबूत हो सकेगी।
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दिनभर गांव-गांव घूमते हैं, लेकिन जो कमीशन मिलता है, उससे आने-जाने का खर्च भी मुश्किल से निकलता है। अगर मानदेय मिल जाए तो परिवार चलाना आसान हो जाए।
- अंजू देवी
कई बार बैंक या तकनीकी कारणों से कमीशन समय पर नहीं मिलता। इससे आर्थिक परेशानी और बढ़ जाती है।
- जीनत
हम उपभोक्ताओं की शिकायतें सुलझाने में मदद करते हैं, लोकल फाल्ट से विभाग को अवगत कराते हैं, फिर भी कोई सुरक्षा या तय वेतन नहीं है।
- सुशीला देवी
अगर मीटर रीडिंग का काम हमें दे दिया जाए तो हमारी आय तय हो सकती है और निजी एजेंसियों पर निर्भरता भी कम होगी।
- मंदहा देवी
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विद्युत सखियों का कहना है कि वे विभाग के कई ऐसे काम कर रही हैं, जो उनके दायरे से बाहर हैं। फ्यूज उड़ना, तार टूटना, मीटर खराब होना जैसी समस्याओं पर वे पावर हाउस और सबस्टेशन तक जाकर शिकायत दर्ज कराती हैं। इसके बावजूद उन्हें न तो कोई निश्चित मानदेय मिलता है और न ही यात्रा या मोबाइल खर्च के लिए सहायता। उनकी आमदनी केवल प्रति बिल मिलने वाले नाममात्र के कमीशन पर निर्भर है, जो महंगाई के इस दौर में बेहद कम है।
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विद्युत सखियों की प्रमुख मांग है कि उन्हें सम्मानजनक मासिक मानदेय दिया जाए और मीटर रीडिंग का कार्य सौंपा जाए। उनका कहना है कि इससे न सिर्फ उनका आर्थिक सशक्तिकरण होगा, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली बिल संग्रहण और व्यवस्था भी अधिक मजबूत हो सकेगी।
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दिनभर गांव-गांव घूमते हैं, लेकिन जो कमीशन मिलता है, उससे आने-जाने का खर्च भी मुश्किल से निकलता है। अगर मानदेय मिल जाए तो परिवार चलाना आसान हो जाए।
- अंजू देवी
कई बार बैंक या तकनीकी कारणों से कमीशन समय पर नहीं मिलता। इससे आर्थिक परेशानी और बढ़ जाती है।
- जीनत
हम उपभोक्ताओं की शिकायतें सुलझाने में मदद करते हैं, लोकल फाल्ट से विभाग को अवगत कराते हैं, फिर भी कोई सुरक्षा या तय वेतन नहीं है।
- सुशीला देवी
अगर मीटर रीडिंग का काम हमें दे दिया जाए तो हमारी आय तय हो सकती है और निजी एजेंसियों पर निर्भरता भी कम होगी।
- मंदहा देवी

ग्रामीण क्षेत्र में अपना काम करती बिजली सखी। स्रोत: बिजली सखी

ग्रामीण क्षेत्र में अपना काम करती बिजली सखी। स्रोत: बिजली सखी

ग्रामीण क्षेत्र में अपना काम करती बिजली सखी। स्रोत: बिजली सखी

ग्रामीण क्षेत्र में अपना काम करती बिजली सखी। स्रोत: बिजली सखी