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Kushinagar News: कथा, करवा और सामूहिक पूजा से गिफ्ट और डिनर तक, बदल गया करवा चौथ

Thu, 29 Oct 2026 02:05 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Thu, 29 Oct 2026 02:05 AM IST
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From the *katha*, *karwa* (earthen pot), and communal worship to gifts and dinner Karwa Chauth has evolved.
बुजुर्गों के दौर में मिट्टी के करवे, सामूहिक पूजा और कथा में था अपनापन, नई पीढ़ी के लिए व्रत के साथ गिफ्ट और डिनर भी खास
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पडरौना। करवाचौथ पर चांद के दीदार और छलनी से पति का चेहरा देखने की परंपरा लंबे समय से कायम है लेकिन त्योहार मनाने का अंदाज बदल गया है। पहले मिट्टी के करवे, सामूहिक पूजा और कथा में अपनापन झलकता था। वहीं अब मेहंदी, साज-शृंगार, उपहार और डिनर भी करवाचौथ के उत्सव का हिस्सा बन गए हैं।
करवा चौथ का व्रत, चांद के दीदार की परंपरा और छलनी से पति का चेहरा देखने की रस्म आज भी वही है, लेकिन इसे मनाने का अंदाज बदल गया है। दो पीढ़ियों के अनुभव बताते हैं कि समय के साथ परंपराओं का स्वरूप बदला है लेकिन रिश्तों में प्रेम और विश्वास की अहमियत पहले की तरह ही बरकरार है।
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बुजुर्ग महिलाओं के मुताबिक, पहले करवा चौथ की तैयारियां कई दिन पहले से शुरू हो जाती थीं। मिट्टी के करवे की खरीदारी, पूजा की थाली सजाना और आसपास की महिलाओं के साथ सामूहिक रूप से पूजा करना त्योहार का खास हिस्सा होता था। महिलाएं एक जगह जुटती थीं, करवा चौथ की कथा सुनती थीं और एक-दूसरे को व्रत की शुभकामनाएं देती थीं। उस दौर में सीमित संसाधनों के बावजूद त्योहार में अपनापन और सामूहिकता की झलक दिखाई देती थी।
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वहीं, युवा महिलाओं का कहना है कि व्रत की धार्मिक मान्यताएं और परंपराएं आज भी महत्वपूर्ण हैं लेकिन बदलती जीवनशैली ने उत्सव के तरीके को नया रूप दिया है। महिलाएं पारंपरिक परिधान, डिजाइनर मेहंदी और आकर्षक साज-शृंगार के साथ त्योहार को खास बनाती हैं। कई परिवारों में पति अपनी पत्नी को उपहार देते हैं और व्रत खोलने के बाद साथ में डिनर पर जाने की योजना बनाते हैं।
ऑनलाइन खरीदारी और सोशल मीडिया ने भी त्योहार की तैयारियों को नया अंदाज दिया है। दोनों पीढ़ियों की बातों में एक समानता साफ नजर आती है। बुजुर्गों के लिए करवा चौथ परिवार और समाज के साथ जुड़ाव का अवसर था तो युवाओं के लिए यह पति-पत्नी के रिश्ते में प्रेम जताने और साथ में यादगार पल बिताने का मौका भी है। समय के साथ पूजा की तैयारियों और उत्सव के तरीकों में बदलाव जरूर आया है लेकिन चांद के इंतजार और व्रत पूरा होने की खुशी का एहसास आज भी उतना ही खास है।
स्पीकअप
हमारे जमाने में करवा चौथ का मतलब था सुबह चार बजे उठकर सरगी करना। सास सरगी देती थीं, जिसमें फेनी, पूड़ी और मिठाई होती थी। शाम को मोहल्ले की 10-12 महिलाएं एक आंगन में इकट्ठा होतीं, करवा रखकर कथा सुनतीं। चांद निकलने पर छलनी से चांद और फिर पति का चेहरा देखती थीं।
- नर्वदा देवी
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मिट्टी का करवा बाजार से लाते थे। मेहंदी पीसकर लगाते थे। न तो पार्लर था न कैमरा। पति से घूंघट में ही बात होती थी। त्योहार में दिखावा नहीं, अपनापन था। अब बहुएं दिनभर भूखी रहती हैं, पर शाम को फोटो खिंचवाती हैं।
-संगीता देवी।
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व्रत और श्रद्धा वही है लेकिन हम इसे सेलिब्रेट भी करते हैं। एक हफ्ते पहले से मेहंदी आर्टिस्ट बुक किया, पार्लर का अपॉइंटमेंट लिया। शाम को पति के साथ चांद देखने के बाद हम रेस्टोरेंट में डिनर करने जाते हैं। पति ने मेरे लिए गिफ्ट भी लिए हैं।

-सविता देवी।
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मैंने और मेरे पति ने तय किया है कि इस बार दोनों व्रत रखेंगे। प्रेम एकतरफा नहीं होना चाहिए। मैं व्रत रखती हूं तो वे भी मेरा सम्मान करते हुए साथ देते हैं। हम चांद की फोटो नहीं, एक-दूसरे के साथ फोटो इंस्टा पर डालेंगे। बुजुर्गों को लग सकता है कि दिखावा है पर हमारे लिए यही यादें हैं।
-प्रतिभा सिंह।
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