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कोरोना के दर्द के साथ हुआ लोकरंग का समापन
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फाजिलनगर क्षेत्र के जोगियां गांव में चल रहे लोकरंग कार्यक्रम महोत्सव में वर्तमान समय की परिस्थि
- फोटो : KUSHINAGAR
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कोरोना के दर्द के साथ हुआ लोकरंग का समापन
- भित्ति चित्रों के माध्यम से कही गई किसान, शिक्षा, पर्यावरण की बातें
संवाद न्यूज एजेंसी
फाजिलनगर। जोगिया जनूबी पट्टी गांव में चल रहे लोकरंग का विषय तो लोक संकट और लोक साहित्य था लेकिन महोत्सव में वर्तमान समय की परिस्थितयों के चित्र लॉकडाउन के दौरान लोगों की परेशानियों के दर्द को बयां कर रहा था। कार्यक्रम स्थल की दीवारें देश के चर्चित विषय को रेखांकित कर रहे थे।
संभावना कला केंद्र गाजीपुर के कलाकारों ने कोरोना और लॉकडाउन के दौरान बेरोजगार मजदूरों के पलायन का चित्र खास चर्चा का विषय रहा। चित्र में साइकिल पर बंधे सामान के बीच बांध कर लटकाए गए बच्चे की तस्वीर पैदल निकल पड़े मजदूर वर्ग की व्यथा को शब्द दे रहे थे। लॉकडाउन के दौरान बंद पड़े स्कूली शिक्षा को मोबाइल और लैपटॉप के जरिये भले ही जारी रखने का दावा किया गया लेकिन लोकरंग द्वारा ऑफलाइन शिक्षा की महत्ता को भी आवाज देने का प्रयास किया गया है। देश में चल रहे किसान आंदोलन का चित्र भी चर्चित रहा। हालांकि चित्र का एक हिस्सा किसान आंदोलन में सरकार की हठधर्मिता की कहानी कह रहा था। देश और दुनिया में पर्यावरण प्रदूषण पर चल रहा बहस भी लोकरंग में अपनी जगह बनाने में सफल रहा। वृक्ष को संतान की तरह सुरक्षा देने की मुहिम कहीं न कहीं महोत्सव की पर्यावरण संरक्षण की चिंता को बयां कर रहा था। हर बार की तरह इस बार भी सांस्कृतिक भड़ैती, फूहड़पन के विरोध के साथ देश की समृद्ध परंपरा जैसे सोहर, कजरी, पीड़िया गीत तथा भोजपुरी भाषा की मिठास को प्रोत्साहन मिलता दिखा।
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हिरावल की प्रस्तुति से शुरू हुआ कार्यक्रम
फाजिलनगर। लोकरंग की दूसरी शाम के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आगाज पटना से आए हिरावल के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत गीतों से हुआ है। इस टीम में संतोष झा, प्रीति प्रभा, ब्यूटी रंजना, खुशबू, राजन कुमार, राजेश रंजन, सुमन कुमार और नितिन शामिल थे। जनगीतों के गायन में हिरावल ने अपना खास मुकाम बनाया है। हिरावल ने निराला, नागार्जुन, त्रिलोचन, गोरख पांडेय, फैज, मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह, वीरेन डंगवाल, महेश्वर, रमता जी की रचनाओं को संगीतबद्ध किया है और गाया है। हिरावल टीम के संतोष झा का कहना है कि उनकी टीम ऐसे रचनाओं को गायन के लिए चुनती है जो हमें सोचने के लिए विवश करती है और समाज को बदलाव के लिए प्रेरित करती है। हिरावल की टीम इसके पहले भी जोगिया गांव के लोकरंग के मुक्ताकाशी मंच पर अपनी गायकी का जलवा बिखेर चुकी है। हिरावल ने 40 मिनट की प्रस्तुति में सबसे पहले प्रसिद्ध पारंपरिक अवधी सोहर ‘छापक पेड़ छिउलिया’ की प्रस्तुति दी। इसके बाद महेश्वर की रचना ‘कौन रंगरेजवा रंगे मोरे चुनरी’ सुनाया। ‘अब न करब हम गुलमिया तोहार भेजे चाहे जेलिया हो’ के बाद गोरख पांडेय के ‘गुलमिया अब हम नहीं बजइबो , अजदिया हमरा के भावेला’ की प्रस्तुति ने दर्शकों का दिल जीत लिया। इसके बाद दक्षिण अफ्रीका से आए भोजपुरी गायक केम चंदलाल, राजस्थानी लोकगीत, बुंदेलखंड का लोक नृत्य राई और असम के लोक नृत्य बिहू की प्रस्तुति हुई। रात में पौने दो बजे आयोजक सुभाष चंद्र कुशवाहा ने सभी के प्रति आभार प्रकट कर कार्यक्रम का समापन कराया। संवाद
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- भित्ति चित्रों के माध्यम से कही गई किसान, शिक्षा, पर्यावरण की बातें
संवाद न्यूज एजेंसी
फाजिलनगर। जोगिया जनूबी पट्टी गांव में चल रहे लोकरंग का विषय तो लोक संकट और लोक साहित्य था लेकिन महोत्सव में वर्तमान समय की परिस्थितयों के चित्र लॉकडाउन के दौरान लोगों की परेशानियों के दर्द को बयां कर रहा था। कार्यक्रम स्थल की दीवारें देश के चर्चित विषय को रेखांकित कर रहे थे।
संभावना कला केंद्र गाजीपुर के कलाकारों ने कोरोना और लॉकडाउन के दौरान बेरोजगार मजदूरों के पलायन का चित्र खास चर्चा का विषय रहा। चित्र में साइकिल पर बंधे सामान के बीच बांध कर लटकाए गए बच्चे की तस्वीर पैदल निकल पड़े मजदूर वर्ग की व्यथा को शब्द दे रहे थे। लॉकडाउन के दौरान बंद पड़े स्कूली शिक्षा को मोबाइल और लैपटॉप के जरिये भले ही जारी रखने का दावा किया गया लेकिन लोकरंग द्वारा ऑफलाइन शिक्षा की महत्ता को भी आवाज देने का प्रयास किया गया है। देश में चल रहे किसान आंदोलन का चित्र भी चर्चित रहा। हालांकि चित्र का एक हिस्सा किसान आंदोलन में सरकार की हठधर्मिता की कहानी कह रहा था। देश और दुनिया में पर्यावरण प्रदूषण पर चल रहा बहस भी लोकरंग में अपनी जगह बनाने में सफल रहा। वृक्ष को संतान की तरह सुरक्षा देने की मुहिम कहीं न कहीं महोत्सव की पर्यावरण संरक्षण की चिंता को बयां कर रहा था। हर बार की तरह इस बार भी सांस्कृतिक भड़ैती, फूहड़पन के विरोध के साथ देश की समृद्ध परंपरा जैसे सोहर, कजरी, पीड़िया गीत तथा भोजपुरी भाषा की मिठास को प्रोत्साहन मिलता दिखा।
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हिरावल की प्रस्तुति से शुरू हुआ कार्यक्रम
फाजिलनगर। लोकरंग की दूसरी शाम के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आगाज पटना से आए हिरावल के कलाकारों द्वारा प्रस्तुत गीतों से हुआ है। इस टीम में संतोष झा, प्रीति प्रभा, ब्यूटी रंजना, खुशबू, राजन कुमार, राजेश रंजन, सुमन कुमार और नितिन शामिल थे। जनगीतों के गायन में हिरावल ने अपना खास मुकाम बनाया है। हिरावल ने निराला, नागार्जुन, त्रिलोचन, गोरख पांडेय, फैज, मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह, वीरेन डंगवाल, महेश्वर, रमता जी की रचनाओं को संगीतबद्ध किया है और गाया है। हिरावल टीम के संतोष झा का कहना है कि उनकी टीम ऐसे रचनाओं को गायन के लिए चुनती है जो हमें सोचने के लिए विवश करती है और समाज को बदलाव के लिए प्रेरित करती है। हिरावल की टीम इसके पहले भी जोगिया गांव के लोकरंग के मुक्ताकाशी मंच पर अपनी गायकी का जलवा बिखेर चुकी है। हिरावल ने 40 मिनट की प्रस्तुति में सबसे पहले प्रसिद्ध पारंपरिक अवधी सोहर ‘छापक पेड़ छिउलिया’ की प्रस्तुति दी। इसके बाद महेश्वर की रचना ‘कौन रंगरेजवा रंगे मोरे चुनरी’ सुनाया। ‘अब न करब हम गुलमिया तोहार भेजे चाहे जेलिया हो’ के बाद गोरख पांडेय के ‘गुलमिया अब हम नहीं बजइबो , अजदिया हमरा के भावेला’ की प्रस्तुति ने दर्शकों का दिल जीत लिया। इसके बाद दक्षिण अफ्रीका से आए भोजपुरी गायक केम चंदलाल, राजस्थानी लोकगीत, बुंदेलखंड का लोक नृत्य राई और असम के लोक नृत्य बिहू की प्रस्तुति हुई। रात में पौने दो बजे आयोजक सुभाष चंद्र कुशवाहा ने सभी के प्रति आभार प्रकट कर कार्यक्रम का समापन कराया। संवाद
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