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आरटीआई कार्यकर्ता ने उड़ाई यूपी पुलिस की नींद
ब्यूरो/अमर उजाला कौशाम्बी
Updated Wed, 06 May 2015 12:01 AM IST
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लखनऊ में रहने वाले सेवानिवृत्त इंजीनियर और आरटीआई कार्यकर्ता संजय कुमार ने अपनी एक मांग से यूपी पुलिस को पसीना-पसीना कर दिया है। उन्होंने जन सूचना अधिकार अधिनियम के तहत डीजीपी से पिछले 65 साल में विभागीय खर्च का ब्यौरा मांगा है। इसे लेकर डीजीपी के साथ ही प्रदेश के सभी जिलों के पुलिस अधीक्षक परेशान हैं। अफसरों को सूझ नहीं रहा कि इतना पुराना ब्यौरा कहां से उपलब्ध कराया जाए? कौशाम्बी पुलिस ने तो ब्यौरा अनुपलब्ध होने की बात कहकर अपना पल्लू झाड़ लिया है।
लखनऊ के राजाजीपुरम मोहल्ले में रहने वाले रिटायर्ड इंजीनियर संजय कुमार ने पुलिस महानिदेशक से जन सूचना अधिकार अधिनियम के तहत जनवरी 1950 से अब तक सभी मदों में उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग में हुए खर्च का ब्यौरा मांगा है। मांगपत्र मिलने पर डीजीपी ने प्रदेश के सभी पुलिस अधीक्षकों को पत्र भेजकर अपने-अपने जिले का ब्यौरा देने के लिए कहा है। प्रदेश पुुलिस प्रमुख का फरमान पढ़ते ही प्रदेश के सभी जिलों के पुलिस अधीक्षक सन्न रह गए हैं। पुलिस अफसरों को समझ में नहीं आ रहा कि इतनी पुरानी जानकारी कहां से इकट्ठी की जाए? कौशाम्बी पुलिस ने ब्यौरा तलाशने की कोशिश भी की लेकिन कामयाबी नहीं मिली। पुलिस अधिकारियों की मानें तो दस-बीस साल का ब्यौरा तो उपलब्ध हो सकता है, लेकिन इसके लिए भी काफी मेहनत करनी होगी। पर, दो दशक से ज्यादा पुराना ब्यौरा मिल पाना संभव नहीं लग रहा है।
बता दें कि दो दिनों तक मातहतों से मेहनत कराने के बाद आंकड़ा नहीं जुट पाने पर कौशाम्बी एसपी ने ब्यौरे की अनुपलब्धता बताकर अपने हाथ खड़े कर दिए हैं। कौशाम्बी के पुलिस अफसरों का कहना है कि कौशाम्बी जिले का सृजन ही वर्ष 1997 में हुआ है। ऐसे में अप्रैल 1997 से अब तक का ब्यौरा तो हासिल हो सकता है। इसके पहले विभाग के खर्च का विवरण यहां कैसे उपलब्ध होगा। अफसरों की मानें तो कई और जिलों के पुलिस अफसर भी इसी तरह से अपने हाथ खड़े कर चुके हैं। नतीजतन आरटीआई कार्यकर्ता को मांगी गई जानकारी मिलने की उम्मीद दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही है।
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ओपी पांडेय प्रभारी एसपी कौशाम्बी ने बताया आरटीआई कार्यकर्ता द्वारा इतना पुराना ब्यौरा मांगा गया है जो मिल पाना संभव नहीं दिख रहा है। फिलहाल इस प्रकरण की जानकारी भी नहीं है। पुलिस अधीक्षक अवकाश पर हैं। सूचना विभाग देखने वाले बाबू से बात करने के बाद ही कुछ बताया जा सकता है। जितना संभव है उतनी सूचनाएं आरटीआई कार्यकर्ताओं को उपलब्ध करवाई जाती हैं।
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लखनऊ के राजाजीपुरम मोहल्ले में रहने वाले रिटायर्ड इंजीनियर संजय कुमार ने पुलिस महानिदेशक से जन सूचना अधिकार अधिनियम के तहत जनवरी 1950 से अब तक सभी मदों में उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग में हुए खर्च का ब्यौरा मांगा है। मांगपत्र मिलने पर डीजीपी ने प्रदेश के सभी पुलिस अधीक्षकों को पत्र भेजकर अपने-अपने जिले का ब्यौरा देने के लिए कहा है। प्रदेश पुुलिस प्रमुख का फरमान पढ़ते ही प्रदेश के सभी जिलों के पुलिस अधीक्षक सन्न रह गए हैं। पुलिस अफसरों को समझ में नहीं आ रहा कि इतनी पुरानी जानकारी कहां से इकट्ठी की जाए? कौशाम्बी पुलिस ने ब्यौरा तलाशने की कोशिश भी की लेकिन कामयाबी नहीं मिली। पुलिस अधिकारियों की मानें तो दस-बीस साल का ब्यौरा तो उपलब्ध हो सकता है, लेकिन इसके लिए भी काफी मेहनत करनी होगी। पर, दो दशक से ज्यादा पुराना ब्यौरा मिल पाना संभव नहीं लग रहा है।
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बता दें कि दो दिनों तक मातहतों से मेहनत कराने के बाद आंकड़ा नहीं जुट पाने पर कौशाम्बी एसपी ने ब्यौरे की अनुपलब्धता बताकर अपने हाथ खड़े कर दिए हैं। कौशाम्बी के पुलिस अफसरों का कहना है कि कौशाम्बी जिले का सृजन ही वर्ष 1997 में हुआ है। ऐसे में अप्रैल 1997 से अब तक का ब्यौरा तो हासिल हो सकता है। इसके पहले विभाग के खर्च का विवरण यहां कैसे उपलब्ध होगा। अफसरों की मानें तो कई और जिलों के पुलिस अफसर भी इसी तरह से अपने हाथ खड़े कर चुके हैं। नतीजतन आरटीआई कार्यकर्ता को मांगी गई जानकारी मिलने की उम्मीद दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही है।
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ओपी पांडेय प्रभारी एसपी कौशाम्बी ने बताया आरटीआई कार्यकर्ता द्वारा इतना पुराना ब्यौरा मांगा गया है जो मिल पाना संभव नहीं दिख रहा है। फिलहाल इस प्रकरण की जानकारी भी नहीं है। पुलिस अधीक्षक अवकाश पर हैं। सूचना विभाग देखने वाले बाबू से बात करने के बाद ही कुछ बताया जा सकता है। जितना संभव है उतनी सूचनाएं आरटीआई कार्यकर्ताओं को उपलब्ध करवाई जाती हैं।