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Holi 2022 : यहां एक सप्ताह तक खेली जाती है होली, ब्रिटिश हुकूमत के समय से चली आ रही परंपरा

Wed, 16 Mar 2022 08:30 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, कौशांबी
अमर उजाला नेटवर्क, कौशांबी Published by: विनोद सिंह Updated Wed, 16 Mar 2022 08:30 PM IST
सार

सरायअकिल कस्बे के 98 वर्षीय गामा हलवाई बताते हैं कि यहां हर दिन अलग अलग मोहल्ले में होली खेली जाती है। हर मोहल्ले का दिन निर्धारित रहता है। पहले होलियारों का झुंड बैलगाड़ी में भांग और ठंडई लेकर ढोल, मजीरा और झांझ के साथ अबीर गुलाल उड़ाते हुए नाचते गाते गलियों से गुजरता था।

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Holi 2022 :- The tradition going on from Saraikil since the time of British rule
होली (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

देश के अलग-अलग शहरों की तरह कस्बे की होली के अलग रंग हैं। यहां होली एक सप्ताह तक खेली जाती है। ब्रिटिश हुकूमत के समय से यह परंपरा चली आ रही है। परंपरा की शुरुआत जमींदार जालिम सिंह ने की थी। उस वक्त पखवाडे़ भर तक होली का त्योहार मनाया जाता था।

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इसके बाद जमींदार के बेटे हनुमंत सिंह व पौत्र रघुराज सिंह ने भी 15 दिन की परंपरा को कायम रखा। 1910 में चौथी पीढ़ी के ताल्लुकेदार रामकृपाल सिंह ने इस परंपरा को सात दिन तक कर दिया जो आज तक चली आ रही है। स्थानीय लोगों के अनुसार कस्बे में होली त्योहार की परंपरा का अनूठा इतिहास रहा है।
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सरायअकिल कस्बे के 98 वर्षीय गामा हलवाई बताते हैं कि यहां हर दिन अलग अलग मोहल्ले में होली खेली जाती है। हर मोहल्ले का दिन निर्धारित रहता है। पहले होलियारों का झुंड बैलगाड़ी में भांग और ठंडई लेकर ढोल, मजीरा और झांझ के साथ अबीर गुलाल उड़ाते हुए नाचते गाते गलियों से गुजरता था। जिस मोहल्ले का फाग होता था वहां के लोग ड्रमों में रंग घोलकर होलियारों के ऊपर डालते थेे। इसके बाद अबीर -गुलाल लगाने के साथ ही गुझिया और पापड़ खिलाकर  स्वागत करते थे।

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हवेली से शुरू होता है फाग
 कस्बे में होली के गायन की शुरुआत सबसे पहले जमींदार की हवेली से होता है। इसके बाद अलग-अलग मोहल्ले में होली का पर्व मनाया जाता है। पहले दिन चावलमंडी, दूसरे दिन बताशा मंडी, तीसरे दिन ठठेरी बाजार, चौथे दिन अंजहाई बाजार, पांचवें दिन कपड़ा मंडी, छठे दिन गुड़ मंडी के बाद आखिरी दिन सरायअकिल कोतवाली में होली खेलकर लोग पर्व का समापन करते हैं। 


एक दिन पहले जमींदार कराते थे मुनादी
जिस मोहल्ले में होली खेलनी होती थी वहां एक दिन पहले जमींदार जालिम सिंह मुनादी कराते थे। उस दिन कस्बे के बच्चे, बड़े, बुजुर्ग शामिल होकर रंगोत्सव का आनंद लेते थे और एक दूसरे के गले मिलकर त्योहार की बधाई देते थे। यह क्रम सप्ताह भर तक चलता था। मुनादी से लोगों को पता चल जाता था कि आज किस मोहल्ले में होली होगी।

कस्बा में पहले दिन नही होती है होली
ब्रिटिश हुकूमत से होली की परंपरा में पहले दिन कस्बा में होली नही खेली जाती है, हर दिन की तरह बाजार खुली रहती है। स्थानीय लोगों के अनुसार होली के पहले दिन गांवों में रंग खेला जाता था। गांव से भी  जमींदार घराने में होली मिलने के लिए लोग आया करते थे। इसलिए होली के दूसरे दिन से सप्ताह भर होली खेली जाती है।



1950 तक थी जमींदारों के हाथ होली की कमान
1950 तक होली की परंपरा जमींदारों के हाथ में थी। जमींदारी खत्म होने के बाद कस्बा के लोग स्वतंत्रता के साथ आज भी सात दिन की होली मनाते हैं। हालांकि बदलते समय के साथ होली खेलने का स्वरूप भी बदलता जा रहा है। अब लोग रंग लगाने के बहाने कपड़ा फाड़ने को ज्यादा तरजीह देते हैं।

आकर्षण का केंद्र रहती है तमेरों की पिचकारी 
 चायल के पूर्व विधायक एवं वर्तमान चेयरमैन शिवदानी बताते है कि ब्रिटिश हुकूमत के समय कस्बा में तमेरों की संख्या 75 फीसदी थी। पीतल के बर्तनों का बड़ा कारोबार होता था, लेकिन आज इनकी संख्या घटकर मात्र 30 घर तक सीमित हो गई है। उस समय होली खेलने के लिए पीतल की पांच फिट लंबी पिचकारी निकलती थी। पिचकारी देखने के लिए गांवों से लोग आते थे। आज भी होली में पीतल की पिचकारी आकर्षण का केंद्र रहती है।

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