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बाघों को काबू करने वाली दुधवा की हथनी पुष्पाकली की मौत
Updated Mon, 11 Dec 2017 10:51 PM IST
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हाथ्ाी
- फोटो : अमर उजाला
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- सलूकापुर बेस कैंप में तोड़ा दम, अरसे से चल रही थी बीमार
- 86 साल बताई जा रही उम्र, पोस्टमार्टम के बाद किया गया दफन
पलियाकलां।
बाघों को काबू करने वाली दुधवा टाइगर रिजर्व की हथिनी पुष्पाकली की बीमारी के चलते रविवार शाम करीब सात बजे सलूकापुर बेसकैंप में मौत हो गई। वह करीब 86 साल की थी। वृद्घावस्था और बीमार होने की वजह से तकरीबन दो वर्षों से उससे कोई काम नहीं लिया जा रहा था और उसका इलाज चल रहा था। पोस्टमार्टम कराने के बाद पुष्पाकली के शव को दफन कर दिया गया।
दुधवा टाइगर रिजर्व में यूं तो कई हाथी हैं लेकिन पुष्पाकली की बात कुछ और ही थी। उसको अक्सर आबादी और खेतों की ओर पहुंच जाने वाले बाघों को काबू करने में लगाया जाता था। वह इसे बखूबी अंजाम भी देती थी। खास बात यह थी कि वह बिगड़ैल बाघों से घबराती नहीं थी। पड़ोसी जिले पीलीभीत और अन्य इलाकों में भी चलाए गए सर्च ऑपरेशन में वह शामिल रही। उसे इस तरह के ऑपरेशन का खासा अनुभव था और इसी वजह से मुसीबत की स्थिति में पुष्पाकली को याद किया जाता था।
दुधवा की शान थी पुष्पाकली
पुष्पाकली को दुधवा में हाथियों की शान माना जाता था। पुष्पाकली के बारे में अधिकारी कहते हैं कि वह बाघ को सूंघकर तलाश लेती थी। पुष्पाकली का आखिरी ऑपरेशन पीलीभीत में टाइगर पकड़ने को लेकर था, लेकिन उसी दौरान अचानक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के चलते उसे बीच अभियान से ही वापस दुधवा ले आया गया था। उसकी मौत की खबर मिलते ही डिप्टी डायरेक्टर महावीर कौजलगि वहां पहुंच गए और चिकित्सकों को बुलाकर वहीं पोस्टमार्टम कराया। इसके बाद उसे वहीं दफना दिया गया है।
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नए मेहमानों का स्वागत नहीं कर पाई पुष्पा कली
दुधवा टाइगर रिजर्व में नए मेहमानों का स्वागत पुष्पाकली नहीं कर पाई। यहां जल्द ही कर्नाटक से 12 हाथी आने वाले हैं। पुष्पाकली की कमी पार्क प्रशासन और महावतों को काफी खल रही है। उसने अपनी लंबी उम्र में कई पड़ाव देखे हैं।
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- 86 साल बताई जा रही उम्र, पोस्टमार्टम के बाद किया गया दफन
पलियाकलां।
बाघों को काबू करने वाली दुधवा टाइगर रिजर्व की हथिनी पुष्पाकली की बीमारी के चलते रविवार शाम करीब सात बजे सलूकापुर बेसकैंप में मौत हो गई। वह करीब 86 साल की थी। वृद्घावस्था और बीमार होने की वजह से तकरीबन दो वर्षों से उससे कोई काम नहीं लिया जा रहा था और उसका इलाज चल रहा था। पोस्टमार्टम कराने के बाद पुष्पाकली के शव को दफन कर दिया गया।
दुधवा टाइगर रिजर्व में यूं तो कई हाथी हैं लेकिन पुष्पाकली की बात कुछ और ही थी। उसको अक्सर आबादी और खेतों की ओर पहुंच जाने वाले बाघों को काबू करने में लगाया जाता था। वह इसे बखूबी अंजाम भी देती थी। खास बात यह थी कि वह बिगड़ैल बाघों से घबराती नहीं थी। पड़ोसी जिले पीलीभीत और अन्य इलाकों में भी चलाए गए सर्च ऑपरेशन में वह शामिल रही। उसे इस तरह के ऑपरेशन का खासा अनुभव था और इसी वजह से मुसीबत की स्थिति में पुष्पाकली को याद किया जाता था।
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दुधवा की शान थी पुष्पाकली
पुष्पाकली को दुधवा में हाथियों की शान माना जाता था। पुष्पाकली के बारे में अधिकारी कहते हैं कि वह बाघ को सूंघकर तलाश लेती थी। पुष्पाकली का आखिरी ऑपरेशन पीलीभीत में टाइगर पकड़ने को लेकर था, लेकिन उसी दौरान अचानक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के चलते उसे बीच अभियान से ही वापस दुधवा ले आया गया था। उसकी मौत की खबर मिलते ही डिप्टी डायरेक्टर महावीर कौजलगि वहां पहुंच गए और चिकित्सकों को बुलाकर वहीं पोस्टमार्टम कराया। इसके बाद उसे वहीं दफना दिया गया है।
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नए मेहमानों का स्वागत नहीं कर पाई पुष्पा कली
दुधवा टाइगर रिजर्व में नए मेहमानों का स्वागत पुष्पाकली नहीं कर पाई। यहां जल्द ही कर्नाटक से 12 हाथी आने वाले हैं। पुष्पाकली की कमी पार्क प्रशासन और महावतों को काफी खल रही है। उसने अपनी लंबी उम्र में कई पड़ाव देखे हैं।