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मैत्रेय परियोजना का भविष्य अधर में
Updated Fri, 13 Oct 2017 10:23 PM IST
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पडरौना (कुशीनगर)। कुशीनगर के विकास के लिए मेगा प्रोजेक्ट बताई गई मैत्रेय परियोजना सत्रह साल बाद भी अधर में है। चार मुख्यमंत्री बदल चुके हैं, एक दर्जन डीएम व अन्य वरिष्ठ अफसर जोर लगा चुके हैं। किसानों को मुआवजा बांटकर करीब 200 एकड़ जमीन भी मैत्रेय प्रोजेक्ट ट्रस्ट को हैंडओवर हो चुका है, लेकिन अब तक निर्माण शुरू नहीं हुआ है। अब प्रशासन यू टर्न लेने की तैयारी में है। अगले सप्ताह सीएम कुशीनगर आ रहे हैं तो एक बार फिर इस परियोजना को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
अफगानिस्तान के बामियान शहर में भगवान बुद्ध की प्रतिमा ध्वंश होने के बाद वर्ष 2000 में मैत्रेय प्रोजेक्ट ट्रस्ट ने कुशीनगर में भगवान बुद्ध की 500 फिट ऊंची प्रतिमा स्थापित करने का प्रस्ताव रखा था। वर्ष 2001 में हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला शहर में तिब्बती धर्मगुरु दलाईलामा की मौजूदगी में उत्तर प्रदेश सरकार और मैत्रेय प्रोजेक्ट ट्रस्ट के बीच मूर्ति स्थापना के प्रस्ताव पर समझौता हुआ था। निर्माण कार्य के लिए करीब 700 एकड़ जमीन उत्तर प्रदेश सरकार को उपलब्ध करानी थी। जमीन मिलने पर संस्था को यहां भगवान बुद्ध के मैत्री स्वरूप वाली प्रतिमा स्थापित करानी थी। इसके अलावा मेडिटेशन सेंटर, उच्च क्षमता का चिकित्सा संस्थान और शिक्षा संस्थान भी खुलना था। तब कहा जा रहा था कि इस परियोजना के पूरा होने के बाद कुशीनगर को दुनिया में एक और विशिष्ट पहचान मिलेगी और यहां आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या में पांच से छह गुना तक की वृद्धि हो जाएगी। वर्ष 2003 में सरकार ने जमीन अधिग्रहण के लिए अधिसूचना जारी कर दी। लेकिन इसके खिलाफ सिसवा महंत चौराहे पर गोवर्धन गौड़ की अगुवाई में धरना-प्रदर्शन शुरू हो गया। वर्ष 2004 से लेकर वर्ष 2011 प्रशासन ने काफी प्रयास किया लेकिन जमीन का मामला नहीं निपटा। साल 2012 में यहां डीएम रहे रिग्जियान सैंफिल के प्रयास से मामला सुलझ गया और 1696 किसानों से 179.13 एकड़ जमीन अधिग्रहित की गई। इसके अलावा 16.69 एकड़ जमीन ग्राम सभा की थी। कुल 195.82 एकड़ जमीन के लिए प्रशासन ने 68 करोड़, 55 लाख, 75 हजार 293 रुपये मुआवजा के तौर पर बांटा। मूर्ति की साइज भी 500 फिट से घटाकर 200 फिट कर दी गई। 13 नवम्बर वर्ष 2013 को तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कुशीनगर आकर मैत्रेय परियोजना के निर्माण के लिए शिलान्यास भी कर दिया। लेकिन इसके बाद भी कार्य शुरू नहीं हुआ।
बीते मई महीने में कसया क्षेत्र के मैनपुर कोट में आयोजित कार्यक्रम में आए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को कुशीनगर के विधायक रजनीकांत मणि त्रिपाठी ने ज्ञापन सौंपकर इस परियोजना का कार्य शुरू कराने अथवा जमीन वापस लेकर किसी अन्य कार्य में लगाने की मांग की थी। अब 17 अक्टूबर को कुशीनगर आ रहे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए उसी कार्यक्रम स्थल को चुना गया है, जहां चार साल पहले अखिलेश यादव ने मैत्रेय परियोजना का शिलान्यास किया था। लोगों को उम्मीद है कि इस कार्यक्रम के बाद या तो मैत्रेय प्रोजेक्ट ट्रस्ट काम शुरू करा देगा, अथवा किसानों से ली गई इस जमीन को किसी अन्य प्रोजेक्ट के लिए देकर कुशीनगर में विकास व रोजगार की नई इबारत लिखी जाएगी।
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गोवर्धन शुरू से जता रहे हैं विरोध
पडरौना। कुशीनगर में मैत्रेय परियोजना के विरोध में एक दशक से आंदोलन कर रहे गोवर्धन गोड़ शुरू से ही इस परियोजना के भविष्य पर संशय जताते रहे हैं। बकौल गोवर्धन इस संस्थान में वर्ष 1996 में बिहार के बोधगया में भी इस तरह की परियोजना के लिए आधार शिला रखी थी। वहां तो जमीन आसानी से मिल भी गई थी, लेकिन कोई कार्य नहीं हुआ। गोवर्धन और इनके सहयोगी वर्ष 2005 में ही बोधगया गए थे और वहां हुए कार्यों से यहां के तत्कालीन प्रशासन को अवगत भी कराया था। लेकिन अफसर गोवर्धन को विकास की राह में रोड़ा अटकाने वाले बताते रहे। अब जबकि शिलान्यास के चार साल बाद भी कोई कार्य शुरू नहीं हुआ, तब प्रशासन को भी लगने लगा है कि यहां रुख बदलना ही होगा। खुद डीएम आंद्रा वामसी भी सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि अगर छह माह में मैत्रेय परियोजना पर कार्य शुरू नहीं हुआ तो ट्रस्ट से जमीन वापस ले ली जाएगी।
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अफगानिस्तान के बामियान शहर में भगवान बुद्ध की प्रतिमा ध्वंश होने के बाद वर्ष 2000 में मैत्रेय प्रोजेक्ट ट्रस्ट ने कुशीनगर में भगवान बुद्ध की 500 फिट ऊंची प्रतिमा स्थापित करने का प्रस्ताव रखा था। वर्ष 2001 में हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला शहर में तिब्बती धर्मगुरु दलाईलामा की मौजूदगी में उत्तर प्रदेश सरकार और मैत्रेय प्रोजेक्ट ट्रस्ट के बीच मूर्ति स्थापना के प्रस्ताव पर समझौता हुआ था। निर्माण कार्य के लिए करीब 700 एकड़ जमीन उत्तर प्रदेश सरकार को उपलब्ध करानी थी। जमीन मिलने पर संस्था को यहां भगवान बुद्ध के मैत्री स्वरूप वाली प्रतिमा स्थापित करानी थी। इसके अलावा मेडिटेशन सेंटर, उच्च क्षमता का चिकित्सा संस्थान और शिक्षा संस्थान भी खुलना था। तब कहा जा रहा था कि इस परियोजना के पूरा होने के बाद कुशीनगर को दुनिया में एक और विशिष्ट पहचान मिलेगी और यहां आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या में पांच से छह गुना तक की वृद्धि हो जाएगी। वर्ष 2003 में सरकार ने जमीन अधिग्रहण के लिए अधिसूचना जारी कर दी। लेकिन इसके खिलाफ सिसवा महंत चौराहे पर गोवर्धन गौड़ की अगुवाई में धरना-प्रदर्शन शुरू हो गया। वर्ष 2004 से लेकर वर्ष 2011 प्रशासन ने काफी प्रयास किया लेकिन जमीन का मामला नहीं निपटा। साल 2012 में यहां डीएम रहे रिग्जियान सैंफिल के प्रयास से मामला सुलझ गया और 1696 किसानों से 179.13 एकड़ जमीन अधिग्रहित की गई। इसके अलावा 16.69 एकड़ जमीन ग्राम सभा की थी। कुल 195.82 एकड़ जमीन के लिए प्रशासन ने 68 करोड़, 55 लाख, 75 हजार 293 रुपये मुआवजा के तौर पर बांटा। मूर्ति की साइज भी 500 फिट से घटाकर 200 फिट कर दी गई। 13 नवम्बर वर्ष 2013 को तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कुशीनगर आकर मैत्रेय परियोजना के निर्माण के लिए शिलान्यास भी कर दिया। लेकिन इसके बाद भी कार्य शुरू नहीं हुआ।
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बीते मई महीने में कसया क्षेत्र के मैनपुर कोट में आयोजित कार्यक्रम में आए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को कुशीनगर के विधायक रजनीकांत मणि त्रिपाठी ने ज्ञापन सौंपकर इस परियोजना का कार्य शुरू कराने अथवा जमीन वापस लेकर किसी अन्य कार्य में लगाने की मांग की थी। अब 17 अक्टूबर को कुशीनगर आ रहे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए उसी कार्यक्रम स्थल को चुना गया है, जहां चार साल पहले अखिलेश यादव ने मैत्रेय परियोजना का शिलान्यास किया था। लोगों को उम्मीद है कि इस कार्यक्रम के बाद या तो मैत्रेय प्रोजेक्ट ट्रस्ट काम शुरू करा देगा, अथवा किसानों से ली गई इस जमीन को किसी अन्य प्रोजेक्ट के लिए देकर कुशीनगर में विकास व रोजगार की नई इबारत लिखी जाएगी।
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गोवर्धन शुरू से जता रहे हैं विरोध
पडरौना। कुशीनगर में मैत्रेय परियोजना के विरोध में एक दशक से आंदोलन कर रहे गोवर्धन गोड़ शुरू से ही इस परियोजना के भविष्य पर संशय जताते रहे हैं। बकौल गोवर्धन इस संस्थान में वर्ष 1996 में बिहार के बोधगया में भी इस तरह की परियोजना के लिए आधार शिला रखी थी। वहां तो जमीन आसानी से मिल भी गई थी, लेकिन कोई कार्य नहीं हुआ। गोवर्धन और इनके सहयोगी वर्ष 2005 में ही बोधगया गए थे और वहां हुए कार्यों से यहां के तत्कालीन प्रशासन को अवगत भी कराया था। लेकिन अफसर गोवर्धन को विकास की राह में रोड़ा अटकाने वाले बताते रहे। अब जबकि शिलान्यास के चार साल बाद भी कोई कार्य शुरू नहीं हुआ, तब प्रशासन को भी लगने लगा है कि यहां रुख बदलना ही होगा। खुद डीएम आंद्रा वामसी भी सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि अगर छह माह में मैत्रेय परियोजना पर कार्य शुरू नहीं हुआ तो ट्रस्ट से जमीन वापस ले ली जाएगी।