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दुश्मन पर विजय के लिए यहां आल्हा ने की थी पूजा
प्रेम जायसवाल, धौरहरा खीरी।
Updated Fri, 22 Sep 2017 11:22 PM IST
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दुश्मन पर विजय के लिए यहां आल्हा ने की थी पूजा
- फोटो : लखीमपुर खीरी, अमर उजाला
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धौरहरा।
कफारा गांव के उत्तर त्रिवेणी झील के किनारे बनी कुटी माता मंदिर के बारे में बुजुर्गों का कहना है कि यहां गांजर की लड़ाई के समय बुंदेलखंड के राजा परिमल के सामंत आल्हा ने माड़ौ गढ़ पर चढ़ाई करने से पहले अपनी विजय की कामना से कुटी मंदिर में मां की तंत्र साधना की थी। आल्हा ने यहां से चालीस किलीमीटर दूर माड़ौ गढ़, जो बहराइच जिले में है अब कालीकोट के नाम से जाना जाता है, पर चढ़ाई कर वहां के राजा पर विजय प्राप्त की थी। प्राय: देवी मंदिर पूरबमुखी होते हैं जहां साधक पश्चिम मुख बैठकर पूजा करते हैं, लेकिन यह प्रतिमा उत्तर मुखी है, जहां साधना के लिए दक्षिण मुख बैठना पड़ता है।
जिला मुख्यालय से पचास किलोमीटर दूर धौरहरा तहसील क्षेत्र के कफारा गांव के बाहर उत्तर त्रिवेणी झील के किनारे करीब पांच सौ साल पुराने इस कुटी माता मंदिर के बारे में किवदंती है कि यहां महोबा के आल्हा ऊदल ने गांजर पर चढ़ाई करने से पहले इस मंदिर का निर्माण कर मूर्ति स्थापित की थी। संत रामभूषण दास उर्फ लद्धड़ बाबा बताते हैं करीब पांच सौ साल पहले अपने पिता का बदला लेने के लिए माड़ौं गढ़ पर चढ़ाई की थी। वहां का राजा करिंगा राय काली मां का उपासक था, जिस पर विजय के लिए तंत्र साधना जरूरी थी। तभी आल्हा ने माड़ौ गढ़ से 40 किलोमीटर पहले कफारा के जंगल में त्रिवेणी झील के किनारे कुटी मंदिर की स्थापना कर तंत्र साधना की थी। अब भी बहराइच के काली कोट में वह मंदिर विद्यमान है जहां राजा करिंगा काली मां की पूजा करता था।
कफारा कुटी मंदिर में कोई न कोई चमत्कारिक घटनाएं होती रहती हैं। हाल ही में इस मंदिर में रह रहे महाबीर बाबा ने मंदिर के अंदर अग्नि समाधि ले ली थी। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक मंदिर में गैस सिलेंडर, केरोसिन और चीनी जैसे अति ज्वलन शील पदार्थ होने होने के बाद भी वह सामान नहीं जला, जबकि बाबा का संपूर्ण शरीर जलकर भस्म बन गया। अपार श्रद्धा के केन्द्र कुटी माता मंदिर में आज भी हजारों भक्त अपनी मनौतियों के लिए यहां आते हैं और साधक तंत्र साधना भी करते हैं।
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कफारा गांव के उत्तर त्रिवेणी झील के किनारे बनी कुटी माता मंदिर के बारे में बुजुर्गों का कहना है कि यहां गांजर की लड़ाई के समय बुंदेलखंड के राजा परिमल के सामंत आल्हा ने माड़ौ गढ़ पर चढ़ाई करने से पहले अपनी विजय की कामना से कुटी मंदिर में मां की तंत्र साधना की थी। आल्हा ने यहां से चालीस किलीमीटर दूर माड़ौ गढ़, जो बहराइच जिले में है अब कालीकोट के नाम से जाना जाता है, पर चढ़ाई कर वहां के राजा पर विजय प्राप्त की थी। प्राय: देवी मंदिर पूरबमुखी होते हैं जहां साधक पश्चिम मुख बैठकर पूजा करते हैं, लेकिन यह प्रतिमा उत्तर मुखी है, जहां साधना के लिए दक्षिण मुख बैठना पड़ता है।
जिला मुख्यालय से पचास किलोमीटर दूर धौरहरा तहसील क्षेत्र के कफारा गांव के बाहर उत्तर त्रिवेणी झील के किनारे करीब पांच सौ साल पुराने इस कुटी माता मंदिर के बारे में किवदंती है कि यहां महोबा के आल्हा ऊदल ने गांजर पर चढ़ाई करने से पहले इस मंदिर का निर्माण कर मूर्ति स्थापित की थी। संत रामभूषण दास उर्फ लद्धड़ बाबा बताते हैं करीब पांच सौ साल पहले अपने पिता का बदला लेने के लिए माड़ौं गढ़ पर चढ़ाई की थी। वहां का राजा करिंगा राय काली मां का उपासक था, जिस पर विजय के लिए तंत्र साधना जरूरी थी। तभी आल्हा ने माड़ौ गढ़ से 40 किलोमीटर पहले कफारा के जंगल में त्रिवेणी झील के किनारे कुटी मंदिर की स्थापना कर तंत्र साधना की थी। अब भी बहराइच के काली कोट में वह मंदिर विद्यमान है जहां राजा करिंगा काली मां की पूजा करता था।
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कफारा कुटी मंदिर में कोई न कोई चमत्कारिक घटनाएं होती रहती हैं। हाल ही में इस मंदिर में रह रहे महाबीर बाबा ने मंदिर के अंदर अग्नि समाधि ले ली थी। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक मंदिर में गैस सिलेंडर, केरोसिन और चीनी जैसे अति ज्वलन शील पदार्थ होने होने के बाद भी वह सामान नहीं जला, जबकि बाबा का संपूर्ण शरीर जलकर भस्म बन गया। अपार श्रद्धा के केन्द्र कुटी माता मंदिर में आज भी हजारों भक्त अपनी मनौतियों के लिए यहां आते हैं और साधक तंत्र साधना भी करते हैं।
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