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पडरौना शहर में पीढ़ियों से चल रहा सिन्होरा का का
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प्रोत्साहन बिना सिसक रहा सिन्होरा कारोबार
महंगाई के चलते बढ़ती जा रही सिन्होरा बनाने की लागत
पडरौना में करीब 100 साल पहले शुरू हुआ था कारोबार
पहले हाथ से होती थी लकड़ी की खराद, अब मशीन से
राकेश कुमार गौंड़
कुशीनगर। करीब 100 साल पहले पडरौना में शुरू हुआ सिन्होरा कारोबार बढ़ती लागत, डीजल की महंगाई और सरकार की तरफ से प्रोत्साहन नहीं मिलने के कारण सिसक रहा है। एक परिवार ने इसे शुरू किया था, जो आगे चलकर चार परिवारों में बढ़ा, लेकिन अब दो परिवार कारोबार बंद कर दिए। जिन दो परिवारों के लोग विरासत को संभालने हुए हैं, वो भी मुश्किलों का सामना कर रहे हैं।
सिन्होरा व्यवसायी अजय सिंह बताते हैँ कि करीब 100 साल पहले यह कारोबार उनके दादाजी के वक्त से हो रहा है। मूलरूप से बड़हरागंज के रहने वाले हैं, लेकिन दशकों पहले उनका पूरा कुनबा पडरौना में आकर बस गया था। उनके बाद उनके पिता तूफानी और उनके भाइयों ने कारोबार को आगे बढ़ाया था। हालांकि इधर के कुछ वर्ष पूर्व दो लोगों ने बढ़ती लागत और सामान की किल्लत को देखते हुए बंद कर दिया, लेकिन दो परिवारों ने यह विरासत अभी भी संभाली हुई है। संवाद
पहले हाथ से, अब मशीन मददगार
अजय बताते हैं कि जिस प्रकार फूल और पीतल के बर्तन हाथ से खराद किए जाते थे, उसी तरह आम के गुटकों पर सिन्होरा का खराद होता था। इसमें समय अधिक लगता था। कुछ वक्त गुजरा तो इसे मशीन से जोड़ दिया गया। अब मशीन से ही आम के गुटकों का खराद कर सिन्होरा बनाया जाता है। रमेश सिंह नाम के एक कारीगर बड़हरागंज के निवासी हैं, जबकि दूसरे रहमतुल्लाह बिहार के बेतिया के रहने वाले हैं। बरसात के दिनों में काम बंद रहता है। यह दोनों कारीगर मशीन से लकड़ी के गुटकों को तराशकर सिन्होरे को आकार देते हैं। इसमें आम की कच्ची लकड़ी का प्रयोग होता है।
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पूरा परिवार तैयार करता है सिन्होरा
सिन्होरा बनाने का काम अजय के परिवार में परंपरागत तरीके से चल रहा है। वह बताते हैं कि दोनों कारीगर जिस सिन्होरे को मशीन से तैयार करके देते हैं, उससे वह लाह नाम के रंग से पेंट करते हैं। यह विशेष प्रकार का रंग होता है, जिसे बनारस से मंगाया जाता है। पत्नी और बच्चे उस पर लैस व अन्य सामग्री लगाकर और आकर्षक बनाते हैं। यहां का सिन्होरा पूरे जिले के अलावा गोरखपुर तक भेजा जाता है।
आवेदन किया, नहीं मिली सरकारी मदद
सिन्होरा कारोबारी अजय सिंह बताते हैं कि डीजल के साथ-साथ लकड़ियों का दाम निरंतर बढ़ने से लागत में वृद्धि होती जा रही है। किसी तरह सीसी लोन लेकर कारोबार को आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने बताया कि श्रम विभाग और उद्योग विभाग में सहायता के लिए आवेदन किए, लेकिन कोई मदद नहीं मिली। यह सिर्फ आठ माह का व्यवसाय है। सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं मिलने से व्यवसाय को आगे नहीं बढ़ा पा रहे हैं। एक सिन्होरा बनाने में लगभग 110 रुपये लागत आ रही है, दस रुपये मुनाफा रखकर इसे थोक रेट पर बेचते हैं।
सिन्होरा विक्रेता बोले
पडरौना में मेन रोड पर सिन्होरा बेचने वाले प्रदीप अग्रवाल कहते हैं कि हर हिंदू परिवार में सिन्होरा का विशेष महत्व है। लग्न के समय इसकी बिक्री खूब होती है। इसके आकार और डिजाइन पर मूल्य तय होता है। इसके टूटने, फटने या खराब होने का अंदेशा भी रहता है। जो सिन्होरा बच जाता है, उसे अगले सीजन में पुन: पेंट कराने में प्रति सिन्होरा 100 रुपये खर्च आता है। इस हिसाब से कभी-कभी इसमें अधिक खर्च पड़ जाता है।
ऐसे उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए उद्योग विभाग की तरफ से कुल धनराशि का 15 से 35 प्रतिशत तक अनुदान देने की व्यवस्था है। इसलिए विभाग से संपर्क करें। ऐसे लोगों की पूरी मदद की जाएगी।
- सतीश कुमार, उपायुक्त जिला उद्योग केंद्र
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महंगाई के चलते बढ़ती जा रही सिन्होरा बनाने की लागत
पडरौना में करीब 100 साल पहले शुरू हुआ था कारोबार
पहले हाथ से होती थी लकड़ी की खराद, अब मशीन से
राकेश कुमार गौंड़
कुशीनगर। करीब 100 साल पहले पडरौना में शुरू हुआ सिन्होरा कारोबार बढ़ती लागत, डीजल की महंगाई और सरकार की तरफ से प्रोत्साहन नहीं मिलने के कारण सिसक रहा है। एक परिवार ने इसे शुरू किया था, जो आगे चलकर चार परिवारों में बढ़ा, लेकिन अब दो परिवार कारोबार बंद कर दिए। जिन दो परिवारों के लोग विरासत को संभालने हुए हैं, वो भी मुश्किलों का सामना कर रहे हैं।
सिन्होरा व्यवसायी अजय सिंह बताते हैँ कि करीब 100 साल पहले यह कारोबार उनके दादाजी के वक्त से हो रहा है। मूलरूप से बड़हरागंज के रहने वाले हैं, लेकिन दशकों पहले उनका पूरा कुनबा पडरौना में आकर बस गया था। उनके बाद उनके पिता तूफानी और उनके भाइयों ने कारोबार को आगे बढ़ाया था। हालांकि इधर के कुछ वर्ष पूर्व दो लोगों ने बढ़ती लागत और सामान की किल्लत को देखते हुए बंद कर दिया, लेकिन दो परिवारों ने यह विरासत अभी भी संभाली हुई है। संवाद
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पहले हाथ से, अब मशीन मददगार
अजय बताते हैं कि जिस प्रकार फूल और पीतल के बर्तन हाथ से खराद किए जाते थे, उसी तरह आम के गुटकों पर सिन्होरा का खराद होता था। इसमें समय अधिक लगता था। कुछ वक्त गुजरा तो इसे मशीन से जोड़ दिया गया। अब मशीन से ही आम के गुटकों का खराद कर सिन्होरा बनाया जाता है। रमेश सिंह नाम के एक कारीगर बड़हरागंज के निवासी हैं, जबकि दूसरे रहमतुल्लाह बिहार के बेतिया के रहने वाले हैं। बरसात के दिनों में काम बंद रहता है। यह दोनों कारीगर मशीन से लकड़ी के गुटकों को तराशकर सिन्होरे को आकार देते हैं। इसमें आम की कच्ची लकड़ी का प्रयोग होता है।
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पूरा परिवार तैयार करता है सिन्होरा
सिन्होरा बनाने का काम अजय के परिवार में परंपरागत तरीके से चल रहा है। वह बताते हैं कि दोनों कारीगर जिस सिन्होरे को मशीन से तैयार करके देते हैं, उससे वह लाह नाम के रंग से पेंट करते हैं। यह विशेष प्रकार का रंग होता है, जिसे बनारस से मंगाया जाता है। पत्नी और बच्चे उस पर लैस व अन्य सामग्री लगाकर और आकर्षक बनाते हैं। यहां का सिन्होरा पूरे जिले के अलावा गोरखपुर तक भेजा जाता है।
आवेदन किया, नहीं मिली सरकारी मदद
सिन्होरा कारोबारी अजय सिंह बताते हैं कि डीजल के साथ-साथ लकड़ियों का दाम निरंतर बढ़ने से लागत में वृद्धि होती जा रही है। किसी तरह सीसी लोन लेकर कारोबार को आगे बढ़ा रहे हैं। उन्होंने बताया कि श्रम विभाग और उद्योग विभाग में सहायता के लिए आवेदन किए, लेकिन कोई मदद नहीं मिली। यह सिर्फ आठ माह का व्यवसाय है। सरकार की तरफ से कोई मदद नहीं मिलने से व्यवसाय को आगे नहीं बढ़ा पा रहे हैं। एक सिन्होरा बनाने में लगभग 110 रुपये लागत आ रही है, दस रुपये मुनाफा रखकर इसे थोक रेट पर बेचते हैं।
सिन्होरा विक्रेता बोले
पडरौना में मेन रोड पर सिन्होरा बेचने वाले प्रदीप अग्रवाल कहते हैं कि हर हिंदू परिवार में सिन्होरा का विशेष महत्व है। लग्न के समय इसकी बिक्री खूब होती है। इसके आकार और डिजाइन पर मूल्य तय होता है। इसके टूटने, फटने या खराब होने का अंदेशा भी रहता है। जो सिन्होरा बच जाता है, उसे अगले सीजन में पुन: पेंट कराने में प्रति सिन्होरा 100 रुपये खर्च आता है। इस हिसाब से कभी-कभी इसमें अधिक खर्च पड़ जाता है।
ऐसे उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए उद्योग विभाग की तरफ से कुल धनराशि का 15 से 35 प्रतिशत तक अनुदान देने की व्यवस्था है। इसलिए विभाग से संपर्क करें। ऐसे लोगों की पूरी मदद की जाएगी।
- सतीश कुमार, उपायुक्त जिला उद्योग केंद्र