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बसहिया बनवीरपुर : पीढ़ियां बदलती रहीं पर पशु तस्करी का धंधा नहीं
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पडरौना। पीढ़ियां बदल गईं लेकिन आज भी पहचान पशु तस्करी और हिस्ट्रीशीटरों के कारण ही है। गांव है पडरौना कोतवाली क्षेत्र का बसहिया बनवीरपुर। करीब आठ हजार की आबादी वाले इस गांव में सबसे अधिक हिस्ट्रीशीटर और पशु तस्कर हैं। हालात ये हैं कि कई परिवारों में बाबा से लेकर पोता तक हिस्ट्रीशीटर हैं। शुक्रवार रात पुलिस की सघन दबिश ने एक बार फिर इस गांव को चर्चा में ला दिया।
पडरौना-दुदही मार्ग पर स्थित यह गांव बिहार के पश्चिम चंपारण जिले के नजदीक है। इस गांव में पशु तस्करी के नेटवर्क के न टूटने का प्रमुख कारण पुलिस इस इसकी इसी भौगोलिक स्थिति को मानती है। पुलिस का मानना है कि दबिश की भनक मिलते ही वांछित लोग बिहार में शरण ले लेते हैं या फिर वह वहीं से नेटवर्क को संचालित करते हैं।
पुलिस के लिए भी कार्रवाई आसान नहीं : बसहिया में पुलिस कार्रवाई कभी भी आसान नहीं रही। पूर्व में कम दल-बल के साथ पहुंची पुलिस को विरोध और पथराव जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ा। 2017 और 2024 की घटनाएं प्रशासन के लिए चेतावनी बनकर सामने आईं। यही वजह है कि शुक्रवार रात की कार्रवाई में उच्च अधिकारियों की अगुवाई में बड़ी संख्या में पुलिस बल के साथ दबिश दी गई।कई थानों की पुलिस के साथ पीएसी के जवान भी शामिल रहे। ड्रोन उड़ता रहा और जमीन से लेकर आसमान तक निगरानी तेज रही।
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पुलिस रिकार्ड तक सीमित नहीं बसहिया की बदनामी: बसहिया की बदनामी केवल पुलिस रिकॉर्ड तक सीमित नहीं है। इसका सामाजिक प्रभाव भी स्पष्ट है। विशेषज्ञों और सामाजिक जानकारों की माने तो गांव की पहचान जब खेती, शिक्षा या रोजगार के बजाय तस्करी के संदर्भ में बनने लगे तो नई पीढ़ी के सामने वैध विकल्पों का दायरा संकुचित होता जाता है। तेज कमाई का आकर्षण और संगठित नेटवर्क का दबाव युवाओं को उसी राह की ओर मोड़ देता है, जिस पर उनके पूर्ववर्ती चले थे।
बसहिया में अवैध गतिविधियों के लगातार बने रहने के पीछे कई कारक माने जाते हैं। सीमावर्ती भूगोल त्वरित पलायन का रास्ता देता है। तेज कमाई का आकर्षण युवाओं को जोखिम उठाने के लिए प्रेरित करता है। संगठित नेटवर्क उन्हें संरक्षित ढांचे में शामिल कर लेता है। वैकल्पिक रोजगार के सीमित अवसर और सामाजिक दबाव भी इस चक्र को बनाए रखते हैं।
पहले मांस का कारोबार..फिर तस्करी
वर्ष 2017 के पहले इस गांव में अवैध स्लॉटर हाउसों की भरमार थी। योगी सरकार बनने के बाद इस पर सख्ती हुई तो बसहिया का मांस कारोबार प्रभावित हुआ। घर-घर संचालित बूचड़खानों पर कार्रवाई के बाद खुलेआम होने वाला व्यापार थम गया। मांस निर्यात की जगह पशु तस्करी का संगठित ढांचा मजबूत हो गया। पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आने वाली पशुओं की खेप को सीमा पार कराना इस धंधे में शामिल लोगों का काम बन गया। कम समय में ज्यादा कमाई ने गांव के युवाओं को ललचाया और वे ‘कैरियर’ के रूप में जुड़ते गए। बाद में अपना गैंग तक खड़ा कर लिया।
वर्जन
पशु तस्करों पर शिकंजा कसने के लिए अभियान चलाकर कार्रवाई की जा रही है। पशु तस्करी में बसहिया बनवीरपुर से कई आरोपी शामिल हैं। इनकी निगरानी बढ़ाई गई है। घर से जो आरोपी फरार हैं, उनके बारे में जानकारी कर उनकी गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है। -सिद्धार्थ वर्मा, एएसपी कुशीनगर
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पडरौना-दुदही मार्ग पर स्थित यह गांव बिहार के पश्चिम चंपारण जिले के नजदीक है। इस गांव में पशु तस्करी के नेटवर्क के न टूटने का प्रमुख कारण पुलिस इस इसकी इसी भौगोलिक स्थिति को मानती है। पुलिस का मानना है कि दबिश की भनक मिलते ही वांछित लोग बिहार में शरण ले लेते हैं या फिर वह वहीं से नेटवर्क को संचालित करते हैं।
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पुलिस के लिए भी कार्रवाई आसान नहीं : बसहिया में पुलिस कार्रवाई कभी भी आसान नहीं रही। पूर्व में कम दल-बल के साथ पहुंची पुलिस को विरोध और पथराव जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ा। 2017 और 2024 की घटनाएं प्रशासन के लिए चेतावनी बनकर सामने आईं। यही वजह है कि शुक्रवार रात की कार्रवाई में उच्च अधिकारियों की अगुवाई में बड़ी संख्या में पुलिस बल के साथ दबिश दी गई।कई थानों की पुलिस के साथ पीएसी के जवान भी शामिल रहे। ड्रोन उड़ता रहा और जमीन से लेकर आसमान तक निगरानी तेज रही।
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पुलिस रिकार्ड तक सीमित नहीं बसहिया की बदनामी: बसहिया की बदनामी केवल पुलिस रिकॉर्ड तक सीमित नहीं है। इसका सामाजिक प्रभाव भी स्पष्ट है। विशेषज्ञों और सामाजिक जानकारों की माने तो गांव की पहचान जब खेती, शिक्षा या रोजगार के बजाय तस्करी के संदर्भ में बनने लगे तो नई पीढ़ी के सामने वैध विकल्पों का दायरा संकुचित होता जाता है। तेज कमाई का आकर्षण और संगठित नेटवर्क का दबाव युवाओं को उसी राह की ओर मोड़ देता है, जिस पर उनके पूर्ववर्ती चले थे।
बसहिया में अवैध गतिविधियों के लगातार बने रहने के पीछे कई कारक माने जाते हैं। सीमावर्ती भूगोल त्वरित पलायन का रास्ता देता है। तेज कमाई का आकर्षण युवाओं को जोखिम उठाने के लिए प्रेरित करता है। संगठित नेटवर्क उन्हें संरक्षित ढांचे में शामिल कर लेता है। वैकल्पिक रोजगार के सीमित अवसर और सामाजिक दबाव भी इस चक्र को बनाए रखते हैं।
पहले मांस का कारोबार..फिर तस्करी
वर्ष 2017 के पहले इस गांव में अवैध स्लॉटर हाउसों की भरमार थी। योगी सरकार बनने के बाद इस पर सख्ती हुई तो बसहिया का मांस कारोबार प्रभावित हुआ। घर-घर संचालित बूचड़खानों पर कार्रवाई के बाद खुलेआम होने वाला व्यापार थम गया। मांस निर्यात की जगह पशु तस्करी का संगठित ढांचा मजबूत हो गया। पश्चिमी उत्तर प्रदेश से आने वाली पशुओं की खेप को सीमा पार कराना इस धंधे में शामिल लोगों का काम बन गया। कम समय में ज्यादा कमाई ने गांव के युवाओं को ललचाया और वे ‘कैरियर’ के रूप में जुड़ते गए। बाद में अपना गैंग तक खड़ा कर लिया।
वर्जन
पशु तस्करों पर शिकंजा कसने के लिए अभियान चलाकर कार्रवाई की जा रही है। पशु तस्करी में बसहिया बनवीरपुर से कई आरोपी शामिल हैं। इनकी निगरानी बढ़ाई गई है। घर से जो आरोपी फरार हैं, उनके बारे में जानकारी कर उनकी गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है। -सिद्धार्थ वर्मा, एएसपी कुशीनगर