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आठ लाख बच्चों के इलाज के लिए महज 21 बाल रोग विशेषज्ञ
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आठ लाख बच्चों के इलाज के लिए महज 21 बाल रोग विशेषज्ञ
औसतन 38 हजार बच्चों पर एक डॉक्टर की है उपलब्धता
जिला अस्पताल में आठ और सीएमओ के अधीन कार्यरत हैं 13 बाल रोग विशेषज्ञ
इंसेफेलाइटिस से प्रभावित है यह जिला, बरसात के चार महीने बढ़ जाती है बीमारी
अमर उजाला ब्यूरो
पडरौना। जिले में बारह साल से कम उम्र के लगभग आठ लाख बच्चे हैं। इसके सापेक्ष सरकारी अस्पतालों में केवल 21 बाल रोग विशेषज्ञ हैं। इनमें जिला अस्पताल के पीआईसीयू, एसएनसीयू और ओपीडी को मिलाकर आठ डॉक्टर तैनात हैं, जबकि सीएमओ के अधीन आने वाले सरकारी अस्पतालों में 13 बाल रोग विशेषज्ञ हैं।
जिले की आबादी लगभग 38 लाख है। इसमें 12 साल से कम उम्र के बच्चों की संख्या लगभग आठ लाख है। यह जिला पिछले तीन दशक से इंसेफेलाइटिस से पीड़ित रहा है। छोटे बच्चे ही इंसेफेलाइटिस की चपेट में अधिक आते हैं। जिला अस्पताल में इंसेफेलाइटिस के मरीजों के उपचार के लिए 10 बेड का पीआईसीयू है। इसके अलावा आठ डॉक्टर हैं जो ओपीडी से लेकर इंसेफेलाइटिस वार्ड तक ड्यूटी पर रहते हैं। इसके अलावा 13 बाल रोग विशेषज्ञ जिले की अन्य सीएचसी-पीएचसी पर तैनात हैं। कोरोना की तीसरी लहर में सबसे अधिक असर बच्चों पर ही होने की आशंका जताई जा रही है। जिला अस्पताल के अलावा 14 सीएचसी तथा 54 न्यू पीएचसी है जिसमें से केवल 13 पर ही बाल रोग विशेषज्ञ की तैनाती है। शेष अस्पतालों में बच्चों के डॉक्टर ही नहीं हैं। सबसे बुरी हालत तो ग्रामीण क्षेत्रों की है जहां बाल रोग विशेषज्ञ तो क्या सामान्य डॉक्टर भी नहीं है। ऐसे में कोरोना की तीसरी लहर की तैयारियों को लेकर किए जा रहे दावे को परखा जा सकता है।
हर सीएचसी पर एक बाल रोग विशेषज्ञ जरूरी
स्वास्थ्य विभाग के मानक के अनुसार हर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में छह डॉक्टरों का पद सृजित है, जिसमें से एक पद बाल रोग विशेषज्ञ का भी है। परंतु इसके सापेक्ष तैनाती नहीं हो पा रही है। स्वास्थ्य विभाग के अफसरों का कहना है कि कम ही अस्पताल ऐसे हैं जहां पद के सापेक्ष डॉक्टरों की तैनाती है।
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कोट
जिले के सरकारी अस्पतालों में बच्चों समेत सभी प्रकार के मरीजों के बेहतर इलाज का प्रबंध किया जा रहा है। मानव संसाधनों की कमी को भी दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। कोशिश है कि उपलब्ध संसाधनों का ही बेहतर उपयोग कर हर पीड़ित तक चिकित्सा सुविधा मुहैया कराई जा सके।
-एस राजलिंगम, डीएम।
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औसतन 38 हजार बच्चों पर एक डॉक्टर की है उपलब्धता
जिला अस्पताल में आठ और सीएमओ के अधीन कार्यरत हैं 13 बाल रोग विशेषज्ञ
इंसेफेलाइटिस से प्रभावित है यह जिला, बरसात के चार महीने बढ़ जाती है बीमारी
अमर उजाला ब्यूरो
पडरौना। जिले में बारह साल से कम उम्र के लगभग आठ लाख बच्चे हैं। इसके सापेक्ष सरकारी अस्पतालों में केवल 21 बाल रोग विशेषज्ञ हैं। इनमें जिला अस्पताल के पीआईसीयू, एसएनसीयू और ओपीडी को मिलाकर आठ डॉक्टर तैनात हैं, जबकि सीएमओ के अधीन आने वाले सरकारी अस्पतालों में 13 बाल रोग विशेषज्ञ हैं।
जिले की आबादी लगभग 38 लाख है। इसमें 12 साल से कम उम्र के बच्चों की संख्या लगभग आठ लाख है। यह जिला पिछले तीन दशक से इंसेफेलाइटिस से पीड़ित रहा है। छोटे बच्चे ही इंसेफेलाइटिस की चपेट में अधिक आते हैं। जिला अस्पताल में इंसेफेलाइटिस के मरीजों के उपचार के लिए 10 बेड का पीआईसीयू है। इसके अलावा आठ डॉक्टर हैं जो ओपीडी से लेकर इंसेफेलाइटिस वार्ड तक ड्यूटी पर रहते हैं। इसके अलावा 13 बाल रोग विशेषज्ञ जिले की अन्य सीएचसी-पीएचसी पर तैनात हैं। कोरोना की तीसरी लहर में सबसे अधिक असर बच्चों पर ही होने की आशंका जताई जा रही है। जिला अस्पताल के अलावा 14 सीएचसी तथा 54 न्यू पीएचसी है जिसमें से केवल 13 पर ही बाल रोग विशेषज्ञ की तैनाती है। शेष अस्पतालों में बच्चों के डॉक्टर ही नहीं हैं। सबसे बुरी हालत तो ग्रामीण क्षेत्रों की है जहां बाल रोग विशेषज्ञ तो क्या सामान्य डॉक्टर भी नहीं है। ऐसे में कोरोना की तीसरी लहर की तैयारियों को लेकर किए जा रहे दावे को परखा जा सकता है।
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हर सीएचसी पर एक बाल रोग विशेषज्ञ जरूरी
स्वास्थ्य विभाग के मानक के अनुसार हर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में छह डॉक्टरों का पद सृजित है, जिसमें से एक पद बाल रोग विशेषज्ञ का भी है। परंतु इसके सापेक्ष तैनाती नहीं हो पा रही है। स्वास्थ्य विभाग के अफसरों का कहना है कि कम ही अस्पताल ऐसे हैं जहां पद के सापेक्ष डॉक्टरों की तैनाती है।
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कोट
जिले के सरकारी अस्पतालों में बच्चों समेत सभी प्रकार के मरीजों के बेहतर इलाज का प्रबंध किया जा रहा है। मानव संसाधनों की कमी को भी दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। कोशिश है कि उपलब्ध संसाधनों का ही बेहतर उपयोग कर हर पीड़ित तक चिकित्सा सुविधा मुहैया कराई जा सके।
-एस राजलिंगम, डीएम।