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Kaushambi News: स्वतंत्रता संग्राम में गांव-गांव गूंजीं थीं बाकरगंज के 12 वीरों की हुंकार
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रामऔतार सिंह।
स्वतंत्रता संग्राम के दौर में बाकरगंज गांव ने देशभक्ति की मिसाल पेश की थी। यहां के क्रांतिकारी रामऔतार गांव-गांव घूमकर युवाओं में आजादी की लड़ाई में शामिल होने का जज्बा भरते थे। उनके प्रेरणादायक भाषण और साहसिक कदमों से कई युवा आंदोलन का हिस्सा बने।
एतिहासिक दस्तावेज के अनुसार, बाकरगंज के 12 वीर सपूतों ने अंग्रेजी हुकूमत को कड़ी चुनौती दी थी। इनमें से कई ने जेल की यातनाएं सहीं, तो कुछ ने अपने प्राणों की आहुति दी थी। रामऔतार ने न केवल आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई बल्कि गांव के युवाओं को संगठित कर अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोला।
उनके प्रपौत्र अरिमर्दन सिंह के अनुसार, घर के बुजुर्ग बताते थे कि उनके बाबा रामऔतार सिंह ने वर्ष 1932 व 33 में घर छोड़ दिया था। इसके बाद वह गांव-गांव जाकर रात्रि चौपाल और दिन के समय खेत-खलिहानों में लोगों को गुलामी के खिलाफ खड़ा होने के लिए प्रेरित करते थे। उनकी इस मुहिम में गांव के रामप्रसाद सिंह, रामचंद्र सिंह, रामदेव सिंह, कल्लू सिंह, भग्गू सिंह, रामनेवाज गर्ग, हरवंश सिंह, रामगोपाल सिंह, मनबोधन सिंह, दशरथ सिंह और गयादीन सिंह ने भी कदम-कदम पर साथ दिया था। उनके प्रयासों से बाकरगंज स्वतंत्रता आंदोलन के मानचित्र पर एक अहम स्थान बनाने में सफल रहा।
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जंगलों में छिपे क्रांतिकारियों को पहुंचाते थे भोजन
बाकरगंज के स्वतंत्रता सेनानी रामऔतार ने न केवल युवाओं को आजादी की लड़ाई के लिए प्रेरित किया, बल्कि अंग्रेजों से छिपकर जंगलों, खेतों और खलिहानों में रहने वाले क्रांतिकारियों की भी भरपूर मदद की। अरिमर्दन के मुताबिक, जब आंदोलन पूरे चरम पर था तब रामऔतार जरूरतमंद क्रांतिकारियों तक भोजन, राशन और आवश्यक सामान पहुंचाने का जोखिम उठाते थे।
अंग्रेजों की नजर से बचते हुए वे हर संभव सहयोग करते रहे। आजादी की इस जंग में उनके साथियों को भी जेल की यातनाएं सहनी पड़ीं। कोई छह महीने तो कोई दो महीने तक जेल की सलाखों के पीछे रहा। बावजूद इसके, उन्होंने हार नहीं मानी और आखिरी दम तक देश की आजादी के लिए संघर्ष करते रहे।
परिजनों ने अपने खर्चे से बनाया स्वतंत्रता सेनानी का स्मारक
बाकरगंज के वीर सपूतों ने आजादी की लड़ाई में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया लेकिन उनकी स्मृति में प्रशासन एक स्मारक तक नहीं बनवा सका। गांव के बृजेंद्र सिंह, अमर सिंह, रोहित सिंह और पंजाबी सेठ ने बताया कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यहां के योद्धाओं ने अंग्रेजों के खिलाफ डटकर संघर्ष किया, जेल यातनाएं सहीं और प्राणों की आहुति दी।
इसके बावजूद आज तक उनकी याद में कोई सरकारी स्मारक नहीं बनाया गया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता सेनानी रामऔतार सिंह के परिजनों ने अपने पैसे से स्मारक का निर्माण कराया ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके बलिदान को याद रख सकें। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन को चाहिए कि गांव के अन्य शहीदों की स्मृति में भी स्थायी स्मारक बनवाए जाएं।
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एतिहासिक दस्तावेज के अनुसार, बाकरगंज के 12 वीर सपूतों ने अंग्रेजी हुकूमत को कड़ी चुनौती दी थी। इनमें से कई ने जेल की यातनाएं सहीं, तो कुछ ने अपने प्राणों की आहुति दी थी। रामऔतार ने न केवल आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई बल्कि गांव के युवाओं को संगठित कर अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोला।
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उनके प्रपौत्र अरिमर्दन सिंह के अनुसार, घर के बुजुर्ग बताते थे कि उनके बाबा रामऔतार सिंह ने वर्ष 1932 व 33 में घर छोड़ दिया था। इसके बाद वह गांव-गांव जाकर रात्रि चौपाल और दिन के समय खेत-खलिहानों में लोगों को गुलामी के खिलाफ खड़ा होने के लिए प्रेरित करते थे। उनकी इस मुहिम में गांव के रामप्रसाद सिंह, रामचंद्र सिंह, रामदेव सिंह, कल्लू सिंह, भग्गू सिंह, रामनेवाज गर्ग, हरवंश सिंह, रामगोपाल सिंह, मनबोधन सिंह, दशरथ सिंह और गयादीन सिंह ने भी कदम-कदम पर साथ दिया था। उनके प्रयासों से बाकरगंज स्वतंत्रता आंदोलन के मानचित्र पर एक अहम स्थान बनाने में सफल रहा।
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जंगलों में छिपे क्रांतिकारियों को पहुंचाते थे भोजन
बाकरगंज के स्वतंत्रता सेनानी रामऔतार ने न केवल युवाओं को आजादी की लड़ाई के लिए प्रेरित किया, बल्कि अंग्रेजों से छिपकर जंगलों, खेतों और खलिहानों में रहने वाले क्रांतिकारियों की भी भरपूर मदद की। अरिमर्दन के मुताबिक, जब आंदोलन पूरे चरम पर था तब रामऔतार जरूरतमंद क्रांतिकारियों तक भोजन, राशन और आवश्यक सामान पहुंचाने का जोखिम उठाते थे।
अंग्रेजों की नजर से बचते हुए वे हर संभव सहयोग करते रहे। आजादी की इस जंग में उनके साथियों को भी जेल की यातनाएं सहनी पड़ीं। कोई छह महीने तो कोई दो महीने तक जेल की सलाखों के पीछे रहा। बावजूद इसके, उन्होंने हार नहीं मानी और आखिरी दम तक देश की आजादी के लिए संघर्ष करते रहे।
परिजनों ने अपने खर्चे से बनाया स्वतंत्रता सेनानी का स्मारक
बाकरगंज के वीर सपूतों ने आजादी की लड़ाई में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया लेकिन उनकी स्मृति में प्रशासन एक स्मारक तक नहीं बनवा सका। गांव के बृजेंद्र सिंह, अमर सिंह, रोहित सिंह और पंजाबी सेठ ने बताया कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यहां के योद्धाओं ने अंग्रेजों के खिलाफ डटकर संघर्ष किया, जेल यातनाएं सहीं और प्राणों की आहुति दी।
इसके बावजूद आज तक उनकी याद में कोई सरकारी स्मारक नहीं बनाया गया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता सेनानी रामऔतार सिंह के परिजनों ने अपने पैसे से स्मारक का निर्माण कराया ताकि आने वाली पीढ़ियां उनके बलिदान को याद रख सकें। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन को चाहिए कि गांव के अन्य शहीदों की स्मृति में भी स्थायी स्मारक बनवाए जाएं।

रामऔतार सिंह।