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कहीं समुचित इलाज के अभाव में तो नहीं गई पुष्पाकली की जान
Updated Sat, 16 Dec 2017 11:32 PM IST
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दुध्ावा
- फोटो : अमर उजाला
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लखीमपुर खीरी।
प्रदेश के इकलौते दुधवा नेशनल पार्क में 31 साल पूर्व आई हथिनी पुष्पाकली की लंबी बीमारी के बाद 11 दिसंबर की सुबह हो गई थी। पार्क की स्वास्थ्य सेवाओं पर नजर डालें तो यह सवाल खड़ा हो जाता है कि आखिर जहां न तो परमानेन्ट वाइल्ड लाइफ डॉक्टर की सुविधा है और न ही स्टाफ, तो ऐसे में पुष्पाकली को भला समुचित इलाज कैसे मिला होगा? वहीं यह आशंका भी है कि यदि पुष्पाकली को समुचित इलाज मिलता तो शायद उसकी जान नहीं जाती। हालांकि दुधवा नेशनल पार्क के उपनिदेशक महावीर कौजलगि कहते हैं कि पुष्पा कली की मौत आयुपूर्ण होने के कारण स्वाभाविक हुई है।
पार्क में पालतू और जंगली जंतुओं के इलाज के लिए पशु अस्पताल की स्थापना की गई है, लेकिन यह विडंबना ही है कि दुधवा नेशनल पार्क की स्थापना के 40 साल बाद भी शासन-प्रशासन द्वारा चिकित्सक की नियुक्त नहीं की गई है और न ही वाइल्ड लाइफ चिकित्सक का पद ही सृजित किया गया, जबकि दुधवा के गैंडा परिवार में 34 सदस्य हैं, जिनमें अक्सर वर्चस्व की लड़ाई में कोई न कोई सदस्य घायल और जख्मी होता रहता है। वहीं सड़क दुर्घटना में अन्य प्रजातियों के वन्य जीव भी घायल होते हैं। वहीं हर दिन कुत्तों आदि के दौड़ाने से करीब 25 से 30 चीतल और पाढ़ा जख्मी होकर इमरजेंसी में लाए जाते हैं।
डॉक्टर और स्टाफ न होने के कारण उनका इलाज नहीं हो पाता। यही हाल दुधवा के सरकारी हाथी परिवार में मौजूद 14 सदस्यों का भी है, जबकि 12 और आने वाले हैं। जंतुओं के इलाज की जरूरतों को देखते हुए वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूटीआई) ने दैनिक वेतन पर पशु चिकित्सक की तैनाती की है, लेकिन एकमात्र डॉक्टर से जंतुओं को समुचित इलाज नहीं मिल पाता। ऐसी स्थिति में दुधवा पार्क में विशेषज्ञ चिकित्सक और स्टाफ की नियुक्ति होनी चाहिए, जो आज तक नहीं हो सकी है।
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वर्तमान में दैनिक वेतन पर डॉ. नेहा सिंघई की तैनाती है, लेकिन गर्भवती होने के कारण वह छुट्टी पर चल रही हैं। इस पर डॉ. ऋतिका माहेश्वरी की अस्थाई नियुक्ति की गई है, जो पशुओं का इलाज कर रही हैं। उनके पास न तो कोई कंपाउंडर है और न ही अन्य स्टाफ व संसाधन ही। सवाल यह उठता है कि यदि दुधवा नेशनल पार्क मुख्यालय के अलावा जंगल के अन्य स्थानों पर जंतुओं के इलाज को जाना पड़े तो उनके पास वाहन तक नहीं है। ऐसे में सलाकापुर में रखी गई पुष्पाकली को नियमित इलाज कैसे मिला होगा? इस सवाल के जवाब का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। फिलहाल, पुष्पाकली की मौत के पीछे कहीं न कहीं स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली भी बड़ा कारण मानी जा रही है।
अस्पताल से दूर सलूकापुर में क्यों रख दी गई थी पुष्पाकली
बाघों को काबू करने वाली जांबाज निडर पुष्पाकली जब बीमार हुई और हालत बिगड़ने लगी तो दुधवा प्रशासन ने उसे अस्पताल से चार किलोमीटर दूर निर्जन सलूकापुर बेस-कैंप में ले जाकर रख दिया। वन्य जीव प्रेमियों का मनाना है कि बीमारी की हालत में लगातार कमजोर हो रही पुष्पाकली को देखकर पर्यटक सवाल किया करते थे, जिनसे बचने के लिये पार्क प्रशासन ने पुष्पाकली को यहां से हटाया था। वन्य जंतु विशेषज्ञ केके मिश्र का मानना है कि पुष्पाकली का दुधवा में ही रखकर इलाज कराया जाता तो वह ठीक हो सकती थी, लेकिन पार्क प्रशासन ने विशेषज्ञ चिकित्सक से इलाज न कराकर उसे निर्जन स्थान पर रख दिया। नतीजतन पुष्पाकली ने चारा खाना भी छोड़ दिया, इसके कारण वह बेहद कमजोर हो गई। नाम न छापने की बात पर कई महावतों ने बताया कि समय रहते यदि दुधवा में रखकर अगर समुचित उपचार विशेषज्ञ डॉक्टर से कराया जाता तो शायद पुष्पाकली की जान बच जाती।
पुष्पाकली की बाकी
रह गईं ये यादें
दुधवा नेशनल पार्क की स्थापना के दस साल बाद वन व वन्य जीवों की सुरक्षा और पर्यटकों को जंगल भ्रमण कराने के लिए पुष्पाकली को 1986 में बाराबंकी से रामचंद्र नामक हाथी व्यापारी से खरीद कर लाया गया था। इसके साथ गंगा, जमुना नामक हथिनियों को भी लाया गया था। इनमें से जमुना की मौत करीब डेढ़ दशक पूर्व हो गई थी, जबकि गंगाकली अभी भी सरकारी सेवा में लगी है। इसके अतिरिक्त पुष्पाकली ने एक नर हाथी को जन्म दिया जो वर्तमान में बटालिक के नाम से मशहूर होकर सरकारी सेवा में रहकर पर्यटकों को जंगल भ्रमण कराने का जिम्मा संभाले हुए है।
दुधवा की पुष्पाकली बहुत ही निडर एवं हिम्मती मानी जाती थी। उसकी हिम्मत व निडरता का अंदाजा इसी बात से लगाता जा सकता है कि जिले अथवा प्रदेश में कही भी जंगल से बाहर आकर बाघ अपना आतंक फैलाता था तो उनको काबू करने वाले अभियान में पुष्पाकली को लगाया जाता था। इसमें 2012 मे पीलीभीत के जंगल से निकला बाघ प्रदेश की राजधानी लखनऊ के किनारे से होकर बाराबंकी के जंगल तक पहुंच गया था। उसे मुख्य वन संरक्षक (वन्य जीव) ने आदमखोर घोषित कर मौत की सजा दी थी, तब दुधवा के तत्कालीन डिप्टी डायरेक्टर पीपी सिंह पुष्पाकली को लेकर बाराबंकी गये थे। कई दिनों तक चले सर्च आपरेशन के बाद पुष्पाकली की मदद से आतंकी बाघ को ट्रंकुलाइज कर दिया। आखिर मे बेहोश हुए बाघ को लखनऊ जू ले जाया गया। इससे पूर्व सन 2010 में बिजनौर तथा 2016 मे मैलानी क्षेत्र के महेशपुर इलाके में आतंक मिटाने वाले बाघों को काबू करने के लिये सर्च ऑपरेशन में भी पुष्पाकली की अहम भूमिका रही थी।
वाइल्ड लाइफ डॉक्टर की तैनाती के प्रयास किए, लेकिन नहीं हुई सुनवाई
वन्य जंतु विशेषज्ञ कृष्ण कुमार मिश्र कहते हैं दुधवा नेशनल पार्क में एक ऐसे अस्पताल और ट्रामा सेन्टर की स्थापना होनी चाहिए, जिसमें वाइल्ड लाइफ डॉक्टर समेत संपूर्ण स्टाफ, संसाधन और वाहन हों। क्योंकि यहां नित्य वन्य जंतु बीमार और घायल होते हैं। साथ ही पार्क की सरकारी सेवा में हाथी और हथिनियों की तैनाती होती है, जिनका इलाज भी जरूरी होता है।
प्रदेश के इकलौते दुधवा नेशनल पार्क में 31 साल पूर्व आई हथिनी पुष्पाकली की लंबी बीमारी के बाद 11 दिसंबर की सुबह हो गई थी। पार्क की स्वास्थ्य सेवाओं पर नजर डालें तो यह सवाल खड़ा हो जाता है कि आखिर जहां न तो परमानेन्ट वाइल्ड लाइफ डॉक्टर की सुविधा है और न ही स्टाफ, तो ऐसे में पुष्पाकली को भला समुचित इलाज कैसे मिला होगा? वहीं यह आशंका भी है कि यदि पुष्पाकली को समुचित इलाज मिलता तो शायद उसकी जान नहीं जाती। हालांकि दुधवा नेशनल पार्क के उपनिदेशक महावीर कौजलगि कहते हैं कि पुष्पा कली की मौत आयुपूर्ण होने के कारण स्वाभाविक हुई है।
पार्क में पालतू और जंगली जंतुओं के इलाज के लिए पशु अस्पताल की स्थापना की गई है, लेकिन यह विडंबना ही है कि दुधवा नेशनल पार्क की स्थापना के 40 साल बाद भी शासन-प्रशासन द्वारा चिकित्सक की नियुक्त नहीं की गई है और न ही वाइल्ड लाइफ चिकित्सक का पद ही सृजित किया गया, जबकि दुधवा के गैंडा परिवार में 34 सदस्य हैं, जिनमें अक्सर वर्चस्व की लड़ाई में कोई न कोई सदस्य घायल और जख्मी होता रहता है। वहीं सड़क दुर्घटना में अन्य प्रजातियों के वन्य जीव भी घायल होते हैं। वहीं हर दिन कुत्तों आदि के दौड़ाने से करीब 25 से 30 चीतल और पाढ़ा जख्मी होकर इमरजेंसी में लाए जाते हैं।
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डॉक्टर और स्टाफ न होने के कारण उनका इलाज नहीं हो पाता। यही हाल दुधवा के सरकारी हाथी परिवार में मौजूद 14 सदस्यों का भी है, जबकि 12 और आने वाले हैं। जंतुओं के इलाज की जरूरतों को देखते हुए वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूटीआई) ने दैनिक वेतन पर पशु चिकित्सक की तैनाती की है, लेकिन एकमात्र डॉक्टर से जंतुओं को समुचित इलाज नहीं मिल पाता। ऐसी स्थिति में दुधवा पार्क में विशेषज्ञ चिकित्सक और स्टाफ की नियुक्ति होनी चाहिए, जो आज तक नहीं हो सकी है।
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वर्तमान में दैनिक वेतन पर डॉ. नेहा सिंघई की तैनाती है, लेकिन गर्भवती होने के कारण वह छुट्टी पर चल रही हैं। इस पर डॉ. ऋतिका माहेश्वरी की अस्थाई नियुक्ति की गई है, जो पशुओं का इलाज कर रही हैं। उनके पास न तो कोई कंपाउंडर है और न ही अन्य स्टाफ व संसाधन ही। सवाल यह उठता है कि यदि दुधवा नेशनल पार्क मुख्यालय के अलावा जंगल के अन्य स्थानों पर जंतुओं के इलाज को जाना पड़े तो उनके पास वाहन तक नहीं है। ऐसे में सलाकापुर में रखी गई पुष्पाकली को नियमित इलाज कैसे मिला होगा? इस सवाल के जवाब का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। फिलहाल, पुष्पाकली की मौत के पीछे कहीं न कहीं स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली भी बड़ा कारण मानी जा रही है।
अस्पताल से दूर सलूकापुर में क्यों रख दी गई थी पुष्पाकली
बाघों को काबू करने वाली जांबाज निडर पुष्पाकली जब बीमार हुई और हालत बिगड़ने लगी तो दुधवा प्रशासन ने उसे अस्पताल से चार किलोमीटर दूर निर्जन सलूकापुर बेस-कैंप में ले जाकर रख दिया। वन्य जीव प्रेमियों का मनाना है कि बीमारी की हालत में लगातार कमजोर हो रही पुष्पाकली को देखकर पर्यटक सवाल किया करते थे, जिनसे बचने के लिये पार्क प्रशासन ने पुष्पाकली को यहां से हटाया था। वन्य जंतु विशेषज्ञ केके मिश्र का मानना है कि पुष्पाकली का दुधवा में ही रखकर इलाज कराया जाता तो वह ठीक हो सकती थी, लेकिन पार्क प्रशासन ने विशेषज्ञ चिकित्सक से इलाज न कराकर उसे निर्जन स्थान पर रख दिया। नतीजतन पुष्पाकली ने चारा खाना भी छोड़ दिया, इसके कारण वह बेहद कमजोर हो गई। नाम न छापने की बात पर कई महावतों ने बताया कि समय रहते यदि दुधवा में रखकर अगर समुचित उपचार विशेषज्ञ डॉक्टर से कराया जाता तो शायद पुष्पाकली की जान बच जाती।
पुष्पाकली की बाकी
रह गईं ये यादें
दुधवा नेशनल पार्क की स्थापना के दस साल बाद वन व वन्य जीवों की सुरक्षा और पर्यटकों को जंगल भ्रमण कराने के लिए पुष्पाकली को 1986 में बाराबंकी से रामचंद्र नामक हाथी व्यापारी से खरीद कर लाया गया था। इसके साथ गंगा, जमुना नामक हथिनियों को भी लाया गया था। इनमें से जमुना की मौत करीब डेढ़ दशक पूर्व हो गई थी, जबकि गंगाकली अभी भी सरकारी सेवा में लगी है। इसके अतिरिक्त पुष्पाकली ने एक नर हाथी को जन्म दिया जो वर्तमान में बटालिक के नाम से मशहूर होकर सरकारी सेवा में रहकर पर्यटकों को जंगल भ्रमण कराने का जिम्मा संभाले हुए है।
दुधवा की पुष्पाकली बहुत ही निडर एवं हिम्मती मानी जाती थी। उसकी हिम्मत व निडरता का अंदाजा इसी बात से लगाता जा सकता है कि जिले अथवा प्रदेश में कही भी जंगल से बाहर आकर बाघ अपना आतंक फैलाता था तो उनको काबू करने वाले अभियान में पुष्पाकली को लगाया जाता था। इसमें 2012 मे पीलीभीत के जंगल से निकला बाघ प्रदेश की राजधानी लखनऊ के किनारे से होकर बाराबंकी के जंगल तक पहुंच गया था। उसे मुख्य वन संरक्षक (वन्य जीव) ने आदमखोर घोषित कर मौत की सजा दी थी, तब दुधवा के तत्कालीन डिप्टी डायरेक्टर पीपी सिंह पुष्पाकली को लेकर बाराबंकी गये थे। कई दिनों तक चले सर्च आपरेशन के बाद पुष्पाकली की मदद से आतंकी बाघ को ट्रंकुलाइज कर दिया। आखिर मे बेहोश हुए बाघ को लखनऊ जू ले जाया गया। इससे पूर्व सन 2010 में बिजनौर तथा 2016 मे मैलानी क्षेत्र के महेशपुर इलाके में आतंक मिटाने वाले बाघों को काबू करने के लिये सर्च ऑपरेशन में भी पुष्पाकली की अहम भूमिका रही थी।
वाइल्ड लाइफ डॉक्टर की तैनाती के प्रयास किए, लेकिन नहीं हुई सुनवाई
वन्य जंतु विशेषज्ञ कृष्ण कुमार मिश्र कहते हैं दुधवा नेशनल पार्क में एक ऐसे अस्पताल और ट्रामा सेन्टर की स्थापना होनी चाहिए, जिसमें वाइल्ड लाइफ डॉक्टर समेत संपूर्ण स्टाफ, संसाधन और वाहन हों। क्योंकि यहां नित्य वन्य जंतु बीमार और घायल होते हैं। साथ ही पार्क की सरकारी सेवा में हाथी और हथिनियों की तैनाती होती है, जिनका इलाज भी जरूरी होता है।