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जॉब कार्डधारकों के लिए छलावा साबित हो रही मनरेगा
अमर उजाला ब्यूरो कौशाम्बी
Updated Thu, 22 Sep 2016 12:32 AM IST
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दोआबा में जॉब कार्डधारक मजदूरों के लिए मनरेगा छलावा साबित हो रही है। जिले की लगभग 350 ग्राम सभाओं में मनरेगा का काम चार माह से ठप चला आ रहा है। गांव में रोजगार न मिलने से जॉब कार्ड धारक मजदूरों को रोजी की तलाश में पलायन करना पड़ रहा है। जिम्मेदार हैं कि वह हाथ पर हाथ धरे बैठे हुए हैं।
दोआबा में एक लाख से अधिक मजदूरों ने जॉब कार्ड बनवा रखा है। मनरेगा का काम शुरू होने पर इन मजदूरों को गांव में ही आसानी से रोजगार मिल जाता है, लेकिन चार माह से मनरेगा मजदूरों को धोखा दे रही है। आठ ब्लॉकों के 498 ग्राम सभाओं से लगभग 350 ग्राम सभाओं के मजदूरों को चार माह से काम नहीं मिल सका है। गांव में काम न मिलने से मजदूरों को रोजी की तलाश में गैर जनपद और राज्यों में शरण लेना पड़ रहा है। काम ठप होने से मनरेगा मजदूरों का हाल बेहाल है। दूसरी ओर जिम्मेदार हैं कि वह मामले में पूरी तरह से चुप्पी साधे हुए हैं। मजदूरों का पलायन होता देख जिम्मेदार ग्राम सभाओं में काम की शुरुआत नहीं करा पा रहे हैं।
दो करोड़ से अधिक की मजदूरी है लंबित
मंझनपुर। मनरेगा मजदूरों के साथ शासन-प्रशासन द्वारा मनमानी की जा रही है। जिले के मजदूरों ने हाड़तोड़ मेहनत कर मनरेगा में काम किया, लेकिन शासन स्तर पर मजदूरी का भुगतान लंबित चल रहा है। विभागीय आंकड़ों पर जाएं तो वर्ष 15-16 में काम करने वाले मजदूरों का 34 लाख और 16-17 में किए गए काम का एक करोड़ 97 लाख रुपया भुगतान के लिए लंबित है।
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जिन मजदूरों की मजदूरी का भुगतान नहीं हो सका है वह अब मनरेगा में किसी भी कीमत पर काम करने को तैयार नहीं है। ऐसे मजदूर दूसरे जगहों पर काम करने को राजी हैं पर मनरेगा के नाम पर हाथ खड़े कर रहे हैं। जिम्मेदार हैं कि वह जॉब कार्ड धारकों की बकाया मजदूरी का भुगतान कराने के लिए तनिक भी प्रयास नहीं कर रहे हैं।
पंचायत मित्रों का हाल भी है बेहाल
ग्राम सभाओं में मनरेगा में रोजगार सेवक के रूप में काम देखने वाले पंचायतों मित्रों का भी हाल बेहाल है। मानदेय भुगतान न होने पर पंचायत मित्रों द्वारा आए दिन ब्लॉक और जिला मुख्यालय पर धरना-प्रदर्शन किया जाता रहा। इसके बावजूद शासन के कानों में जूं नहीं रेंग रही। मनरेगा से रोजगार सेवकों का मानदेय न दिए जाने को लेकर यह भी काम कराने में कोई रुचि नहीं दिखा रहे हैं। इसके चलते मजदूरों को गांव में ही रोजगार दिलाने का दावा दिनाेंदिन खोखला होता जा रहा है।
चार माह में महज ढाई हजार मजदूरों को मिला काम
मनरेगा में काम करने के लिए जिले भर में एक लाख से अधिक मजदूरों का पंजीयन है। इन मजदूरों में से महज ढाई हजार जॉब कार्ड धारकों को पिछले चार महीने में काम मिल सका है। मनरेगा में काम करने के बाद अटकी मजदूरी का भुगतान कराने के लिए यह मजदूर भी हलाकान हैं। उधर जिले के जिम्मेदार हैं कि वह मजदूरों की मजदूरी भुगतान को लेकर चुप्पी साधे हुए हैं।
21 जून 2016 के बाद से शासन ने मजदूरी भुगतान का एक पैसा नहीं भेजा। मजदूरी न मिलने से जॉब कार्ड धारकों ने काम करना बंद कर दिया है। मजदूरी का भुगतान कब तक होगा यह शासन का विषय है। जब काम करने के बाद पैसा नहीं मिलेगा तो मजदूर कैसे मनरेगा में काम करेंगे।
गजेंद्र कुमार तिवारी, डीसी मनरेगा
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दोआबा में एक लाख से अधिक मजदूरों ने जॉब कार्ड बनवा रखा है। मनरेगा का काम शुरू होने पर इन मजदूरों को गांव में ही आसानी से रोजगार मिल जाता है, लेकिन चार माह से मनरेगा मजदूरों को धोखा दे रही है। आठ ब्लॉकों के 498 ग्राम सभाओं से लगभग 350 ग्राम सभाओं के मजदूरों को चार माह से काम नहीं मिल सका है। गांव में काम न मिलने से मजदूरों को रोजी की तलाश में गैर जनपद और राज्यों में शरण लेना पड़ रहा है। काम ठप होने से मनरेगा मजदूरों का हाल बेहाल है। दूसरी ओर जिम्मेदार हैं कि वह मामले में पूरी तरह से चुप्पी साधे हुए हैं। मजदूरों का पलायन होता देख जिम्मेदार ग्राम सभाओं में काम की शुरुआत नहीं करा पा रहे हैं।
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दो करोड़ से अधिक की मजदूरी है लंबित
मंझनपुर। मनरेगा मजदूरों के साथ शासन-प्रशासन द्वारा मनमानी की जा रही है। जिले के मजदूरों ने हाड़तोड़ मेहनत कर मनरेगा में काम किया, लेकिन शासन स्तर पर मजदूरी का भुगतान लंबित चल रहा है। विभागीय आंकड़ों पर जाएं तो वर्ष 15-16 में काम करने वाले मजदूरों का 34 लाख और 16-17 में किए गए काम का एक करोड़ 97 लाख रुपया भुगतान के लिए लंबित है।
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जिन मजदूरों की मजदूरी का भुगतान नहीं हो सका है वह अब मनरेगा में किसी भी कीमत पर काम करने को तैयार नहीं है। ऐसे मजदूर दूसरे जगहों पर काम करने को राजी हैं पर मनरेगा के नाम पर हाथ खड़े कर रहे हैं। जिम्मेदार हैं कि वह जॉब कार्ड धारकों की बकाया मजदूरी का भुगतान कराने के लिए तनिक भी प्रयास नहीं कर रहे हैं।
पंचायत मित्रों का हाल भी है बेहाल
ग्राम सभाओं में मनरेगा में रोजगार सेवक के रूप में काम देखने वाले पंचायतों मित्रों का भी हाल बेहाल है। मानदेय भुगतान न होने पर पंचायत मित्रों द्वारा आए दिन ब्लॉक और जिला मुख्यालय पर धरना-प्रदर्शन किया जाता रहा। इसके बावजूद शासन के कानों में जूं नहीं रेंग रही। मनरेगा से रोजगार सेवकों का मानदेय न दिए जाने को लेकर यह भी काम कराने में कोई रुचि नहीं दिखा रहे हैं। इसके चलते मजदूरों को गांव में ही रोजगार दिलाने का दावा दिनाेंदिन खोखला होता जा रहा है।
चार माह में महज ढाई हजार मजदूरों को मिला काम
मनरेगा में काम करने के लिए जिले भर में एक लाख से अधिक मजदूरों का पंजीयन है। इन मजदूरों में से महज ढाई हजार जॉब कार्ड धारकों को पिछले चार महीने में काम मिल सका है। मनरेगा में काम करने के बाद अटकी मजदूरी का भुगतान कराने के लिए यह मजदूर भी हलाकान हैं। उधर जिले के जिम्मेदार हैं कि वह मजदूरों की मजदूरी भुगतान को लेकर चुप्पी साधे हुए हैं।
21 जून 2016 के बाद से शासन ने मजदूरी भुगतान का एक पैसा नहीं भेजा। मजदूरी न मिलने से जॉब कार्ड धारकों ने काम करना बंद कर दिया है। मजदूरी का भुगतान कब तक होगा यह शासन का विषय है। जब काम करने के बाद पैसा नहीं मिलेगा तो मजदूर कैसे मनरेगा में काम करेंगे।
गजेंद्र कुमार तिवारी, डीसी मनरेगा