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Kushinagar News: गंडक के तट पर हिमालयी धूप की महक
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खड्डा (कुशीनगर)। नेपाल में भीषण बाढ़ और भूस्खलन के बाद गंडक नदी में पहाड़ों की खास सौगात भी बहकर खड्डा क्षेत्र में पहुंची है। मलबे की दुर्गंध के बीच धूप की खुशबू वातावरण में फैली हुई है। ग्रामीण इन लकड़ियों को निकालकर एकत्र कर रहे हैं। इसको स्थानीय भाषा में अगइ कहा जाता है। तीन नंबर ठोकर के पास ऐसी लकड़ियोंं का ढेर लगा है।
क्षेत्र के मदनुर, सिसवा गोपाल, भेड़िहारी, भैसहा, हनुमानगंज आदि गांव के सटे छितौनी तटबंध के किनारे बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने नदी से अगइ लकड़ी निकाली है। ठंडे और ऊंचाई वाले इलाकों में मिलने वाली इस लकड़ी का उपयोग लंबे समय से पारंपरिक धूप बनाने में किया जाता है। इन लकड़ियों में बनी विशेष प्रकार की गांठ में धूप होती है। लकड़ी को सुखाकर उसके टुकड़ों या चूर्ण से सुगंधित धूप तैयार की जाती है। इसका इस्तेमाल धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पाठ और वातावरण को सुगंधित करने में किया जाता है।
ग्रामीण इस लकड़ी को सुरक्षित रखते हैं अंतिम संस्कार के समय चिता में लकड़ी के टुकड़े को जलाते हैं। इस लकड़ी की खासियत यह है कि कई दिनों तक पानी में रहने के बाद भी इसकी प्राकृतिक सुगंध बनी रहती है। यही वजह है कि गंडक के किनारे सड़ी-गली वस्तुओं की दुर्गंध के बीच इन लकड़ियों से निकल रही खुशबू लोगों का ध्यान खींच रही है।
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क्षेत्र के मदनुर, सिसवा गोपाल, भेड़िहारी, भैसहा, हनुमानगंज आदि गांव के सटे छितौनी तटबंध के किनारे बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने नदी से अगइ लकड़ी निकाली है। ठंडे और ऊंचाई वाले इलाकों में मिलने वाली इस लकड़ी का उपयोग लंबे समय से पारंपरिक धूप बनाने में किया जाता है। इन लकड़ियों में बनी विशेष प्रकार की गांठ में धूप होती है। लकड़ी को सुखाकर उसके टुकड़ों या चूर्ण से सुगंधित धूप तैयार की जाती है। इसका इस्तेमाल धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पाठ और वातावरण को सुगंधित करने में किया जाता है।
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ग्रामीण इस लकड़ी को सुरक्षित रखते हैं अंतिम संस्कार के समय चिता में लकड़ी के टुकड़े को जलाते हैं। इस लकड़ी की खासियत यह है कि कई दिनों तक पानी में रहने के बाद भी इसकी प्राकृतिक सुगंध बनी रहती है। यही वजह है कि गंडक के किनारे सड़ी-गली वस्तुओं की दुर्गंध के बीच इन लकड़ियों से निकल रही खुशबू लोगों का ध्यान खींच रही है।
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