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मायूस चेहरों पर बिखरी मुस्कान
अमर उजाला ब्यूरो कौशाम्बी
Updated Wed, 23 Aug 2017 01:34 AM IST
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कौशाम्बी
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तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के प्रतिबंध के फैसले का मंगलवार को घर-घर स्वागत हुआ। क्या हिंदू और क्या मुसलमान, सभी इस फैसले से राजी हैं। सबसे ज्यादा खुशी उनके चेहरे पर दिखी जो तीन तलाक के कहर से पीड़ित हैं। उनकी आंख में आंसू तो थे लेकिन चेहरे पर दिली खुशी साफ झलक रही थी। हालांकि मौलानाओं में आपसी सामंजस्य नहीं दिखा। किसी ने इसे बेहतरीन फैसला बताया तो किसी ने कानून बनाने में धर्मगुरुओं की राय जानने की बात कही।
तीन तलाक को सुप्रीमकोर्ट ने प्रतिबंधित कर दिया है। साथ ही इस पर कानून बनाने के लिए संसद को प्रस्ताव रखने को कहा है। टीवी चैनल व सोशल मीडिया पर जैसे ही यह न्यूज छाई महिलाओं के चेहरे खिल गए। घर-घर इस फैसले का स्वागत हुआ। वे चेहरे भी खुशी से रो पडे़ जो तीन तलाक का दंश झेल रहे हैं। करारी, मंझनपुर, सैयदसरांवा, महगांव, परास समेत तमाम मुस्लिम आबादी बाहुल्य वाले गांवों का माहौल बदला था। महिलाओं के दिल से तलाक के खौफ में जीने का डर निकल चुका था। वहीं मौलानाओं में इस फैसले को लेकर तालमेल नहीं दिखा। मौलानाओं की अलग-अलग राय रही। उन्होंने सुप्रीमकोर्ट के फैसले पर रजामंदी तो जाहिर की लेकिन अपनी शर्तें भी जरूर रखीं।
‘वे सुप्रीम कोर्ट का फैसला मानते हैं, लेकिन संसद में जो कानून पास होना है इसमें मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य जरूर रखे जाएं और उनकी राय जरूर ली जाए। इसके बाद ही कानून बनाया जाए।’
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मौलाना हाफिज आरिफ (चायल)
‘खुले दिल से इस फैसले का स्वागत है। काफी दिनों से तीन तलाक का विरोध हो रहा था। इसका लोग बेजा इस्तेमाल करने लगे थे। यह हमारे धर्म के खिलाफ भी था। कानून बनने से अब तलाक का खौफ महिलाओं में नहीं रहेगा।’
हाफिज तसौव्वर हुसैन (चायल)
सुप्रीम कोर्ट की बात सही है, लेकिन शरियत के कानून में दखलंदाजी भी नहीं होनी चाहिए। कानून बनाते समय इसका ख्याल रखा जाए, नहीं तो विरोध होगा।
मौलाना हाफिज अब्दुल कलाम कुरैशी (करारी)
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तीन तलाक को सुप्रीमकोर्ट ने प्रतिबंधित कर दिया है। साथ ही इस पर कानून बनाने के लिए संसद को प्रस्ताव रखने को कहा है। टीवी चैनल व सोशल मीडिया पर जैसे ही यह न्यूज छाई महिलाओं के चेहरे खिल गए। घर-घर इस फैसले का स्वागत हुआ। वे चेहरे भी खुशी से रो पडे़ जो तीन तलाक का दंश झेल रहे हैं। करारी, मंझनपुर, सैयदसरांवा, महगांव, परास समेत तमाम मुस्लिम आबादी बाहुल्य वाले गांवों का माहौल बदला था। महिलाओं के दिल से तलाक के खौफ में जीने का डर निकल चुका था। वहीं मौलानाओं में इस फैसले को लेकर तालमेल नहीं दिखा। मौलानाओं की अलग-अलग राय रही। उन्होंने सुप्रीमकोर्ट के फैसले पर रजामंदी तो जाहिर की लेकिन अपनी शर्तें भी जरूर रखीं।
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‘वे सुप्रीम कोर्ट का फैसला मानते हैं, लेकिन संसद में जो कानून पास होना है इसमें मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य जरूर रखे जाएं और उनकी राय जरूर ली जाए। इसके बाद ही कानून बनाया जाए।’
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मौलाना हाफिज आरिफ (चायल)
‘खुले दिल से इस फैसले का स्वागत है। काफी दिनों से तीन तलाक का विरोध हो रहा था। इसका लोग बेजा इस्तेमाल करने लगे थे। यह हमारे धर्म के खिलाफ भी था। कानून बनने से अब तलाक का खौफ महिलाओं में नहीं रहेगा।’
हाफिज तसौव्वर हुसैन (चायल)
सुप्रीम कोर्ट की बात सही है, लेकिन शरियत के कानून में दखलंदाजी भी नहीं होनी चाहिए। कानून बनाते समय इसका ख्याल रखा जाए, नहीं तो विरोध होगा।
मौलाना हाफिज अब्दुल कलाम कुरैशी (करारी)