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Kushinagar News: 500 वर्ष पुराने मां सिधरिया धाम में नवरात्र में बढ़ जाती है श्रद्धालुओं की भीड़

Wed, 14 Oct 2026 02:12 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Wed, 14 Oct 2026 02:12 AM IST
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The crowd of devotees swells during Navratri at the 500-year-old Maa Sidhariya Dham.
सिधरिया ताल के किनारे स्थित मंदिर में बड़ी संख्या में पहुंचते हैं श्रद्धालु
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पकड़ियार बाजार। नेबुआ नौरंगिया क्षेत्र के कोटवा में मां सिधरिया का प्राचीन मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। सिधरिया ताल के किनारे स्थित इस मंदिर का इतिहास लगभग 500 वर्ष पुराना बताया जाता है। मान्यता है कि सच्चे मन से दर्शन करने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। नवरात्र में यहां श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ जाती है।

शारदीय और चैत्र नवरात्र में मंदिर परिसर भक्तों की भीड़ से गुलजार हो उठता है। यह मंदिर कोटवा-मुसहरी मार्ग से करीब एक किलोमीटर उत्तर में स्थित है। राजू शर्मा, योगेंद्र कुशवाहा और गोविंद ने बताया कि पहले यह स्थान घने जंगलों से घिरा था। जंगल में शेर, चीता और हाथी समेत कई जंगली जानवर रहते थे। जनश्रुति है कि बंजारों ने यहीं माता की पिंडी स्थापित कर पूजा शुरू की थी।
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मां सिधरिया को सात देवियों में मदनपुर देवी के रूप में भी जाना जाता है। बुजुर्ग बताते हैं कि साधु विष्णु माता की पिंडी की नियमित पूजा करते थे। उनके धामगमन के बाद बालमुकुंद नागा बाबा ने पुजारी की जिम्मेदारी संभाली। वर्ष 1952 में जनसहयोग से एक छोटे मंदिर का निर्माण कराया गया। वर्ष 2006 में ब्लॉक प्रमुख प्रतिनिधि शेषनाथ यादव ने जर्जर मंदिर का जीर्णोद्धार कराया।
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वर्ष 1962 में नारायणी नदी के भैंसहा-विराभार बांध के टूटने से पूरा जंगल जलमग्न हो गया था। बाढ़ के बाद जंगल नष्ट हो गया और वहां ताल का विस्तार हुआ। हालांकि माता की पिंडी सुरक्षित रही, जिसे श्रद्धालु माता की कृपा मानते हैं। लोगों का दावा है कि करीब 16 किलोमीटर क्षेत्र में फैले इस ताल का पानी कभी नहीं सूखता है।

सात पिंडियों के साथ विराजमान माता

मंदिर के गर्भगृह में सात पिंडियों के साथ माता की विशाल प्रतिमा स्थापित है। श्रद्धालु यहां दर्शन-पूजन कर सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। मनोकामना पूरी होने पर भक्त माता को चुनरी, नारियल और हाथी की मूर्ति चढ़ाते हैं। नवरात्र के दौरान मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना होती है, इस दौरान दूर-दराज से श्रद्धालु आते हैं। यह मंदिर आस्था, परंपरा और लोकमान्यताओं से जुड़ा होकर क्षेत्र की धार्मिक पहचान बना हुआ है।
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