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सरकार का काम था, शमसुद्दीन कर रहे

Sat, 02 Feb 2019 11:53 PM IST
राकेश पांडेय अमर उजाला ब्यूरो
अमर उजाला ब्यूरो Published by: राकेश पांडेय Updated Sat, 02 Feb 2019 11:53 PM IST
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जंगल सिसवा गांव में बांसी नदी पर पुल। - फोटो : अमर उजाला
दुदही (कुशीनगर)। उनका नाम शमसुद्दीन (50) है। वह लगभग 20 साल से वही काम कर रहे जो सरकार को करना चाहिए। जंगल सिसवा गांव में बांसी नदी पर उनका बनाया बांस का पुल पचरुखिया, नरहवा, लुअठहा आदि गांवों के लिए भी बड़ा सहारा है। सबसे खास बात यह कि उनकी जनसेवा के जुनून की परीक्षा बांसी नदी हर साल पुल बहाकर लेती है। दो दशक हो गए पर नदी की बाढ़ उनसे हर बार हारती है। शमसुद्दीन हैं कि फिर नया पुल बना देते हैं। उन्हें उम्मीद है कि कभी न कभी तो शासन-प्रशासन की नजर पड़ेगी और यहां पक्का पुल बनेगा।
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यह भी अजब है कि दूसरों के लिए पुल बनाने वाले शमसुद्दीन खुद विस्थापित हैं। मूलत: बिहार प्रांत के भितहां के रहने वाले हैं। घर और खेत बड़ी गंडक में समा गए तो वह दुदही क्षेत्र के गांव जंगल सिसवा चले आए और यहीं बस गए। यहां बांसी नदी पैदल पार करते बच्चों और अन्य लोगों को देख उनके मन में नदी पर बांस का पुल बनाने की सूझी।
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धुन के पक्के शमसुद्दीन ने रुपये जुटाए और बांस खरीदकर नदी पर करीब 50 मीटर लंबा पुल बना दिया। लोगों का आना-जाना सुगम हो गया। खास तौर से उन बच्चों को राहत मिली जो जैसे-तैसे नदी पार करके स्कूल जाते थे। लेकिन बरसात के दिनों में नदी उफनाई तो पुल बहा ले गई। उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। पुल से गुजरने वाले बाइक चालक उन्हें 5-10 रुपये जो दे जाते थे, उसी से उन्होंने बरसात बाद फिर पुल बनाया। कुछ लोगों ने भी मदद की। अब तो यह हर साल का सिलसिला बन गया है।
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गांववाले भी मदद करते हैं
शमसुद्दीन बताते हैं कि वह पुल से आने-जाने वाले बाइक चालक उन्हें स्वेच्छा से पांच-दस रुपये दे जाते हैं। जंगल सिसवा, पचरुखिया, नरहवा, लुअठहा आदि गांवों के लोग उन्हें फसल पर गेहूं, धान और सरसों आदि दे जाते हैं। इससे उन्हें पुल को बनाने का हौसला भी मिलता है।


पुल टूटा तो नाव हाजिर है
जंगल सिसवा की ग्राम प्रधान तैबुन्निशा तस्दीक करती हैं कि शमसुद्दीन पिछले बीस साल से गांववालों के लिए पुल बना रहे हैं। वह तो कहती हैं कि शमसुद्दीन जुनूनी हैं। वरना कौन बार-बार पुल बनाता है। पानी बढ़ने पर वह खुद की नाव से लोगों को नदी पार कराते हैं।

 
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