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संरक्षण और खुदाई के अभाव में बर्बाद हो रही धरोहर
कुश्ाीनगर (ब्यूरो)
Updated Wed, 18 Apr 2018 12:16 AM IST
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स्तूूप
- फोटो : कुश्ाीनगर ब्यूरो
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पडरौना। भगवान राम के पुत्र कुश की राजधानी कुशावती से अस्तित्व में रहे कुशीनगर के तमाम पुरावशेष संरक्षण व खुदाई के अभाव में समाप्त हो रहे हैं। फाजिलनगर से तुर्कपट्टी के बीच 14 किलोमीटर के दायरे में आधा दर्जन से अधिक स्थान ऐसे हैं जहां से जब-तब भगवान बुद्घ, भगवान महावीर और गुप्तकालीन सभ्यता से जुड़ी वस्तुएं मिलती रहती हैं। तुर्कपट्टी क्षेत्र के छहूं गांव के एक टीले के आसपास लोग जब भी मिट्टी कटवाते हैं तो प्राचीन मूर्तियां मिलती हैं। दो वर्ष में ही इस टीले से काटी गई मिट्टी नसे आठ मूर्तियां मिल चुकी हैं। इतिहासकार सभी मूर्तियों को गुप्तकालीन मान चुके हैं। परंतु यहां मिली मूर्तियों को भी गांव के एक अधूरे मंदिर में दीवार से जोड़कर रखा गया है।
कुशीनगर की खोज 19वीं शताब्दी में हुई थी। यहां उत्खनन के दौरान भगवान बुद्घ की लेटी प्रतिमा, स्तूप समेत तमाम अवशेष ऐसे मिले थे जिससे इस जगह की पुष्टि ईसा पूर्व छठीं सदी के राज्य कुशीनारा के रूप में हुई थी। इतिहासकारों ने इसी आधार पर दूसरे राज्य पावा की भी खोज शुरू की थी। फाजिलनगर क्षेत्र के सठियांव और उस्मानपुर वीरभारी के टीलों से मिले प्रमाण के बाद फाजिलनगर को ही भगवान बुद्घ के समकालीन व जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान महावीर का परिनिर्वाण स्थल पावा माना गया। फाजिलनगर से छह किलोमीटर और कुशीनगर से 20 किलोमीटर दूर तुर्कपट्टी में भगवान बुद्घ की प्रतिमा मिली जिसे गुप्तकालीन माना गया। इसके बाद भारतीय पुरातत्व विभाग ने कुशीनगर के महापरिनिर्वाण मंदिर परिसर, रामाभार स्तूप परिसर, माथाकुंवर मंदिर परिसर, अनिरुद्घवां का टीला, पडरौना नगर के छावनी का टीला, फाजिलनगर कोट, सठियांव का स्तूप, उस्मानपुर वीरभारी का टीला को संरक्षित घोषित कर दिया। इनमेों से केवल कुशीनगर के संरक्षित स्थानों की ही खुदाई पूरी हुई। बाकी जगहों को पुरातत्व विभाग ने संरक्षित घोषित कर छोड़ दिया।
कसया तहसील के छहूं गांव में प्राचीन टीले का कुछ ही हिस्सा अब शेष बचा है। इस टीले को आसपास के लोगों ने काटकर खेत बना लिया है। बीते चार दशक में यहां दो दर्जन मूर्तियां मिल चुकी हैं। परंतु संरक्षण के अभाव में अधिकांश का अब अता-पता नहीं है। बीते वर्ष अप्रैल में यहां मंदिर की बाउंड्री के लिए हो रही खुदाई के दौरान विभिन्न देवी देवताओं की सात मूर्तियां मिली थीं। गोरखपुर की संस्था इंटेक से जुड़े इतिहासकार विश्वनाथ प्रसाद कंदोई व उनकी टीम ने इन सभी मूर्तियों को गुप्तकालीन बताया था। राज्य पुरातत्व विभाग की टीम ने भी इनके गुप्त कालीन होने की पुष्टि की। लेकिन इनके संरक्षण का उपाय नहीं किया गया। इन मूर्तियों को गांव के अर्द्घ निर्मित मंदिर की एक दीवार में सीमेंट से जोड़कर रखा गया है। पिछले सप्ताह फिर इसी गांव में करीब तीन फिट ऊंची प्रतिमा मिली थी जिसे गांव के मंदिर में ही रखा गया है।
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कुशीनगर के पुरातात्विक स्थलों की खोज में लगातार सक्रिय फाजिलनगर क्षेत्र के निवासी इतिहासकार डॉक्टर श्यामसुंदर सिंह व इंटेक संस्था से जुड़े इतिहासकार विश्वनाथ प्रसाद कंदोई का कहना है कि वर्षों से संरक्षित इन टीलों की खुदाई नहीं होने से यहां दबी ऐतिहासिक वस्तुओं का क्षरण हो रहा है। पुरातत्व विभाग से कई बार इन स्थलों के उत्खनन के लिए अनुरोध किया गया है। खुदाई होने से बौद्घ और गुप्तकालीन सभ्यता से जुड़ी तमाम नई जानकारी दुनिया को मिलेगी। इससे कुशीनगर को भी विश्व मानचित्र पर नई जगह मिलेगी।
कुशीनगर स्थित पुरातत्व विभाग के वरिष्ठ संरक्षक सहायक इंजीनियर पंकज तिवारी का कहना है कि भारतीय पुरातत्व विभाग की तरफ से जिन स्थलों को संरक्षित किया गया है, वहां बाउंड्रीवाल आदि भी कराया गया है। वीरभारी के टीले की कुछ खुदाई भी हो चुकी है। भविष्य में इनकी खुदाई होनी है। टीलों के संरक्षण के लिए विभाग लगातार आसपास के लोगों को जागरूक करता रहता है।
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कुशीनगर की खोज 19वीं शताब्दी में हुई थी। यहां उत्खनन के दौरान भगवान बुद्घ की लेटी प्रतिमा, स्तूप समेत तमाम अवशेष ऐसे मिले थे जिससे इस जगह की पुष्टि ईसा पूर्व छठीं सदी के राज्य कुशीनारा के रूप में हुई थी। इतिहासकारों ने इसी आधार पर दूसरे राज्य पावा की भी खोज शुरू की थी। फाजिलनगर क्षेत्र के सठियांव और उस्मानपुर वीरभारी के टीलों से मिले प्रमाण के बाद फाजिलनगर को ही भगवान बुद्घ के समकालीन व जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान महावीर का परिनिर्वाण स्थल पावा माना गया। फाजिलनगर से छह किलोमीटर और कुशीनगर से 20 किलोमीटर दूर तुर्कपट्टी में भगवान बुद्घ की प्रतिमा मिली जिसे गुप्तकालीन माना गया। इसके बाद भारतीय पुरातत्व विभाग ने कुशीनगर के महापरिनिर्वाण मंदिर परिसर, रामाभार स्तूप परिसर, माथाकुंवर मंदिर परिसर, अनिरुद्घवां का टीला, पडरौना नगर के छावनी का टीला, फाजिलनगर कोट, सठियांव का स्तूप, उस्मानपुर वीरभारी का टीला को संरक्षित घोषित कर दिया। इनमेों से केवल कुशीनगर के संरक्षित स्थानों की ही खुदाई पूरी हुई। बाकी जगहों को पुरातत्व विभाग ने संरक्षित घोषित कर छोड़ दिया।
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कसया तहसील के छहूं गांव में प्राचीन टीले का कुछ ही हिस्सा अब शेष बचा है। इस टीले को आसपास के लोगों ने काटकर खेत बना लिया है। बीते चार दशक में यहां दो दर्जन मूर्तियां मिल चुकी हैं। परंतु संरक्षण के अभाव में अधिकांश का अब अता-पता नहीं है। बीते वर्ष अप्रैल में यहां मंदिर की बाउंड्री के लिए हो रही खुदाई के दौरान विभिन्न देवी देवताओं की सात मूर्तियां मिली थीं। गोरखपुर की संस्था इंटेक से जुड़े इतिहासकार विश्वनाथ प्रसाद कंदोई व उनकी टीम ने इन सभी मूर्तियों को गुप्तकालीन बताया था। राज्य पुरातत्व विभाग की टीम ने भी इनके गुप्त कालीन होने की पुष्टि की। लेकिन इनके संरक्षण का उपाय नहीं किया गया। इन मूर्तियों को गांव के अर्द्घ निर्मित मंदिर की एक दीवार में सीमेंट से जोड़कर रखा गया है। पिछले सप्ताह फिर इसी गांव में करीब तीन फिट ऊंची प्रतिमा मिली थी जिसे गांव के मंदिर में ही रखा गया है।
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कुशीनगर के पुरातात्विक स्थलों की खोज में लगातार सक्रिय फाजिलनगर क्षेत्र के निवासी इतिहासकार डॉक्टर श्यामसुंदर सिंह व इंटेक संस्था से जुड़े इतिहासकार विश्वनाथ प्रसाद कंदोई का कहना है कि वर्षों से संरक्षित इन टीलों की खुदाई नहीं होने से यहां दबी ऐतिहासिक वस्तुओं का क्षरण हो रहा है। पुरातत्व विभाग से कई बार इन स्थलों के उत्खनन के लिए अनुरोध किया गया है। खुदाई होने से बौद्घ और गुप्तकालीन सभ्यता से जुड़ी तमाम नई जानकारी दुनिया को मिलेगी। इससे कुशीनगर को भी विश्व मानचित्र पर नई जगह मिलेगी।
कुशीनगर स्थित पुरातत्व विभाग के वरिष्ठ संरक्षक सहायक इंजीनियर पंकज तिवारी का कहना है कि भारतीय पुरातत्व विभाग की तरफ से जिन स्थलों को संरक्षित किया गया है, वहां बाउंड्रीवाल आदि भी कराया गया है। वीरभारी के टीले की कुछ खुदाई भी हो चुकी है। भविष्य में इनकी खुदाई होनी है। टीलों के संरक्षण के लिए विभाग लगातार आसपास के लोगों को जागरूक करता रहता है।