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खेतों में खराब हो गई हजारों क्विंटल हरी सब्जियां

Sat, 30 May 2020 11:51 PM IST
Allahabad Bureau इलाहाबाद ब्यूरो
Updated Sat, 30 May 2020 11:51 PM IST
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Thousands of quintal green vegetables spoiled in the fields
Thousands of quintal green vegetables spoiled in the fields - फोटो : KAUSHAMBI
खेतों में खराब हो गई हजारों क्विंटल हरी सब्जियां
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लॉक डाउन में बाहर सप्लाई नहीं होने से गिरा भाव, तोड़ाई और भाड़ा भी नहीं निकलने से डूब गई जमा पूंजी
संवाद न्यूज एजेंसी
मंझनपुर। सब्जी की खेती कर परिवार का खर्च चलाने के लिए सोच रहे किसानों की लॉकडाउन में हजारों क्विंटल सब्जियां खेतों में ही खराब हो गई हैं। मंडी ले जाने पर भी उन्हें औने-पौने दाम में सब्जियां बेचनी पड़ रही हैं। करैला और कद्दू दो रुपये किलो के हिसाब से बेचना पड़ रहा है। वहीं लौकी का जो मिल जाए। मजदूरी और भाड़ा तक नहीं निकल पाने से परेशान किसान ऐसे में खेतों से सब्जियां निकाल ही नहीं रहे हैं। किसान उतनी ही सब्जियां तोड़ रहे हैं जितना खेत के पास ही बिक सके। या फिर खुद के साधन से मंडी पहुंचा सकें। किसानों का कहना है कि इस बार सब्जी की खेती में घर की जमा पूंजी भी डूब गई है।
सिराथू ब्लॉक के देवखरपुर, नौगीरा, अचाकापुर आदि इलाकों में सब्जी की अच्छी खेती होती है। अचाकापुर निवासी सरजू प्रसाद करीब 12 बीघा में करैला, तरोई, नेनुआ आदि की खेती करते हैं। अगेती फसल तैयार कर हर साल सरजू अच्छा मुनाफा कमाते थे, लेकिन इस बार कमाई तो दूर लागत भी निकालना मुश्किल हो गया है। सरजू बताते हैं कि सब्जी की तोड़ाई और मंडी तक ले जाने का भाड़ा भी जब नहीं निकल रहा है तब उन्होंने तोड़ाई ही बंद करवा दी। अपने और परिवार के लोग जितना तोड़ पाते हैं उतनी ही सब्जी मंडी या आस-पास में बेच कर किसी तरह से गुजारा होता है। सरजू का कहना है कि 200 रुपये सब्जी तोड़ाई की मजदूरी देनी होती है और 20 मजदूरों को इस काम के लिए लगाता था। भाड़ा भी दो हजार रुपये लगता है। दो रुपये किलो सब्जी बेचने में क्या लागत आएगी। कड़ा ब्लॉक के घोसी गांव निवासी किसान इकबाल 18 बीघे में सब्जी की खेती करते हैं। उनका कहना है कि पिछले 15 दिनों से वह मंडी में सब्जी नहीं ले जा रहे हैं। खेत से ही जो बिक जाता है बेच देते हैं। इकबाल कहते हैं कि रोजाना करीब 20 क्ंिवटल करैला खराब हो रहा है। बड़े किसान वीर बहादुर सिंह का बुरा हाल है। उन्होंने छह बीघे में टमाटर, तीन बीघे में करैला बोया था। खरीददार सेट थे। वाहन लेकर आते थे और खेत से ही सब्जी खरीद लेते थे। इस बार लॉकडाउन में कोई आ नहीं पाया। पूरी फसल खेत में ही खराब हो गई। बचे टमाटर भी खराब होने की कगार पर हैं। किसान रामदीन मौर्या व मोहम्मद अली साझेदारी में करैला, लौकी व नेनुआ बोते आए हैं। इस बार दोनों मायूस हैं क्योंकि पैदावार अच्छी होने के बावजूद लागत फंस गई। दोनों बताते हैं कि दो हजार रुपये की पिकअप भाड़े पर लेकर भोर में मुंडेरा मंडी पहुंचना पड़ता है। सभी सब्जी दो से तीन रुपये में बेचनी पड़ती है। पहले 10 रुपये से 30 रुपये तक दाम मिलते थे। अब आढ़ती औने-पौने दाम लगाकर सब्जी खरीदता है। नहीं बेचने पर भाड़ा भी नहीं निकलता है। इसलिए मजबूरन बेचकर ही आना होता है।
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मवेशी भी नहीं खा रहे खीरा, कद्दू और करैला
मंझनपुर। मंझनपुर बाजार में सब्जी बेचने आए शिवपुर बसोहनी के रामदास यादव, टेंगाई के शिवबहादुर, जलालपुर के शंकर लाल का दर्द जुदा है। बताते हैं कि इस बार भगवान ने साथ दिया। पैदावार दो गुना हुआ, लेकिन लॉकडाउन के कारण बाहर सप्लाई नहीं होने से भाव पानी हो गया। तोड़ाई और भाड़ा भी नहीं निकलने के कारण बाजार लाने के बजाय वे लोग खीरा, कद्दू और करैला अपने मवेशियों को खिलाने लगे। दो महीने से खीरा और सब्जियां खाते-खाते अब तो मवेशी भी ऊब गए हैं।
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टमाटर भी 15 रुपये किलो बिकना मुश्किल
मंझनपुर। सरसवां ब्लॉक के घोघ का पुरवा निवासी मनोहर निषाद व दयाराम निषाद ने नेनुआ, मूली, लौकी, टमाटर, करैला व भिंडी की खेती कर रखी है। ये लोग फुटकर बाजार में खुद बेचते हैं। पहले मई में भिंडी 40 रुपये, करेला 30 रुपये व लौकी 20 से 25 रुपये किलो तक बिक जाती थी। अब 10 रुपये किलो बेचनी पड़ रही है। टमाटर भी 15 रुपये में बिकना मुश्किल हो गया है। सब्जियां बच रही हैं तो गांव-गांव जाकर बेचना पड़ रहा है।

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लॉकडाउन में साफ हुई हवा तो सब्जियां हो रहीं बिना दवा
मंझनपुर। लॉकडाउन के कारण वातावरण साफ हो गया है। इससे सब्जियां बिना दवा और कीटनाशक के तैयार हो रही हैं। बिना कीटनाशक के सब्जियां पौष्टिक और चमकदार हो रही हैं। चायल क्षेत्र के किसान मोहम्मद शब्बीर का कहना है कि उन्होंने एक बीघा तोरई की बुआई की है। ऐसा कोई वर्ष नहीं हुआ जब फसल में कीट न लगता हो। कीट से बचाव के लिए कीटनाशक के साथ अन्य दवाओं का भी छिड़काव करना पड़ता था। 1000 से 12000 रुपये तक खर्च हो जाते थे। इस बार केवल 250 रुपये की टॉनिक ही डाली है। बीच में तापमान बढ़ने पर सिंचाई जरूर ज्यादा करनी पड़ी। फसल चमकदार हो रही है। पैदावार भी बढ़ी है। किसान श्याम सिंह राजपूत ने बताया कि पिछले कई साल से सब्जी की खेती करते आ रहे हैं। इस बार एक बीघा में भिंडी की बुआई की है। हर साल जायद की फसल में कीटनाशक और दवा का छिड़काव करना पड़ता था। लगभग 1500 रुपये का खर्च आता था, लेकिन इस बार दवा और कीटनाशक का छिड़काव नहीं करना पड़ा। ढाई सौ रुपये की एक टॉनिक जरूर डाली है। कीट भी नहीं लगे और उपज बहुत ही अच्छी और अधिक हो रही है।
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