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अमृत महोत्सव: आजादी की लड़ाई में दुदही के क्रांतिकारी नहीं थे पीछे, 74 लोगों को अंग्रेजों दी थी कठोर सजा
Sat, 06 Aug 2022 04:02 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर।
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर।
Published by: गोरखपुर ब्यूरो
Updated Sat, 06 Aug 2022 04:02 PM IST
सार
अंग्रेजों ने कई गांव जला दिए थे। क्रूरता की हदें पार करते हुए मंगल भगत को जिंदा जला दिया। आंदोलन दबाने के लिए फिरंगियों ने महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों पर जुल्म किए। क्रांतिकारियों ने खनुवा नाले पर बने पुल को पांच घंटे में ध्वस्त कर दिया। इस अपराध के आरोप में अंग्रेजों ने 74 लोगों पर मुकदमा चलाया।
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स्वतंत्रता सेनानियों का स्मारक। संवाद।
- फोटो : KUSHINAGAR
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विस्तार
कुशीनगर जिले के पिछड़े इलाकों में शामिल दुदही ने आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई है। वर्ष 1942 में महात्मा गांधी ने जब अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया, तब क्षेत्र के कई लोगों ने सक्रियता दिखाते हुए आंदोलन को तेज कर दिया। आंदोलन को दबाने के लिए अंग्रेजों ने क्षेत्र के चार लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। 74 लोगों को कठोर सजा दी थी।
आजादी की लड़ाई में दुदही क्षेत्र के क्रांतिकारियों की कमान सरवन पांडेय उर्फ सुराजी बाबा, चंद्रदेव तिवारी और गेंदा सिंह जैसे लोगों के हाथ में थी। बांसगांव चौरिया, बैरिया, खैरवा, अमवाखास, पंचरुखीया, गौरीश्रीराम, मिश्रौली, दुदही, नाराहवा, कैथवलिया, शाहपुर, धोकरहा, चाफ, अमवा दीगर, बड़हरा, सरगतिया, रामपुर बरहन, अमही, धर्मपुर पर्वत, गौरीजदिश आदि गांव के नौजवान सिर पर कफन बांधकर महात्मा गांधी के आंदोलन में शामिल हो गए।
क्रांतिकारियों ने जगह-जगह रेल की पटरियां उखाड़ीं, सरकारी गेहूं के गोदाम लूट लिए। टेलीफोन के तार काटकर अंग्रेजों का संपर्क तोड़ दिया। अंग्रेज अफसरों ने गौरी शुक्ल गांव के जतन मल्लाह, अमवाखास खास टोला करवतहि के निवासी धरीक्षण व मंगल राय, किशुनवा के भोला नोनिया को गोली मार दी। इसके बाद आंदोलन की चिंगारी भड़कती रही। तब अंग्रेजी सेना इन गांवों में धावा बोलकर अत्याचार करने लगी।
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क्षेत्र के बुजुर्ग बताते हैं कि अंग्रेजों ने कई गांव जला दिए थे। क्रूरता की हदें पार करते हुए मंगल भगत को जिंदा जला दिया। आंदोलन दबाने के लिए फिरंगियों ने महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों पर जुल्म किया। क्रांतिकारियों ने खनुवा नाले पर बने पुल को पांच घंटे में ध्वस्त कर दिया। इस अपराध के आरोप में अंग्रेजों ने 74 लोगों पर मुकदमा चलाया।
अंग्रेजी हुकूमत में गेंदा सिंह और देवकली को तीन-तीन साल, चंद्रदेव तिवारी को दो तथा दिलीप राय को एक साल कैद हुई थी। बांसगांव के नकछेद को 12 बेत व एक साल कैद, अमवादीगर के सूर्यदेव को 18 बूट, गौरीश्रीराम के श्रीकिशन गुप्ता पर 500 रुपये हर्जाना, बांसगांव चौरिया के बच्चा बाबू को तीन माह की कैद और 1100 रुपये जुर्माना और छह बेत की सजा दी थी। जेल में बंद माधोपुर के जनार्धन को लकवा मार गया। इस जुल्म को देखते हुए कुतुबुद्दीन, सत्यनारायण, लुटावन, छठु आदि भूमिगत हो गए।
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आजादी की लड़ाई में दुदही क्षेत्र के क्रांतिकारियों की कमान सरवन पांडेय उर्फ सुराजी बाबा, चंद्रदेव तिवारी और गेंदा सिंह जैसे लोगों के हाथ में थी। बांसगांव चौरिया, बैरिया, खैरवा, अमवाखास, पंचरुखीया, गौरीश्रीराम, मिश्रौली, दुदही, नाराहवा, कैथवलिया, शाहपुर, धोकरहा, चाफ, अमवा दीगर, बड़हरा, सरगतिया, रामपुर बरहन, अमही, धर्मपुर पर्वत, गौरीजदिश आदि गांव के नौजवान सिर पर कफन बांधकर महात्मा गांधी के आंदोलन में शामिल हो गए।
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क्रांतिकारियों ने जगह-जगह रेल की पटरियां उखाड़ीं, सरकारी गेहूं के गोदाम लूट लिए। टेलीफोन के तार काटकर अंग्रेजों का संपर्क तोड़ दिया। अंग्रेज अफसरों ने गौरी शुक्ल गांव के जतन मल्लाह, अमवाखास खास टोला करवतहि के निवासी धरीक्षण व मंगल राय, किशुनवा के भोला नोनिया को गोली मार दी। इसके बाद आंदोलन की चिंगारी भड़कती रही। तब अंग्रेजी सेना इन गांवों में धावा बोलकर अत्याचार करने लगी।
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क्षेत्र के बुजुर्ग बताते हैं कि अंग्रेजों ने कई गांव जला दिए थे। क्रूरता की हदें पार करते हुए मंगल भगत को जिंदा जला दिया। आंदोलन दबाने के लिए फिरंगियों ने महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों पर जुल्म किया। क्रांतिकारियों ने खनुवा नाले पर बने पुल को पांच घंटे में ध्वस्त कर दिया। इस अपराध के आरोप में अंग्रेजों ने 74 लोगों पर मुकदमा चलाया।
अंग्रेजी हुकूमत में गेंदा सिंह और देवकली को तीन-तीन साल, चंद्रदेव तिवारी को दो तथा दिलीप राय को एक साल कैद हुई थी। बांसगांव के नकछेद को 12 बेत व एक साल कैद, अमवादीगर के सूर्यदेव को 18 बूट, गौरीश्रीराम के श्रीकिशन गुप्ता पर 500 रुपये हर्जाना, बांसगांव चौरिया के बच्चा बाबू को तीन माह की कैद और 1100 रुपये जुर्माना और छह बेत की सजा दी थी। जेल में बंद माधोपुर के जनार्धन को लकवा मार गया। इस जुल्म को देखते हुए कुतुबुद्दीन, सत्यनारायण, लुटावन, छठु आदि भूमिगत हो गए।