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वितरण से लेकर उठान तक होता है घोटाला
अमर उजाला ब्यूरो कौशाम्बी
Updated Tue, 07 Jun 2016 12:01 AM IST
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क्षेत्र की बेपटरी हुई सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर डाका पड़ गया है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली को जनहित में दुरुस्त किए जाने की प्रशासनिक स्तर पर पहल नहीं किए जाने से उपभोक्ताओं में निराशा पैदा हो रही है।
जिले में खाद्य सुरक्षा कानून लागू होने का लाभ सीधे क्षेत्र की गरीब जनता को नहीं मिल पा रहा है। जानकारों का कहना है कि गरीबों के नाम पर आने वाले खाद्यान्न की कालाबाजारी करा हर कोई अपनी तिजोरी भरने पर तुला हुआ है। चर्चा है कि जिले में आए एक अधिकारी ने कदम रखते ही अपना कमीशन ढाई गुना बढ़ा दिया है। उन्हें उचित माध्यम से धन उगाही कर पैसा पहुंचाए जाने के खेल से गरीबों के पेट पर डाका डाला जा रहा है।
सूत्रों का कहना है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली को दुरुस्त करने के लिए हर माह जिले से वितरण अधिकारी की तैनाती होते हैं। वितरण अधिकारी की जिम्मेदारी होती है कि वे अपनी मौजूदगी में खाद्यान्न का वितरण कराए। पर, सच यह है कि कोई भी वितरण अधिकारी अपनी मौजदूगी में वितरण नहीं कराता है। जानकारों का कहना है कि अगर वितरण अधिकारी अपने दायित्व का ईमानदारी से निर्वहन करनें लगे तो कोई भी ताकत गरीबों के पेट पर डाका नहीं डाल सकता है। नाम गोपनीय रखे जाने की शर्त पर क्षेत्र के एक कोटेदार बताता है कि गांव के कोटेदार की भूमिका कामधेनु जैसी हो गई है। उसे जब जो चाहता है जांच के नाम पर दुह लेता है।
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जिले में खाद्य सुरक्षा कानून लागू होने का लाभ सीधे क्षेत्र की गरीब जनता को नहीं मिल पा रहा है। जानकारों का कहना है कि गरीबों के नाम पर आने वाले खाद्यान्न की कालाबाजारी करा हर कोई अपनी तिजोरी भरने पर तुला हुआ है। चर्चा है कि जिले में आए एक अधिकारी ने कदम रखते ही अपना कमीशन ढाई गुना बढ़ा दिया है। उन्हें उचित माध्यम से धन उगाही कर पैसा पहुंचाए जाने के खेल से गरीबों के पेट पर डाका डाला जा रहा है।
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सूत्रों का कहना है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली को दुरुस्त करने के लिए हर माह जिले से वितरण अधिकारी की तैनाती होते हैं। वितरण अधिकारी की जिम्मेदारी होती है कि वे अपनी मौजूदगी में खाद्यान्न का वितरण कराए। पर, सच यह है कि कोई भी वितरण अधिकारी अपनी मौजदूगी में वितरण नहीं कराता है। जानकारों का कहना है कि अगर वितरण अधिकारी अपने दायित्व का ईमानदारी से निर्वहन करनें लगे तो कोई भी ताकत गरीबों के पेट पर डाका नहीं डाल सकता है। नाम गोपनीय रखे जाने की शर्त पर क्षेत्र के एक कोटेदार बताता है कि गांव के कोटेदार की भूमिका कामधेनु जैसी हो गई है। उसे जब जो चाहता है जांच के नाम पर दुह लेता है।
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