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कोरोना संकट : कोविड टेस्ट और टीकाकरण के काम आएंगी 13 एंबुलेंस
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कोरोना संकट : कोविड टेस्ट और टीकाकरण के काम आएंगी 13 एंबुलेंस
- डीएम के प्रयास से आठ साल बाद शुरू होने जा रहा संचालन
- मरम्मत के बाद एक एंबुलेंस तैयार, चालक की व्यवस्था होते ही होगा संचालन
- वर्ष 2010 में शुरू हुई थी मुख्यमंत्री महामाया सचल अस्पताल योजना
- अन्य एंबुलेंस भी मरम्मत के बाद होंगी संचालित
राकेश कुमार गौंड़
पडरौना। वर्ष 2012 से ही सीएमओ कार्यालय परिसर में जंग खा रही मुख्यमंत्री महामाया सचल अस्पताल योजना की सभी 13 एंबुलेंस के दिन अब शीघ्र बदल सकते हैं। डीएम के प्रयास से मंजूरी मिलने के बाद एक एंबुलेंस की मरम्मत कराकर बुधवार को सीएमओ कार्यालय से विकास भवन तक लाया गया। एक-दो दिन में चालक मिलते ही इसका संचालन शुरू हो जाएगा। अन्य 12 एंबुलेंस को भी एक-एक कर ठीक कराकर संचालित किए जाने की तैयारी है। इन एंबुलेंस का उपयोग कोविड की जांच और टीकाकरण में किया जाएगा।
वर्ष 2010 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती के 55वें जन्मदिन के अवसर पर मुख्यमंत्री महामाया सचल अस्पताल योजना की शुरुआत की गई थी। एंबुलेंस में ही महामाया सचल अस्पताल संचालित होता था। कुशीनगर जिले के हिस्से में भी ऐसी 13 हाइटेक एंबुलेंस आई थीं, जिन्हें प्रत्येक ब्लॉक के ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित किया जाता था। गैरसरकारी संगठन की तरफ से संचालित प्रत्येक एंबुलेंस में चिकित्सक समेत एक टीम तैनात होती थी, लेकिन महज दो साल में ही यह योजना भ्रष्टाचार के आरोपों से घिर गई। एंबुलेंस की खरीद-फरोख्त में कमीशनखोरी के आरोप स्वास्थ्य विभाग पर लगे। वर्ष 2012 में जैसे ही प्रदेश की सत्ता सपा के हाथों में पहुंची, योजना की उलटी गिनती शुरू हो गई। इन एंबुलेंस को संचालित कराने वाली कंपनी को भुगतान न होने के कारण संचालन बंद हो गया और इन एंबुलेंसों को सीएमओ कार्यालय में खड़ी करा दिया गया। तब से यह एंबुलेंस सीएमओ कार्यालय में जंग खा रही हैं।
कोरोना महामारी के इस संकट के दौर में डीएम एस. राजलिंगम की नजर इन एंबुलेंसाें पर पड़ी तो सदुपयोग के लिए उन्होंने इनकी मरम्मत कराकर कोविड महामारी की रोकथाम में प्रयोग किए जाने का निर्णय लिया। उन्होंने इनके संचालन की अनुमति के लिए शासन से मांग की। अनुमति मिलते ही उन्होंने इनकी मरम्मत शुरू करा दी है। एक एंबुलेंस बुधवार को मरम्मत के बाद विकास भवन तक लाई गई। इन एंबुलेंस का उपयोग कोविड की जांच और टीकाकरण में कराए जाने की संभावना है। चालक मिलते ही इन्हें क्षेत्र में भेज दिया जाएगा। संवाद
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महामाया सचल अस्पताल में थीं ये सुविधाएं
- गांव-गांव में घूमकर प्रोजेक्टर से फिल्म दिखाकर लोगों को स्वास्थ्यपरक योजनाओं के बारे में जागरूक करने का प्रयास किया जाता था। गंभीर रोगियों को इसमें भर्ती कर सही जगह पर ले जाया जाता था। एंबुलेंस के अंदर अल्ट्रासाउंड के साथ चिकित्सकीय परामर्श एवं प्राथमिक उपचार, प्रसव पूर्व एवं प्रसव बाद स्वास्थ्य परीक्षण तथा आवश्यक दवाओं का वितरण, किशोरियों की स्वास्थ्य जांच तथा स्वास्थ्य शिक्षा, मलेरिया एवं टीबी जांच के लिए सैंपलिंग, टीकाकरण एवं दवाइयों का वितरण और परिवार नियोजन के विभिन्न माध्यमों के बारे में जानकारी की व्यवस्था थी।
लखनऊ से रखी जाती थी नजर
इन एंबुलेंसों पर लखनऊ में बैठे-बैठे अधिकारी नजर रख सकते थे। एंबुलेंस में तैनात डॉक्टर, स्टॉफ नर्स व फार्मासिस्ट को अंदर प्रवेश करते ही एंबुलेंस में लगे सेंसर पर अपने अंगूठे का निशान देना होता था। सेंसर पर अंगूठा लगाते ही इनकी उपस्थिति सीधे लखनऊ में दर्ज हो जाती थी।
सीएमओ कार्यालय परिसर में खड़ी एंबुलेंस धूप-बारिश में जंग खाकर खराब हो रही हैं। कोविड महामारी की रोकथाम के लिए तैनात स्वास्थ्य टीमों के लिए वाहन ढूंढने पड़ रहे हैं। ऐसे में इन एंबुलेंस पर नजर पड़ी तो उनकी मरम्मत कराकर कोविड से बचाव के लिए उपयोग करने का निर्णय लिया गया। शासन से अनुमति मिलने पर एक एंबुलेंस की मरम्मत कराकर उपयोग योग्य तैयार करा लिया गया है। वह बुधवार को सीएमओ कार्यालय से विकास भवन तक आई थी। उसके लिए चालक का प्रबंध होते ही एक-दो दिन में क्षेत्र में भेज दिया जाएगा। उसका उपयोग कोविड टेस्टिंग और टीकाकरण में किया जाएगा। अन्य एंबुलेंस को भी ठीक कराकर उपयोग में लाए जाएंगे।
एस. राजलिंगम, जिलाधिकारी
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- डीएम के प्रयास से आठ साल बाद शुरू होने जा रहा संचालन
- मरम्मत के बाद एक एंबुलेंस तैयार, चालक की व्यवस्था होते ही होगा संचालन
- वर्ष 2010 में शुरू हुई थी मुख्यमंत्री महामाया सचल अस्पताल योजना
- अन्य एंबुलेंस भी मरम्मत के बाद होंगी संचालित
राकेश कुमार गौंड़
पडरौना। वर्ष 2012 से ही सीएमओ कार्यालय परिसर में जंग खा रही मुख्यमंत्री महामाया सचल अस्पताल योजना की सभी 13 एंबुलेंस के दिन अब शीघ्र बदल सकते हैं। डीएम के प्रयास से मंजूरी मिलने के बाद एक एंबुलेंस की मरम्मत कराकर बुधवार को सीएमओ कार्यालय से विकास भवन तक लाया गया। एक-दो दिन में चालक मिलते ही इसका संचालन शुरू हो जाएगा। अन्य 12 एंबुलेंस को भी एक-एक कर ठीक कराकर संचालित किए जाने की तैयारी है। इन एंबुलेंस का उपयोग कोविड की जांच और टीकाकरण में किया जाएगा।
वर्ष 2010 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती के 55वें जन्मदिन के अवसर पर मुख्यमंत्री महामाया सचल अस्पताल योजना की शुरुआत की गई थी। एंबुलेंस में ही महामाया सचल अस्पताल संचालित होता था। कुशीनगर जिले के हिस्से में भी ऐसी 13 हाइटेक एंबुलेंस आई थीं, जिन्हें प्रत्येक ब्लॉक के ग्रामीण क्षेत्रों में संचालित किया जाता था। गैरसरकारी संगठन की तरफ से संचालित प्रत्येक एंबुलेंस में चिकित्सक समेत एक टीम तैनात होती थी, लेकिन महज दो साल में ही यह योजना भ्रष्टाचार के आरोपों से घिर गई। एंबुलेंस की खरीद-फरोख्त में कमीशनखोरी के आरोप स्वास्थ्य विभाग पर लगे। वर्ष 2012 में जैसे ही प्रदेश की सत्ता सपा के हाथों में पहुंची, योजना की उलटी गिनती शुरू हो गई। इन एंबुलेंस को संचालित कराने वाली कंपनी को भुगतान न होने के कारण संचालन बंद हो गया और इन एंबुलेंसों को सीएमओ कार्यालय में खड़ी करा दिया गया। तब से यह एंबुलेंस सीएमओ कार्यालय में जंग खा रही हैं।
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कोरोना महामारी के इस संकट के दौर में डीएम एस. राजलिंगम की नजर इन एंबुलेंसाें पर पड़ी तो सदुपयोग के लिए उन्होंने इनकी मरम्मत कराकर कोविड महामारी की रोकथाम में प्रयोग किए जाने का निर्णय लिया। उन्होंने इनके संचालन की अनुमति के लिए शासन से मांग की। अनुमति मिलते ही उन्होंने इनकी मरम्मत शुरू करा दी है। एक एंबुलेंस बुधवार को मरम्मत के बाद विकास भवन तक लाई गई। इन एंबुलेंस का उपयोग कोविड की जांच और टीकाकरण में कराए जाने की संभावना है। चालक मिलते ही इन्हें क्षेत्र में भेज दिया जाएगा। संवाद
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महामाया सचल अस्पताल में थीं ये सुविधाएं
- गांव-गांव में घूमकर प्रोजेक्टर से फिल्म दिखाकर लोगों को स्वास्थ्यपरक योजनाओं के बारे में जागरूक करने का प्रयास किया जाता था। गंभीर रोगियों को इसमें भर्ती कर सही जगह पर ले जाया जाता था। एंबुलेंस के अंदर अल्ट्रासाउंड के साथ चिकित्सकीय परामर्श एवं प्राथमिक उपचार, प्रसव पूर्व एवं प्रसव बाद स्वास्थ्य परीक्षण तथा आवश्यक दवाओं का वितरण, किशोरियों की स्वास्थ्य जांच तथा स्वास्थ्य शिक्षा, मलेरिया एवं टीबी जांच के लिए सैंपलिंग, टीकाकरण एवं दवाइयों का वितरण और परिवार नियोजन के विभिन्न माध्यमों के बारे में जानकारी की व्यवस्था थी।
लखनऊ से रखी जाती थी नजर
इन एंबुलेंसों पर लखनऊ में बैठे-बैठे अधिकारी नजर रख सकते थे। एंबुलेंस में तैनात डॉक्टर, स्टॉफ नर्स व फार्मासिस्ट को अंदर प्रवेश करते ही एंबुलेंस में लगे सेंसर पर अपने अंगूठे का निशान देना होता था। सेंसर पर अंगूठा लगाते ही इनकी उपस्थिति सीधे लखनऊ में दर्ज हो जाती थी।
सीएमओ कार्यालय परिसर में खड़ी एंबुलेंस धूप-बारिश में जंग खाकर खराब हो रही हैं। कोविड महामारी की रोकथाम के लिए तैनात स्वास्थ्य टीमों के लिए वाहन ढूंढने पड़ रहे हैं। ऐसे में इन एंबुलेंस पर नजर पड़ी तो उनकी मरम्मत कराकर कोविड से बचाव के लिए उपयोग करने का निर्णय लिया गया। शासन से अनुमति मिलने पर एक एंबुलेंस की मरम्मत कराकर उपयोग योग्य तैयार करा लिया गया है। वह बुधवार को सीएमओ कार्यालय से विकास भवन तक आई थी। उसके लिए चालक का प्रबंध होते ही एक-दो दिन में क्षेत्र में भेज दिया जाएगा। उसका उपयोग कोविड टेस्टिंग और टीकाकरण में किया जाएगा। अन्य एंबुलेंस को भी ठीक कराकर उपयोग में लाए जाएंगे।
एस. राजलिंगम, जिलाधिकारी