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सुतली कारोबार के मामले में समृद्घ हैं दुदही क्षेत्र के कई गांव
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कई पीढ़ियों से संभाल रहे सुतली का कारोबार
100 से अधिक परिवारों की आजीविका का आधार है सुतली का कारोबार
दुबौली, चाफ, जंगल लाला छपरा, बतरौली आदि गांवों में होता है काम
नेपाल तक के व्यापारी आते हैं सुतली व अन्य प्रकार की रस्सियां खरीदने
हेमंत मधुप
दुदही (कुशीनगर)। जनपद में एक ऐसा भी क्षेत्र है, जो सुतली उत्पादन के मामले में काफी धनी है। इस ब्लॉक के कई गांवों में सुतली नाम की रस्सी का उत्पादन बहुतायत में होता है। यहां के सुतली की मांग दूर-दूर तक है। यहां तक कि नेपाल तक के व्यापारी सुतली खरीदने के लिए आते हैं। यदि इसे प्रोत्साहन मिले तो यहां की रस्सी दूसरे राज्यों में व्यापक स्तर पर जगह बनाएगी। उद्योग के नाम पर जिले में चीनी मिलें ही थीं, जिनसे काफी संख्या में किसान, मजदूर, कर्मचारी और छोटे-बड़े व्यवसायी जुड़े थे, लेकिन एक-एक कर सरकारी क्षेत्र की पांच चीनी मिलें बंद हो जाने से इस क्षेत्र में बहुत से लोग बेरोजगार हो गए और अपना व्यवसाय शुरू किया। इसके अलावा ईट उद्योग को छोड़कर अन्य कोई ऐसा रोजगार नहीं सृजित हो पाया, जिससे ग्रामीण क्षेत्र के लोगों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने में मददगार हो सके। हालांकि यह एक सीमित क्षेत्र में 100 से अधिक परिवारों की आजीविका का आधार है। नेपाल तक के थोक व्यवसायी यहां सुतली खरीदने आते हैं। संवाद
इन गांवों में होता है उत्पादन
दुदही क्षेत्र के दुबौली, चाफ, जंगल लाला छपरा, लोहरपट्टी, बतरौली धुरखड़वा, ठाढीभार, रामपुर, बांसगांव, शाहपुर खलवापट्टी, शाहपुर उचकीपट्टी, गोड़रिया, लुअठहां, नरहवा, पिपरा सहित कई गांवों में अधिकतर लोग पटसन (पटुआ) और सनई से रस्सी तैयार करते हैं। यहां यह व्यवसाय परंपरागत तरीके से संचालित होता है। दुदही तथा इसके आसपास के बाजारों में रस्सी का बाजार भी लगता है।
रस्सियों का उपयोग
तैयार रस्सियों का उपयोग चारपाई बुनने से लेकर कालीन, चटाई और तिरपाल बनाने में होता है। इसके अलावा इससे मोटी रस्सियां भी तैयार की जाती हैं। सनई से सुतली तैयार की जाती है। रस्सियां तैयार करने के बाद उसे गोदाम में इकट्ठा करते हैं और फिर बाहरी व्यापारियों के हाथों इन्हें बेच देते हैं। व्यवसायी बताते हैं कि वाराणसी, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बुलंदशहर, आजमगढ़, फैजाबाद, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और नेपाल के थोक कारोबारी रस्सी खरीदने आते हैं।
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ऐसे तैयार होती है सुतली
गेहूं की फसल कटने के बाद और धान की रोपाई के बीच का समय ही सनई की खेती के लिए उपयुक्त होता है। कटी सनई को तालाब के पानी में डुबो दिया जाता है। एक सप्ताह के बाद सड़ जाने पर इसे धोया जाता है। फिर बाहर निकालकर धूप में सुखाया जाता है। फिर सनई के रेशा को अलग कर लिया जाता है। इस रेशे को सन कहते हैं। सन को सुखाने के बाद लकड़ी की तकली या गुड़गुडी से कताई करके धागा बनाते हैं। इसके बाद भीगे धागे को 10 से 15 घंटे पानी में भिगो देते हैं। उसके बाद भीगे धागे को लकड़ी के हथौड़े से पीटा जाता है। फिर तैयार धागों से बांस की दो फट्टियों के सहारे बने गुड़गुडी यंत्र से धागे के तीन लेयर को मिलाकर सुतली बनाई जाती है। सुतली में चमक के लिए मैदा का लेप लगाकर धूप में सुखा लिया जाता है।
क्या कहते हैं सुतली के व्यवसायी
लोहरपट्टी गांव के निवासी नथुनी प्रसाद कहते हैं कि बहुत पहले से उनके घर में यह कार्य होता है। यह उनके परिवार का परंपरागत व्यवसाय है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है। दुदही के सुतली व्यवसायी राजन जायसवाल का कहना है कि जनप्रतिनिधियों और प्रशासन की तरफ से इस दिशा में ध्यान नहीं दिए जाने की वजह से यह व्यवसाय अपेक्षा के अनुरूप फल-फूल नहीं पा रहा है। यह व्यवसाय कुछ परिवारों तक सिमटकर रह गया है। सुतली व्यवसाय की वजह से ही दुदही क्षेत्र अन्य राज्यों में भी विख्यात है। पिपरा पिपरासी गांव के जवाहिर का कहना है कि सुतली व्यवसाय उद्योग का रूप ले सकता है, बशर्ते इससे जुड़े लोगों को अत्याधुनिक संसाधन, उचित मार्केट, सरकार की तरफ से इसे बढ़ाने के लिए अनुदान, बैंकों से ऋण दिलाने जैसी पहल हो। क्योंकि यह 100 से अधिक परिवारों के लिए रोजगार का प्रमुख माध्यम है। शाहपुर उचकीपट्टी के ग्राम प्रधान जावेद अख्तर का कहना है कि सुतली व्यवसाय को और विकसित करने तथा लोगों को रोजगार से जोड़ने के लिए शासन-प्रशासन स्तर से भी पहल होनी चाहिए। अगर ऐसा हो जाए तो इस दिशा में क्रांतिकारी परिवर्तन आ सकता है।
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100 से अधिक परिवारों की आजीविका का आधार है सुतली का कारोबार
दुबौली, चाफ, जंगल लाला छपरा, बतरौली आदि गांवों में होता है काम
नेपाल तक के व्यापारी आते हैं सुतली व अन्य प्रकार की रस्सियां खरीदने
हेमंत मधुप
दुदही (कुशीनगर)। जनपद में एक ऐसा भी क्षेत्र है, जो सुतली उत्पादन के मामले में काफी धनी है। इस ब्लॉक के कई गांवों में सुतली नाम की रस्सी का उत्पादन बहुतायत में होता है। यहां के सुतली की मांग दूर-दूर तक है। यहां तक कि नेपाल तक के व्यापारी सुतली खरीदने के लिए आते हैं। यदि इसे प्रोत्साहन मिले तो यहां की रस्सी दूसरे राज्यों में व्यापक स्तर पर जगह बनाएगी। उद्योग के नाम पर जिले में चीनी मिलें ही थीं, जिनसे काफी संख्या में किसान, मजदूर, कर्मचारी और छोटे-बड़े व्यवसायी जुड़े थे, लेकिन एक-एक कर सरकारी क्षेत्र की पांच चीनी मिलें बंद हो जाने से इस क्षेत्र में बहुत से लोग बेरोजगार हो गए और अपना व्यवसाय शुरू किया। इसके अलावा ईट उद्योग को छोड़कर अन्य कोई ऐसा रोजगार नहीं सृजित हो पाया, जिससे ग्रामीण क्षेत्र के लोगों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ करने में मददगार हो सके। हालांकि यह एक सीमित क्षेत्र में 100 से अधिक परिवारों की आजीविका का आधार है। नेपाल तक के थोक व्यवसायी यहां सुतली खरीदने आते हैं। संवाद
इन गांवों में होता है उत्पादन
दुदही क्षेत्र के दुबौली, चाफ, जंगल लाला छपरा, लोहरपट्टी, बतरौली धुरखड़वा, ठाढीभार, रामपुर, बांसगांव, शाहपुर खलवापट्टी, शाहपुर उचकीपट्टी, गोड़रिया, लुअठहां, नरहवा, पिपरा सहित कई गांवों में अधिकतर लोग पटसन (पटुआ) और सनई से रस्सी तैयार करते हैं। यहां यह व्यवसाय परंपरागत तरीके से संचालित होता है। दुदही तथा इसके आसपास के बाजारों में रस्सी का बाजार भी लगता है।
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रस्सियों का उपयोग
तैयार रस्सियों का उपयोग चारपाई बुनने से लेकर कालीन, चटाई और तिरपाल बनाने में होता है। इसके अलावा इससे मोटी रस्सियां भी तैयार की जाती हैं। सनई से सुतली तैयार की जाती है। रस्सियां तैयार करने के बाद उसे गोदाम में इकट्ठा करते हैं और फिर बाहरी व्यापारियों के हाथों इन्हें बेच देते हैं। व्यवसायी बताते हैं कि वाराणसी, मुजफ्फरनगर, मेरठ, बुलंदशहर, आजमगढ़, फैजाबाद, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और नेपाल के थोक कारोबारी रस्सी खरीदने आते हैं।
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ऐसे तैयार होती है सुतली
गेहूं की फसल कटने के बाद और धान की रोपाई के बीच का समय ही सनई की खेती के लिए उपयुक्त होता है। कटी सनई को तालाब के पानी में डुबो दिया जाता है। एक सप्ताह के बाद सड़ जाने पर इसे धोया जाता है। फिर बाहर निकालकर धूप में सुखाया जाता है। फिर सनई के रेशा को अलग कर लिया जाता है। इस रेशे को सन कहते हैं। सन को सुखाने के बाद लकड़ी की तकली या गुड़गुडी से कताई करके धागा बनाते हैं। इसके बाद भीगे धागे को 10 से 15 घंटे पानी में भिगो देते हैं। उसके बाद भीगे धागे को लकड़ी के हथौड़े से पीटा जाता है। फिर तैयार धागों से बांस की दो फट्टियों के सहारे बने गुड़गुडी यंत्र से धागे के तीन लेयर को मिलाकर सुतली बनाई जाती है। सुतली में चमक के लिए मैदा का लेप लगाकर धूप में सुखा लिया जाता है।
क्या कहते हैं सुतली के व्यवसायी
लोहरपट्टी गांव के निवासी नथुनी प्रसाद कहते हैं कि बहुत पहले से उनके घर में यह कार्य होता है। यह उनके परिवार का परंपरागत व्यवसाय है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है। दुदही के सुतली व्यवसायी राजन जायसवाल का कहना है कि जनप्रतिनिधियों और प्रशासन की तरफ से इस दिशा में ध्यान नहीं दिए जाने की वजह से यह व्यवसाय अपेक्षा के अनुरूप फल-फूल नहीं पा रहा है। यह व्यवसाय कुछ परिवारों तक सिमटकर रह गया है। सुतली व्यवसाय की वजह से ही दुदही क्षेत्र अन्य राज्यों में भी विख्यात है। पिपरा पिपरासी गांव के जवाहिर का कहना है कि सुतली व्यवसाय उद्योग का रूप ले सकता है, बशर्ते इससे जुड़े लोगों को अत्याधुनिक संसाधन, उचित मार्केट, सरकार की तरफ से इसे बढ़ाने के लिए अनुदान, बैंकों से ऋण दिलाने जैसी पहल हो। क्योंकि यह 100 से अधिक परिवारों के लिए रोजगार का प्रमुख माध्यम है। शाहपुर उचकीपट्टी के ग्राम प्रधान जावेद अख्तर का कहना है कि सुतली व्यवसाय को और विकसित करने तथा लोगों को रोजगार से जोड़ने के लिए शासन-प्रशासन स्तर से भी पहल होनी चाहिए। अगर ऐसा हो जाए तो इस दिशा में क्रांतिकारी परिवर्तन आ सकता है।