{"_id":"5ad249d74f1c1b56098b48a2","slug":"local-struggle-to-start-from-home","type":"story","status":"publish","title_hn":"‘लोकतंत्र की लड़ाई घर से शुरू करनी होगी’","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
‘लोकतंत्र की लड़ाई घर से शुरू करनी होगी’
कुश्ाीनगर (ब्यूरो)
Updated Sun, 15 Apr 2018 12:05 AM IST
विज्ञापन
कलाकार
- फोटो : कुश्ाीनगर ब्यूरो
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
फाजिलनगर। क्षेत्र के जोगियां गांव में 11वें वर्ष आयोजित लोकरंग कार्यक्रम के दूसरे दिन शनिवार को दोपहर में ‘समाजिकता के निर्माण में लोकनाट्य की भूमिका’ विषय पर संगोष्ठी हुई। इसमें प्रख्यात इतिहासकार प्रो. लालबहादुर वर्मा ने कहा कि सामाजिकता के बिना मनुष्य, मनुष्य नहीं रह सकता। आज सारा षड्यंत्र इसी बात का है कि हम सामाजिक न रह जाएं।
उन्होंने कहा कि मनुष्य सामाजिक होने के साथ-साथ सांस्कृतिक प्राणी है। नाटक तभी चरितार्थ होता है, जब वह दर्शकों के सामने प्रदर्शित होता है। दर्शक भी नाटक को रचते हैैं। उन्होंने समाज और देश को लोकतांत्रिक बनाने की लड़ाई घर से शुरू करने का आह्वान किया।
वरिष्ठ साहित्यकार प्रेम कुमार मणि ने कहा कि सामाजिकता के निर्माण में समाज और मनुष्यता का एक अंतरसंबंध बनता है। हमारे सामने प्राकृतिक न्याय और सामाजिक न्याय के सवाल हैं। प्राकृतिक न्याय जिसकम लाठी उसकी भैंस का न्याय है, जबकि सामाजिक न्याय कमजोर पषर शासन, शोषण का विरोध करता है और सबके लिए न्याय सुनिश्चित करता है। लोकनाट्य ने जमींदारों, अमीरों के खिलाफ समानता के पक्ष में आवाज बुलंद की है। स्त्री के खिलाफ अन्याय, गरीबी के सवाल को प्रमुखता से उठाया।
विज्ञापन
इसके पहले संगोष्ठी की शुरुआत ग्वालियर से आए नाट्यकर्मी योगेंद्र चौबे ने की। उन्होंने कहा कि लोककलाएं कभी प्रदर्शन के लिए नहीं बनीं। आज लोकनाट्य को परंपरा की पैकेजिंग के नाम पर परोसा जा रहा है। लोककलाएं, लोकप्रियता के दबाव में आ रही हैं, जिसे मुक्त कराने के लिए संघर्ष की जरुरत है। रीवा विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. दिनेश कुशवाह ने कहा कि लोकनाट्य में तरह-तरह के प्रतिरोध दिखते हैं। भिखारी ठाकुर ने ‘बेटी बेचवा’ का प्रोदर्शन किया तो इसने एक आंदोलन का रूप ले लिया था।
कवि बलभद्र ने जनकवि रमता को याद करते हुए कहा कि लोकनाट्य से सामाजिकता की पहचान होती है। सामाजिक निर्माण की दिशा क्या हो, उसका विकास कैसे हो, इस पर विचार करने की जरुरत है और उसके अनुरूप कार्य करने की आवश्यकता है। वरिष्ठ कथाकार मदन मोहन ने कहा कि नाटक लोगों से संवाद का सबसे प्रभावशाली माध्यम है। भिखारी ठाकुर, हबीब तनवीर की परंपरा का विकास क्यों अवरूद्ध हुआ, यह हमारी चिंता का विषय है।
पत्रकार एवं जन संस्कृति मंच के महासचिव मनोज कुमार सिंह ने डॉ. अंबेडकर को उनकी जयंती पर याद करते हुए कहा कि डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि भारत में यदि गैरबराबरी और सामाजिक विषमता खत्म नहीं की गई तो संवैधानिक लोकतंत्र विफल हो जाएगा। आज यह सच होता दिखाई देता है। सामाजिक विषमता के खिलाफ हजारों वर्षों की लड़ाई को तीखा और निर्णायक बनाने में सांस्कृतिक आंदोलन की महत्वपूर्ण भूमिका है।
सामाजिक कार्यकर्ता एवं लेखक विद्याभूषण रावत ने कहा कि डॉ. अंबेडकर के विचारों की बुनियाद पर काउंटर कल्चरल नैरेटिव को स्थापित करने की जरूरत है। ज्ञान पर एक समुदाय का कब्जा है और वही दलित साहित्य को व्याख्यायित कर रहा है। सभी परम्पराएं महान नहीं होती हैं। देहरादून से आईं सामाजिक कार्यकर्ता गीता गैरोला ने देहरादून में सामाजिक संस्कारों में पितृसत्तात्मक मूल्यों के खिलाफ किए जा रहे कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि लोकगाथाओं में महिलाओं का चरित्र चित्रण नकारत्मक है, जिसे बदलने की जरूरत है।
कवि-कथाकार-नाटककार सुरेश कांटक ने कहा कि लोक नाटकों का उपज ही सामाजिक विषमता के खिलाफ विद्रोह से हुआ। शिष्ट साहित्य ने समाज के बड़े हिस्से को अंधेरे में रखने की कोशिश की है। लेखक-पत्रकार सिद्धार्थ ने कहा कि डॉ. अंबेडकर ने बहुत साफ तौर पर कह दिया था कि देश के अंदर जाति व्यवस्था और पितृसत्ता के रहते सामाजिकता, बंधुता पनप ही नहीं सकती।
संगोष्ठी में लेखक मोतीलाल, राम प्रकाश कुशवाहा, डॉ. जितेंद्र भारती आदि ने अपने विचार रखे और लोकनाटकों के साथ अपने अनुभव को साझा किया।धन्यवाद ज्ञापन लोकरंग के आयोजन सुभाष चंद्र कुशवाहा ने किया। संचालन डॉ महेंद्र कुशवाहा ने किया।
विज्ञापन
उन्होंने कहा कि मनुष्य सामाजिक होने के साथ-साथ सांस्कृतिक प्राणी है। नाटक तभी चरितार्थ होता है, जब वह दर्शकों के सामने प्रदर्शित होता है। दर्शक भी नाटक को रचते हैैं। उन्होंने समाज और देश को लोकतांत्रिक बनाने की लड़ाई घर से शुरू करने का आह्वान किया।
विज्ञापन
वरिष्ठ साहित्यकार प्रेम कुमार मणि ने कहा कि सामाजिकता के निर्माण में समाज और मनुष्यता का एक अंतरसंबंध बनता है। हमारे सामने प्राकृतिक न्याय और सामाजिक न्याय के सवाल हैं। प्राकृतिक न्याय जिसकम लाठी उसकी भैंस का न्याय है, जबकि सामाजिक न्याय कमजोर पषर शासन, शोषण का विरोध करता है और सबके लिए न्याय सुनिश्चित करता है। लोकनाट्य ने जमींदारों, अमीरों के खिलाफ समानता के पक्ष में आवाज बुलंद की है। स्त्री के खिलाफ अन्याय, गरीबी के सवाल को प्रमुखता से उठाया।
विज्ञापन
इसके पहले संगोष्ठी की शुरुआत ग्वालियर से आए नाट्यकर्मी योगेंद्र चौबे ने की। उन्होंने कहा कि लोककलाएं कभी प्रदर्शन के लिए नहीं बनीं। आज लोकनाट्य को परंपरा की पैकेजिंग के नाम पर परोसा जा रहा है। लोककलाएं, लोकप्रियता के दबाव में आ रही हैं, जिसे मुक्त कराने के लिए संघर्ष की जरुरत है। रीवा विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. दिनेश कुशवाह ने कहा कि लोकनाट्य में तरह-तरह के प्रतिरोध दिखते हैं। भिखारी ठाकुर ने ‘बेटी बेचवा’ का प्रोदर्शन किया तो इसने एक आंदोलन का रूप ले लिया था।
कवि बलभद्र ने जनकवि रमता को याद करते हुए कहा कि लोकनाट्य से सामाजिकता की पहचान होती है। सामाजिक निर्माण की दिशा क्या हो, उसका विकास कैसे हो, इस पर विचार करने की जरुरत है और उसके अनुरूप कार्य करने की आवश्यकता है। वरिष्ठ कथाकार मदन मोहन ने कहा कि नाटक लोगों से संवाद का सबसे प्रभावशाली माध्यम है। भिखारी ठाकुर, हबीब तनवीर की परंपरा का विकास क्यों अवरूद्ध हुआ, यह हमारी चिंता का विषय है।
पत्रकार एवं जन संस्कृति मंच के महासचिव मनोज कुमार सिंह ने डॉ. अंबेडकर को उनकी जयंती पर याद करते हुए कहा कि डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि भारत में यदि गैरबराबरी और सामाजिक विषमता खत्म नहीं की गई तो संवैधानिक लोकतंत्र विफल हो जाएगा। आज यह सच होता दिखाई देता है। सामाजिक विषमता के खिलाफ हजारों वर्षों की लड़ाई को तीखा और निर्णायक बनाने में सांस्कृतिक आंदोलन की महत्वपूर्ण भूमिका है।
सामाजिक कार्यकर्ता एवं लेखक विद्याभूषण रावत ने कहा कि डॉ. अंबेडकर के विचारों की बुनियाद पर काउंटर कल्चरल नैरेटिव को स्थापित करने की जरूरत है। ज्ञान पर एक समुदाय का कब्जा है और वही दलित साहित्य को व्याख्यायित कर रहा है। सभी परम्पराएं महान नहीं होती हैं। देहरादून से आईं सामाजिक कार्यकर्ता गीता गैरोला ने देहरादून में सामाजिक संस्कारों में पितृसत्तात्मक मूल्यों के खिलाफ किए जा रहे कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि लोकगाथाओं में महिलाओं का चरित्र चित्रण नकारत्मक है, जिसे बदलने की जरूरत है।
कवि-कथाकार-नाटककार सुरेश कांटक ने कहा कि लोक नाटकों का उपज ही सामाजिक विषमता के खिलाफ विद्रोह से हुआ। शिष्ट साहित्य ने समाज के बड़े हिस्से को अंधेरे में रखने की कोशिश की है। लेखक-पत्रकार सिद्धार्थ ने कहा कि डॉ. अंबेडकर ने बहुत साफ तौर पर कह दिया था कि देश के अंदर जाति व्यवस्था और पितृसत्ता के रहते सामाजिकता, बंधुता पनप ही नहीं सकती।
संगोष्ठी में लेखक मोतीलाल, राम प्रकाश कुशवाहा, डॉ. जितेंद्र भारती आदि ने अपने विचार रखे और लोकनाटकों के साथ अपने अनुभव को साझा किया।धन्यवाद ज्ञापन लोकरंग के आयोजन सुभाष चंद्र कुशवाहा ने किया। संचालन डॉ महेंद्र कुशवाहा ने किया।