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जीवन दायिनी उल्ल नदी को भगीरथ की दरकार
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लखीमपुर खीरी। शहर से सटकर बह रही जीवन दायिनी उल्ल नदी को किसी भगीरथ की दरकार है। वजह है शहर से सटकर उत्तर दिशा में बहने वाली उल्ल नदी अतिक्रमण की वजह से सिकुड़ती जा रही है। कभी सदानीरा कही जाने वाली उल्ल नदी में गर्मी केे मौसम में पानी इतना कम हो गया है कि नाले सी नजर आ रही है। अविरल धारा की जगह कूड़ा कचरा बहता नजर आता है। महेवागंज में पुल के निकट कुछ लोगों ने धोबी घाट बना रखा है।
उल्ल नदी पीलीभीत से निकलकर गोला होते हुए लखीमपुर शहर से सटकर उत्तर की ओर बहती हुई सीतापुर जिले में रामपुर मथुरा के पास शारदा नदी में मिल जाती है। खीरी जिले में उल्ल नदी की लंबाई करीब 95 किलोमीटर है। लखीमपुर शहर में संकटा देवी का प्राचीन मंदिर है। संकटा देवी को मां लक्ष्मी का ही दूसरा नाम कहा जाता है। इसी देवी के नाम पर लखीमपुर का नाम लक्ष्मीपुर पड़ा जो बिगड़ते-बिगड़ते लखीमपुर हो गया। उल्लू को लक्ष्मी का वाहन माना जाता है। लक्ष्मीपुर से सटकर बहने के कारण लक्ष्मी जी के वाहन के सम्मान में इसका नाम उल्ल नदी पड़ा।
जंगल में वन्यजीवों की प्यास बुझाती है उल्ल नदी
उल्ल नदी से पीलीभीत से निकलने के बाद काफी दूर तक जंगल का सफर तय करती है। सदानीरा होने के कारण किशनुपर सेंक्चुरी के वन्यजीवों की प्यास बुझाती है। जंगल से बाहर निकलते ही नदी की दुर्दशा शुरू हो जाती है। कहीं अतिक्रमण तो कहीं कचरे के डलाव से नदी ने सिकुड़कर नाले का रूप ले लिया है। शहर के पास तो इसकी हालत बिल्कुल गंदे नाले जैसी हो गई है। कुछ साल पहले तक नगर पालिका ने उल्ल नदी के किनारे को कूड़ा डलाव घर बना रखा था। अब यहां नगर पालिका ने तो कूड़ा डालना बंद कर दिया है फिर भी नदी में इतना कूड़ा जमा है कि नदी गंदा नाला बन गई है।
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जहरीला हुआ नदी का पानी
महेवागंज पुल के पास धोबी घाट है जहां गंदे कपड़े धोने में इस्तेमाल होने वाले रसायनों से नदी का पानी जहरीला हो गया है। इसके अलावा कुछ उद्योगों से निकलने वाला औद्योगिक कचरा भी इसी नदी में डाला जा रहा है। इससे इस नदी का पानी जहरीला हो चुका है। कई साल पहले इसी नदी का जहरीला पानी पीने से एक साथ कई भैंसे मर गई थीं। इसके बाद से पशुपालक नदी के पास अपने मवेशियों को फटकने नहीं देते। पानी जहरीला होने से नदी की मछलियां और जलजीव खत्म हो गए हैं। इससे नदी की जैव विविधता पर असर पड़ा है।
कंडवा और जुनई नदी का भी यही हाल
शहर से छह किलोमीटर दूर लिलौटी नाथ धाम स्थित जुनई और कंडवा नदी का संगम है। यहां नदियां सिकुड़ गई है। दोनों नदियां अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए किसी भगीरथ के इंतजार में है। खास बात यह कि कंडवा नदी विषैली हो चुकी है। एक मिल के सीवर गिराने से नदी की ऐसी हालत हुई है।
उल्ल नदी के उत्थान के लिए नहीं बनी कोई योजना
सिंचाई विभाग के अधिशाषी अभियंता डीसी वर्मा कहते हैं कि उल्ल नदी के लिए कभी कोई परियोजना नहीं बनी है, फिरभी सर्वे कराकर यदि इसमें कार्य कराने की गुंजाइश होगी तो प्रोजेक्ट बनाया जाएगा।
क्या कहते हैं पर्यावरण प्रेमी
उल्ल नदी के जल को निर्मल रखने के लिए डाले जा रहे कूड़े और गंदगी पर पूर्णतया रोकथाम लगनी चाहिए। स्वयंसेवी संस्थाओं और समाजसेवियों को भी शहर की लाइफ लाइन के लिए आगे आना चाहिए।
- डॉ. एससी मिश्र, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, वाईडी कॉलेज
लोगों को निजी स्वार्थ के चलते नदियों की परवाह नहीं है। लोगबाग नदियों को प्रदूषित कर रहे हैं और हरियाली नष्ट करने पर तुले हैं, जो अत्यंत चिंता का विषय है। फिलहाल नदियों के अतिक्रमण और प्रदूषण को खत्म किया जाना चाहिए।
- संजीव त्रिवेदी, पर्यावरण प्रेमी
नदियों को निर्मल करने के लिए पिछले दो सालों में काम हुए हैं। सिल्ट सफाई का भी कार्य किया जाता है। फिलहाल नदियों का उत्थान कराना प्राथमिकता होती है। बरसात से पहले परियोजना बनाकर कार्य कराया जाएगा, जिससे बरसात में बाढ़ की समस्या न उत्पन्न हो।
- शैलेंद्र कुमार सिंह, डीएम
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उल्ल नदी पीलीभीत से निकलकर गोला होते हुए लखीमपुर शहर से सटकर उत्तर की ओर बहती हुई सीतापुर जिले में रामपुर मथुरा के पास शारदा नदी में मिल जाती है। खीरी जिले में उल्ल नदी की लंबाई करीब 95 किलोमीटर है। लखीमपुर शहर में संकटा देवी का प्राचीन मंदिर है। संकटा देवी को मां लक्ष्मी का ही दूसरा नाम कहा जाता है। इसी देवी के नाम पर लखीमपुर का नाम लक्ष्मीपुर पड़ा जो बिगड़ते-बिगड़ते लखीमपुर हो गया। उल्लू को लक्ष्मी का वाहन माना जाता है। लक्ष्मीपुर से सटकर बहने के कारण लक्ष्मी जी के वाहन के सम्मान में इसका नाम उल्ल नदी पड़ा।
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जंगल में वन्यजीवों की प्यास बुझाती है उल्ल नदी
उल्ल नदी से पीलीभीत से निकलने के बाद काफी दूर तक जंगल का सफर तय करती है। सदानीरा होने के कारण किशनुपर सेंक्चुरी के वन्यजीवों की प्यास बुझाती है। जंगल से बाहर निकलते ही नदी की दुर्दशा शुरू हो जाती है। कहीं अतिक्रमण तो कहीं कचरे के डलाव से नदी ने सिकुड़कर नाले का रूप ले लिया है। शहर के पास तो इसकी हालत बिल्कुल गंदे नाले जैसी हो गई है। कुछ साल पहले तक नगर पालिका ने उल्ल नदी के किनारे को कूड़ा डलाव घर बना रखा था। अब यहां नगर पालिका ने तो कूड़ा डालना बंद कर दिया है फिर भी नदी में इतना कूड़ा जमा है कि नदी गंदा नाला बन गई है।
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जहरीला हुआ नदी का पानी
महेवागंज पुल के पास धोबी घाट है जहां गंदे कपड़े धोने में इस्तेमाल होने वाले रसायनों से नदी का पानी जहरीला हो गया है। इसके अलावा कुछ उद्योगों से निकलने वाला औद्योगिक कचरा भी इसी नदी में डाला जा रहा है। इससे इस नदी का पानी जहरीला हो चुका है। कई साल पहले इसी नदी का जहरीला पानी पीने से एक साथ कई भैंसे मर गई थीं। इसके बाद से पशुपालक नदी के पास अपने मवेशियों को फटकने नहीं देते। पानी जहरीला होने से नदी की मछलियां और जलजीव खत्म हो गए हैं। इससे नदी की जैव विविधता पर असर पड़ा है।
कंडवा और जुनई नदी का भी यही हाल
शहर से छह किलोमीटर दूर लिलौटी नाथ धाम स्थित जुनई और कंडवा नदी का संगम है। यहां नदियां सिकुड़ गई है। दोनों नदियां अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए किसी भगीरथ के इंतजार में है। खास बात यह कि कंडवा नदी विषैली हो चुकी है। एक मिल के सीवर गिराने से नदी की ऐसी हालत हुई है।
उल्ल नदी के उत्थान के लिए नहीं बनी कोई योजना
सिंचाई विभाग के अधिशाषी अभियंता डीसी वर्मा कहते हैं कि उल्ल नदी के लिए कभी कोई परियोजना नहीं बनी है, फिरभी सर्वे कराकर यदि इसमें कार्य कराने की गुंजाइश होगी तो प्रोजेक्ट बनाया जाएगा।
क्या कहते हैं पर्यावरण प्रेमी
उल्ल नदी के जल को निर्मल रखने के लिए डाले जा रहे कूड़े और गंदगी पर पूर्णतया रोकथाम लगनी चाहिए। स्वयंसेवी संस्थाओं और समाजसेवियों को भी शहर की लाइफ लाइन के लिए आगे आना चाहिए।
- डॉ. एससी मिश्र, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, वाईडी कॉलेज
लोगों को निजी स्वार्थ के चलते नदियों की परवाह नहीं है। लोगबाग नदियों को प्रदूषित कर रहे हैं और हरियाली नष्ट करने पर तुले हैं, जो अत्यंत चिंता का विषय है। फिलहाल नदियों के अतिक्रमण और प्रदूषण को खत्म किया जाना चाहिए।
- संजीव त्रिवेदी, पर्यावरण प्रेमी
नदियों को निर्मल करने के लिए पिछले दो सालों में काम हुए हैं। सिल्ट सफाई का भी कार्य किया जाता है। फिलहाल नदियों का उत्थान कराना प्राथमिकता होती है। बरसात से पहले परियोजना बनाकर कार्य कराया जाएगा, जिससे बरसात में बाढ़ की समस्या न उत्पन्न हो।
- शैलेंद्र कुमार सिंह, डीएम