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Kushinagar News: अंग्रेजों का रास्ता रोकने के लिए ध्वस्त कर दिया था पंसरवा और गगलवा पुल

Tue, 15 Aug 2023 12:33 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर Updated Tue, 15 Aug 2023 12:33 AM IST
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Pansarwa and Gagalwa bridges were demolished to block the way of the British
गन्ना अनुसंधान केंद्र में गेंदा सिंह की मूर्ति।संवाद
- स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और पूर्व मंत्री गेंदा सिंह ने तप्पीलाल, रामबरन भगत और रामपति चौधरी के साथ छेड़ा था आंदोलन
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- बभनौली और पटहेरवा में अंग्रेजों की नील की फैक्ट्री का किया था विरोध



- महात्मा गांधी की पश्चिमी चंपारण यात्रा में हुए थे शामिल

संवाद न्यूज एजेंसी

पडरौना। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और पूर्व मंत्री गेंदा सिंह ने तप्पीलाल, रामबरन भगत और रामपति चौधरी सहित अन्य सेनानियों के साथ मिलकर 1942 में अंग्रेजों के खिलाफ जबरदस्त आंदोलन छेड़ा था। अंग्रेजों का रास्ता रोकने के लिए कसया व तुर्कपटृी मार्ग पर पंसरवा गांव के पुल और पडरौना-तमकुहीरोड मार्ग पर गगलवा गांव में स्थित पुल को ध्वस्त कर दिया था। सेनानी झरही नदी किनारे जंगल में दुर्गा स्थान के पास जुटते थे और योजना बनाते थे। बभनौली और पटहेरवा में संचालित नील की फैक्ट्री का विरोध किया था तथा महात्मा गांधी की पश्चिमी चंपारण यात्रा में भी शामिल हुए थे।



गेंदा सिंह अपने साथी तप्पीलाल, रामबरन भगत व राजापाकड़ निवासी रामपति चौधरी जैसे क्रांतिकारी सपूतों के साथ गोरों के छक्के छुड़ा दिए थे। तब झरही नदी के किनारे जंगल में डमुर की दुर्गा माता का स्थान सेनानियों का ठिकाना हुआ करता था। बाबू गेंदा सिंह 1942 में गांधी के अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में शरीक हुए थे। अंग्रेज अफसर इसी क्षेत्र के बभनौली और पटहेरवा में रहकर नील और अफीम की खेती कराते थे। गेंदा सिंह व उनके मित्रों ने गांधी की पश्चिमी चंपारण से शुरू किए गए असहयोग आंदोलन में हिस्सा लेने के साथ ही पंडित गोविंद बल्लभ पंत के साथ काफी दिनों तक प्रदेश के कई हिस्सों में हुए आंदोलनों में भाग लिया। गगलवा पुल को ध्वस्त कराने पर पुलिस ने गेंदा सिंह और उनके पिता को गिरफ्तार कर लिया था। 1942 में गिरफ्तार बाबू गेंदा सिंह को बरेली जेल भेज दिया। वह वहां 1945 तक जेल में रहे। वह 1971 में कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़े और सांसद बने। केंद्र में उन्हें कृषि मंत्री भी बनाया गया था।
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बापू की याद में दुदही में बना गांधी चबूतरा अतिक्रमण का शिकार

दुदही। सुराजी बाजार के पास सेनानियों की तरफ से बनवाया गया गांधी चबूतरा अतिक्रमण का शिकार हो चुका है। इसे आम लोग तो भूल ही गए हैं, प्रशासन भी अपने हाल पर छोड़ दिया है। इससे चबूतरे का अस्तित्व खत्म होता नजर आ रहा है।
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वर्ष 1942 में गांधी जी की चंपारण यात्रा के बाद दुदही क्षेत्र के स्वतंत्रता सेनानियों की गतिविधियां तेज हुई थीं। दुदही बाज़ार में पोखरे के पास एक जगह पर स्वतंत्रता सेनानी बैठक कर रणनीति बनाते थे। इस बाजार को सुराजी बाज़ार के नाम से जाना जाने लगा। बापू के निधन के बाद स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बाबू गेंदा सिंह, सत्यनारायण गुप्ता, लुटावन प्रसाद, श्रीकिशुन गुप्ता, गया गुप्ता आदि ने बैठक वाली जगह पर चबूतरे का निर्माण कराया। इस जगह पर 1989 तक झंडारोहण किया गया। उसके बाद कुछ लोगों की अतिक्रमण के चलते झंडारोहण की परंपरा खत्म हो गई ।



- कस्बे के गोला बाजार निवासी किशोरी लाल बताते हैं कि जब गांधी जी का निधन हुआ तो स्वतंत्रता संग्राम सेनानी लुटावन, सत्यनारायण गुप्ता आदि ने यहां पर गांधी जी की प्रतिमा स्थापित की थी। उसके बाद प्रत्येक वर्ष झंडारोहण करने लगे।

- अजयनाथ आर्य का कहना है कि अपने पिता के साथ जाते थे। जब प्राथमिक विद्यालय में पढ़ने लगे तो बच्चों के साथ आते थे। चबूतरा पर झंडारोहण होता था।



- बनवारी लाल का कहना है सुराजी बाजार में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रणनीति बनाते थे। स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस पर झंडारोहण के समय काफी भीड़ लगती थी।


- चंद्रप्रकाश श्रीवास्तव का कहना है कि चबूतरा के पास उनका घर है। जब झंडारोहण होता था तो अपने पिता के साथ जाते थे। काफी दिनों तक झंडारोहण किया गया, लेकिन अब तो अस्तित्व समाप्त हो रहा है।
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