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Kushinagar News: देवरिया से अलग होकर दुनिया में चमक उठा कुशीनगर

Wed, 13 May 2026 02:23 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर Updated Wed, 13 May 2026 02:23 AM IST
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Separating from Deoria, Kushinagar has shone brightly on the global stage.
कुशीनगर। देवरिया से अलग होकर 13 मई 1994 को अस्तित्व में आए कुशीनगर ने तीन दशक में लंबा सफर तय किया है। कभी सीमित संसाधनों और उपेक्षा से जूझने वाला यह इलाका अब अंतरराष्ट्रीय बौद्ध पर्यटन मानचित्र पर अपनी अलग पहचान रखता है। महात्मा बुद्ध की महापरिनिर्वाण स्थली होने से हर साल देश-दुनिया से लाखों की संख्या में पर्यटक, बौद्ध धर्मावलंबी व उपासक-उपासिकाएं यहां पहुंच रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट, फोरलेन सड़कें और बढ़ती प्रशासनिक गतिविधियों ने जिले की तस्वीर बदल दी है। हालांकि रोजगार, स्वास्थ्य और उद्योग के मामले में अभी भी काम किए जाने की जरूरत है।
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जिला बनने के दौरान कुशीनगर मुख्य रूप से कृषि आधारित और पिछड़े क्षेत्र के रूप में गिना जाता था, लेकिन इसे चीनी का कटोरा भी कहा जाता था। गांवों में पक्की सड़कों की कमी थी और शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित थीं। जिला बनने के बाद प्रशासनिक ढांचा मजबूत हुआ और धीरे-धीरे विकास योजनाओं की पहुंच गांवों तक बढ़ने लगी। पडरौना, कसया, तमकुहीराज और हाटा जैसे कस्बों का तेजी से विस्तार हुआ।
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सबसे बड़ा बदलाव पर्यटन क्षेत्र में देखने को मिला। महापरिनिर्वाण मंदिर, रामाभार स्तूप और विदेशी बौद्ध मंदिरों के कारण कुशीनगर की पहचान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बनी। थाईलैंड, जापान, श्रीलंका और म्यांमार जैसे देशों से आने वाले श्रद्धालुओं ने यहां के पर्यटन कारोबार को नई दिशा दी। होटल, ट्रेवल और छोटे व्यवसायों में भी इसका असर दिखता है। सड़क संपर्क बेहतर होने के बाद गोरखपुर, बिहार और नेपाल सीमा से जुड़ाव आसान हुआ।
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फोरलेन और नई सड़कों ने यात्रा का समय घटाया। वहीं डिजिटल दौर के साथ शिक्षा और निजी संस्थानों का विस्तार भी तेजी से हुआ। हालांकि बड़ी संख्या में युवा अब भी रोजगार के लिए महानगरों की ओर पलायन कर रहे हैं। जिले में बड़े उद्योगों की कमी लगातार महसूस की जाती रही है। इनके नहीं होने से जिले के युवा आज भी परदेश व दूसरे बड़े शहरों की ओर रोजगार की तलाश में जा रहे हैं।
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जिला बना तो उड़ान के सपने भी जगे… लेकिन आसमान अब भी खाली
पडरौना जिले से कुशीनगर बनने के बाद तेज हुई एयरपोर्ट की मांग
2021 में मिला अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट का सौगात, मगर बना हुआ है उड़ानों का इंतजार
कुशीनगर। 13 मई 1994 को जब देवरिया से अलग होकर नया जिला अस्तित्व में आया, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि एक दिन कुशीनगर अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट वाला जिला कहलाएगा। महात्मा बुद्ध की महापरिनिर्वाण स्थली होने के कारण कुशीनगर को वैश्विक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की मांग पहले से उठती रही थी, लेकिन जिला बनने के बाद इस दिशा में प्रयासों ने रफ्तार पकड़ी। लगभग तीन दशक तक राजनीतिक घोषणाओं, फाइलों और तकनीकी प्रक्रियाओं में उलझा एयरपोर्ट आखिरकार 20 अक्टूबर 2021 को शुरू हुआ, लेकिन आज भी नियमित उड़ानों का संकट इसकी सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।
कुशीनगर में हवाई पट्टी का इतिहास आजादी से पहले का है। वर्ष 1946 में कसया क्षेत्र के भलुही मदारीपट्टी गांव में अंग्रेज अधिकारियों के लिए एयरोड्रम बनाया गया था। वर्ष 1954 में अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सम्मेलन के दौरान पहली बार इसका इस्तेमाल हुआ, जब चीन, तिब्बत, थाईलैंड और अन्य देशों के प्रतिनिधि यहां पहुंचे। इसके बाद वर्षों तक यह हवाई पट्टी उपेक्षा का शिकार रही। 1994 में जिला बनने के बाद कुशीनगर को बौद्ध पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की मांग तेज हुई। अलग जिला बनने के साथ ही प्रशासनिक पहचान मिली और यह मुद्दा राज्य तथा केंद्र सरकार की प्राथमिकता में आने लगा।
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19 जून 1997 को पडरौना से बदला कुशीनगर:-
13 मई 1994 को देवरिया से अलग हुए उत्तरी हिस्से को अलग कर नए जिले के रूप में पडरौना का सृजन किया गया। 19 जून 1997 को तत्कालीन सरकार ने जिले का नाम पडरौना की जगह कुशीनगर कर दिया। यह नाम बुद्ध की महापरिनिर्वाण स्थली होने के चलते विकास के नए पंख जुटते गए। कुशीनगर की आज विश्व में अपनी पहचान है।
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बसपा शासन में हुआ हवाईपट्टी का जीर्णोद्धार
वर्ष 1995 में बसपा सरकार में हवाई पट्टी के जीर्णोद्धार का काम शुरू हुआ। रनवे की मरम्मत, बाउंड्रीवाल, एटीसी भवन और प्रतीक्षालय का निर्माण कराया गया। बाद में यूपीए और सपा सरकारों के दौर में भी एयरपोर्ट परियोजना को आगे बढ़ाने के प्रयास हुए, लेकिन एयरपोर्ट का सपना लंबे समय तक अधूरा रहा। 2017 में प्रदेश में भाजपा सरकार बनने के बाद परियोजना को गति मिली। 10 अक्टूबर 2019 को योगी सरकार ने एयरपोर्ट को पूरी तरह एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया को सौंप दिया। इसके बाद तकनीकी जांच और विस्तार कार्यों की प्रक्रिया तेज हुई। 24 जून 2020 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने कुशीनगर को अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट घोषित किया और 22 फरवरी 2021 को डीजीसीए से उड़ान संचालन का लाइसेंस मिल गया।आखिरकार, 20 अक्टूबर 2021 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस एयरपोर्ट का लोकार्पण किया।
एयरपोर्ट शुरू होने के बाद उम्मीद जताई गई कि इससे पूर्वांचल, बिहार और नेपाल सीमा के लाखों लोगों को फायदा होगा। दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों के लिए उड़ान सेवाओं की योजना बनी। नवंबर 2021 में दिल्ली के लिए नियमित उड़ान शुरू हुई, लेकिन यात्रियों की कमी के कारण कई सेवाएं टिक नहीं सकीं। 2022 में शुरू हुआ नियमित संचालन अक्टूबर 2023 के बाद लगभग ठहर गया।हालांकि इसके बाद भी प्रशासन और एयरपोर्ट अथॉरिटी की कोशिशें जारी रहीं। एयरपोर्ट का लाइसेंस वीएफआर से अपग्रेड होकर आईएफआर श्रेणी में पहुंचा, जिससे रात और खराब मौसम में भी उड़ान की तकनीकी मंजूरी मिल गई।
केंद्र सरकार की प्रोत्साहन योजना के तहत कुशीनगर एयरपोर्ट को देश में सबसे अधिक छूट भी दी गई। रनवे के आसपास बाधा बन रहे मकानों को हटाने तक की कार्रवाई हुई, लेकिन एयरलाइंस कंपनियां अब भी नियमित उड़ानों को लेकर आश्वस्त नहीं हैं। एयरलाइंस कंपनियों का मानना है कि किसी भी नए रूट के लिए सालभर स्थिर यात्री संख्या जरूरी होती है। कुशीनगर में पर्यटन सीजन के दौरान यात्रियों की संख्या बढ़ती है, लेकिन पूरे साल स्थायी ट्रैफिक नहीं मिल पा रहा।
दूसरी ओर स्थानीय लोग मानते हैं कि अगर दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और खाड़ी देशों के लिए सीधी उड़ानें शुरू हों तो बिहार, नेपाल और पूर्वांचल के लाखों यात्रियों को इसका लाभ मिल सकता है। तीन दशक पहले जिला बनने के बाद जिस एयरपोर्ट को विकास की सबसे बड़ी उम्मीद माना गया था, आज वही एयरपोर्ट संभावनाओं और इंतजार के बीच खड़ा दिखाई देता है।

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राष्ट्रीय राजमार्ग सहित नवनिर्मित सड़कों ने बदली तस्वीर
-एनएच-27 से बिहार तक मिली फोरलेन की रफ्तार
-तमकुहीराज-बेतिया हाईवे सहित सिलीगुड़ी एक्सप्रेसवे से उम्मीद
कुशीनगर। जिला बनने के समय आवागमन के लिए खराब सड़कें प्रमुख समस्याओं में शामिल था। खराब सड़कों के चलते गांवों से जिला मुख्यालय तक पहुंचने में लोगों को घंटों लग जाते थे। यही,नहीं बिहार व नेपाल सीमा तक सफर करना बहुत मुश्किल माना जाता था। लेकिन तीन दशक में राष्ट्रीय राजमार्गों, फोरलेन परियोजनाओं और नए कॉरिडोर ने जिले की तस्वीर बदल दी। आज कुशीनगर पूर्वांचल, बिहार और नेपाल को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण सड़क नेटवर्क के रूप में उभर रहा है।
कुशीनगर की सड़क क्रांति की सबसे बड़ी पहचान एनएच-27 है। पहले एनएच-28 के नाम से पहचाने जाने वाला यह मार्ग अब पूर्व-पश्चिम कॉरिडोर का हिस्सा है। यह सड़क गोरखपुर, कुशीनगर और बिहार के गोपालगंज को जोड़ते हुए देश के बड़े नेटवर्क से जुड़ती है, जो बिहार बंगाल असम को जोड़ती है। फोरलेन बनने के बाद यात्रा का समय काफी घटा और फाजिलनगर, कसया, तमकुहीराज, हाटा तथा सेवरही जैसे कस्बों में सड़क किनारे बाजार और व्यावसायिक गतिविधियां तेजी से बढ़ीं। जिले में एनएच-27 पर ही अंडरपास और सड़क सुरक्षा परियोजनाओं पर भी तेजी से काम हो रहा है। हाटा के बाघनाथ, फाजिलनगर, सलेमगढ़ और पटहेरिया समेत कई स्थानों पर फ्लाइओवर परियोजनाएं शुरू की गईं हैं।
मुख्य जिला मार्ग सहित स्टेट हाईवे पर काम हुआ। कसया से देवरिया को जोड़ते हुए मुख्यालय को जोड़ने वाली सड़क बनी और अब यह सड़क देवरिया से कुशीनगर एयरपोर्ट तक डबल लेन भी बनेगी। इसके अलावा मुख्य जिला मार्ग में कसया से तुर्कपट्टी होते हुए सेवरही, पडरौना दुदही वाया तमकुही राज, पडरौना नेबुआ नौरंगिया कप्तानगंज वाया घुघली महराजगंज, पडरौना पनियहवा वाया खड्डा वाल्मिकीनगर, पडरौना पनियहवा मदनपुर वाया रामनगर बगहा, पडरौना खिरकिया वाया धनहा रतवल बेतिया सड़क नेटवर्क का सबसे बड़ा असर बिहार और नेपाल कनेक्टिविटी पर दिखा।
पहले पश्चिम चंपारण और गोपालगंज तक पहुंचने में लंबा चक्कर लगाना पड़ता था, लेकिन अब नई राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं ने दूरी कम करने की दिशा में काम शुरू किया है। तमकुहीराज से सेवरही-पिपराघाट होते हुए बेतिया को जोड़ने वाले एनएच -727ए ए प्रोजेक्ट को इसी बदलाव की बड़ी कड़ी माना जा रहा है। इस परियोजना में गंडक नदी पर महासेतु और नई सड़क बनने के बाद सेवरही से बेतिया की दूरी लगभग 225 किलोमीटर से घटकर करीब 21 किलोमीटर होने की उम्मीद जताई गई है।
इसके अलावा फाजिलनगर से तमकुहीराज सलेमपुर होते हुए बलिया तक जाने वाला एनएच-727 बी भी जिले की कनेक्टिविटी को मजबूत करने में अहम माना जा रहा है। इस मार्ग ने पूर्वांचल के कई जिलों के बीच सड़क संपर्क को बेहतर बनाया। नेपाल सीमा और बिहार के रास्ते व्यापारिक व पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए भी सड़क परियोजनाओं को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। गोरखपुर लिंक एक्सप्रेसवे और प्रस्तावित गोरखपुर-सिलीगुड़ी एक्सप्रेसवे जैसी परियोजनाओं से भी जिले को भविष्य में बड़ा लाभ मिलने की उम्मीद है। ये परियोजनाएं पूर्वांचल को बिहार और पूर्वोत्तर भारत से तेज रफ्तार संपर्क देंगी।

शिक्षा:-

स्लेट से मोबाइल पर पहुंची क्लास…गांव के स्कूलों में भी दिखने लगे स्मार्ट बोर्ड
पेड़ों के नीचे चलने वाली पढ़ाई से डिजिटल शिक्षा तक पहुंचा कुशीनगर
-कोरोना काल ने बदल दी स्कूलों की तस्वीर, पढ़ाई हुई हाइटेक

कुशीनगर। जिले के गांवों में बच्चे पेड़ों के नीचे बैठकर पढ़ाई करते दिखाई देते थे। गुरुकुल शिक्षा जैसा वातावरण रहता था। कई प्राइमरी स्कूलों में न पर्याप्त कमरे थे और न ही आधुनिक संसाधन। ब्लैकबोर्ड और स्लेट तक सीमित संसाधनों के बीच शिक्षा व्यवस्था चल रही थी। धीरे-धीरे बदलाव हो रहा था। लेकिन 2020 व 2021 में कोरोना महामारी ने इस बदलाव की रफ्तार को तेज व पूरी तरह से परिवर्तित करने का काम किया। कोविड के चलते लॉकडाउन में स्कूल बंद हुए तो पूरी पढ़ाई व्यवस्था ही मोबाइल स्क्रीन पर पहुंच गई। गांवों में जहां ऑनलाइन शिक्षा की कल्पना भी मुश्किल थी,वहां बच्चे व्हाट्सएप, वीडियो कॉल और यूट्यूब क्लास के जरिए पढ़ाई करने लगे।इसके अलावा जिले के कुछ प्रधानाचार्यों के सामूहिक प्रयास से प्राथमिक विद्यालय आदर्श बन गए जहां आधुनिक कमरे बन गए। स्मार्ट क्लास बन गया। इसके अलावा टैबलेट योजना और डिजिटल शिक्षा ने जिले के स्कूलों की तस्वीर बदलनी शुरू कर दी।
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कोरोना के बाद डिजिटल शिक्षा का दायरा और बढ़ा
जिले में प्राथमिक,उच्च प्राथमिक विद्यालय और कंपोजिट विद्यालय मिलाकर 2,464 परिषदीय विद्यालय हैं। कई परिषदीय स्कूलों में स्मार्ट क्लास और प्रोजेक्टर आधारित पढ़ाई की शुरुआत हुई है। रुदवलिया का प्राथमिक विद्यालय आदर्श बन गया। सेवरही का कतौरा का प्राथमिक विद्यालय नजीर बना। कई स्कूलों में ऑपरेशन कायाकल्प के तहत रंगाई-पुताई, स्मार्ट बोर्ड, शुद्ध पेयजल, टाइल्स और फर्नीचर जैसी सुविधाएं विकसित की गईं। राज्य सरकार की टैबलेट और स्मार्टफोन योजना ने कॉलेज और तकनीकी शिक्षा से जुड़े छात्रों को डिजिटल माध्यम से जोड़ने में बड़ी भूमिका निभाई। इसके बावजूद पिछले तीन दशकों में कुशीनगर की शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव दिखाई देता है। अब स्कूलों में स्मार्ट क्लास, डिजिटल बोर्ड और ऑनलाइन कंटेंट के जरिए बच्चे आधुनिक शिक्षा से जुड़ रहे हैं।
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गांव कस्बे बने… फिर नगर पंचायतों का दौर
कुशीनगर। जिला बनने के दौरान पडरौना और हाटा नगर के रूप में थे, लेकिन बाद में कसया, खड्डा, रामकोला, फाजिलनगर, सेवरही और तमकुहीराज जैसे क्षेत्रों का तेजी से विस्तार हुआ।बढ़ती आबादी और व्यापारिक गतिविधियों के चलते कई इलाकों को नगर पंचायत, नगर पालिका परिषद का दर्जा मिला। इससे सड़क, स्ट्रीट लाइट, सफाई और निर्माण कार्यों के लिए अलग बजट मिलने लगा। हालांकि बढ़ते शहरीकरण के साथ ट्रैफिक और जलनिकासी जैसी समस्याएं भी सामने आने लगीं और पडरौना के सुभाष चौक,फाजिलनगर में बघौच मोड़, हाटा में बाघनाथ चौराहा पर आज भी जाम की समस्या प्रमुख है।

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जिले की वर्तमान भौगोलिक में स्थिति

कुशीनगर मंडल मुख्यालय गोरखपुर से रेल व सड़क मार्ग से जुड़ा है। उत्तर पूर्व में बिहार, दक्षिण में देवरिया, पश्चिम में गोरखपुर व उत्तर पश्चिम में महराजगंज जिले की सीमा पड़ती है।
-2011 की जनगणना में 1639 राजस्व ग्राम थे। लेकिन 2023 के अनुसार वर्तमान में कुल 1445 ग्राम पंचायतें हैं।
- जिले में हाटा, कसया, तमकुहीराज, पडरौना, कप्तानगंज और खड्डा कुल छह तहसील हैं।
- जिले में तीन नगरपालिका व 10 नगर पंचायतें हैं।
- जिले में 14 विकासखंड हैं।
- जिले की प्रमुख नदियों में बड़ी गंडक (नारायनी), छोटी गंडक नदी, जो हेतिमपुर से होकर बहती है। इसके अलावा झरही व मौन नाला आदि हैं।
- 2011 के अनुसार जिले की जनसंख्या 35,64,544 है। इसमें 1818055 पुरुष व 17,46,589 महिला हैं। लिंगानुपात 1000:961 है।
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