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सीएम सामूहिक विवाह योजना: दिलचस्पी नहीं दिखा रहे मुस्लिम
kaushambi
Updated Wed, 14 Nov 2018 12:45 AM IST
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मंझनपुर। बेटियों की शादी को लेकर मुस्लिम समाज मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना से दूरी बनाए हुए हैं। अभी तक इस महत्वपूर्ण योजना के तहत तीन मुस्लिम जोड़ों ने ही शादी रचाई है। मुस्लिम जोड़ों को शादी के लिए खोजने में अफसरों को पसीना आ रहा है। सपा सरकार गरीबों की शादी के लिए 20 हजार का अनुदान देती थी। प्रदेश की मौजूदा योगी सरकार ने इसका स्वरूप बदल दिया है। भाजपा सरकार ने मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना संचालित कर इसके तहत 35 हजार रुपये मुहैया कराने की व्यवस्था कर दी है। योजना के तहत 20 हजार रुपये लड़की के खाते में तो दस हजार रुपये शादी की जरूरत वाले उपहारों पर तथा पांच हजार रुपये समारोह के लिए लगाए जाने वाले टेंट भोजन आदि पर खर्च करने की व्यवस्था की है। पिछले सत्र में योजना के तहत 179 जोड़ों ने शादी रचाई थी।
इस साल योजना के तहत 15 सौ गरीब परिवारों की बेटियों के हाथ पीले करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। सत्र की शुरूआत में मई महीने में आयोजित समारोह के दौरान 74 जोड़ों की शादी कराई गई थी। इनमें से सिर्फ तीन मुस्लिमों ने निकाह कराया। अब 19 नवंबर को डायट मैदान में जिला स्तरीय समारोह आयोजित कर 202 जोड़ों की शादी कराने की विभागीय योजना है। जिला समाज कल्याण अधिकारी सुधीर कुमार ने बताया कि अब तक 110 जोड़ों का पंजीकरण हो चुका है। इनमें से महज दो मुस्लिम जोड़े निकाह के लिए राजी हुए हैं। सामूहिक विवाह योजना के तहत मुस्लिमों के गरीब परिवार क्यों राजी नहीं हो रहे हैं। इसे लेकर अफसरों की चिंता बढ़ गई है। अल्पसंख्यकों की भागीदारी बढ़ाने के लिए अफसर हैरान-परेशान हैं।
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इस साल योजना के तहत 15 सौ गरीब परिवारों की बेटियों के हाथ पीले करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। सत्र की शुरूआत में मई महीने में आयोजित समारोह के दौरान 74 जोड़ों की शादी कराई गई थी। इनमें से सिर्फ तीन मुस्लिमों ने निकाह कराया। अब 19 नवंबर को डायट मैदान में जिला स्तरीय समारोह आयोजित कर 202 जोड़ों की शादी कराने की विभागीय योजना है। जिला समाज कल्याण अधिकारी सुधीर कुमार ने बताया कि अब तक 110 जोड़ों का पंजीकरण हो चुका है। इनमें से महज दो मुस्लिम जोड़े निकाह के लिए राजी हुए हैं। सामूहिक विवाह योजना के तहत मुस्लिमों के गरीब परिवार क्यों राजी नहीं हो रहे हैं। इसे लेकर अफसरों की चिंता बढ़ गई है। अल्पसंख्यकों की भागीदारी बढ़ाने के लिए अफसर हैरान-परेशान हैं।
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