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दुविधा में बसपा कार्यकर्ता, इधर जाएं या उधर
Fri, 26 Apr 2019 12:56 AM IST
shailendra Kumar
kaushambi
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Published by: shailendra Kumar
Updated Fri, 26 Apr 2019 12:56 AM IST
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लोकसभा चुनाव को लेकर जिले के बसपा कार्यकर्ता दुविधा में हैं। उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर वो किधर जाएं। गठबंधन के चलते सपा के खाते में गई सीट पर कोई बसपाई दिग्गज का दौरा नहीं होने से कार्यकर्ता मायूस हैं। वोटर भी भ्रम में हैं।
तीन दशक पहले वर्ष 1989 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने जिले की सियासत में कदम रखा। तब से अब तक हुए आठ लोकसभा चुनावों में भले ही सिर्फ एक बार पार्टी प्रत्याशी को यहां से सफलता मिली हो। पर, तकरीबन हर चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन दमदार जरूर रहा है। लंबे समय तक पार्टी के लिए अभेद्य दुर्ग रहे कौशाम्बी संसदीय सीट पर तीन दशक के सियासी सफर में ये पहला चुनाव है जब बसपा का उम्मीदवार मैदान में नहीं है।
गठबंधन के कारण सपा के खाते में गई इस सीट से बसपा छोड़कर आए पूर्व मंत्री इंद्रजीत सरोज चुनावी समर में हैं। सदर विधानसभा से चार बार विधायक और बसपा सरकार में दो मर्तबा मंत्री रहे इंद्रजीत की जिले की सियासत में खासतौर से दलितों के बीच मजबूत पकड़ मानी जाती है। हालांकि बसपा छोड़ने के दौरान पार्टी सुप्रीमो मायावती से इंद्रजीत की तल्खी के कारण जिले की दलित बिरादरी के एक बडे़ तबके से उनकी दूरी भी जगजाहिर है। मौजूदा चुनाव में वह तबका पूरी तरह से कटा-कटा दिख रहा है। चुनाव में अभी तक बसपा के किसी स्टार प्रचारक का कार्यक्रम नहीं तय होने को सियासी इसी से जोड़कर देख रहे हैं।
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इन परिस्थितियों में बसपा कार्यकर्ता पशोपेश में हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि चुनाव में वो किधर जाएं। पार्टी सुप्रीमो की कोई रैली नहीं होने से जिले के वोटरों में भी भ्रम की स्थिति से बनी है। क्योंकि इससे पहले तक हुए तकरीबन सभी लोकसभा अथवा विधानसभा चुनावों में पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की जनसभाएं जिले में जरूर होती थी। हालांकि, बसपा जिलाध्यक्ष महेंद्र गौतम का साफ कहना है कि पार्टी के सभी पदाधिकारी, कार्यकर्ता गठबंधन प्रत्याशी के साथ हैं। सभी लोग पूरी जिम्मेदारी के साथ चुनाव प्रचार कर रहे हैं। कहीं कोई भ्रम की स्थिति नहीं है।
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तीन दशक पहले वर्ष 1989 के लोकसभा चुनाव में बसपा ने जिले की सियासत में कदम रखा। तब से अब तक हुए आठ लोकसभा चुनावों में भले ही सिर्फ एक बार पार्टी प्रत्याशी को यहां से सफलता मिली हो। पर, तकरीबन हर चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन दमदार जरूर रहा है। लंबे समय तक पार्टी के लिए अभेद्य दुर्ग रहे कौशाम्बी संसदीय सीट पर तीन दशक के सियासी सफर में ये पहला चुनाव है जब बसपा का उम्मीदवार मैदान में नहीं है।
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गठबंधन के कारण सपा के खाते में गई इस सीट से बसपा छोड़कर आए पूर्व मंत्री इंद्रजीत सरोज चुनावी समर में हैं। सदर विधानसभा से चार बार विधायक और बसपा सरकार में दो मर्तबा मंत्री रहे इंद्रजीत की जिले की सियासत में खासतौर से दलितों के बीच मजबूत पकड़ मानी जाती है। हालांकि बसपा छोड़ने के दौरान पार्टी सुप्रीमो मायावती से इंद्रजीत की तल्खी के कारण जिले की दलित बिरादरी के एक बडे़ तबके से उनकी दूरी भी जगजाहिर है। मौजूदा चुनाव में वह तबका पूरी तरह से कटा-कटा दिख रहा है। चुनाव में अभी तक बसपा के किसी स्टार प्रचारक का कार्यक्रम नहीं तय होने को सियासी इसी से जोड़कर देख रहे हैं।
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इन परिस्थितियों में बसपा कार्यकर्ता पशोपेश में हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि चुनाव में वो किधर जाएं। पार्टी सुप्रीमो की कोई रैली नहीं होने से जिले के वोटरों में भी भ्रम की स्थिति से बनी है। क्योंकि इससे पहले तक हुए तकरीबन सभी लोकसभा अथवा विधानसभा चुनावों में पूर्व मुख्यमंत्री मायावती की जनसभाएं जिले में जरूर होती थी। हालांकि, बसपा जिलाध्यक्ष महेंद्र गौतम का साफ कहना है कि पार्टी के सभी पदाधिकारी, कार्यकर्ता गठबंधन प्रत्याशी के साथ हैं। सभी लोग पूरी जिम्मेदारी के साथ चुनाव प्रचार कर रहे हैं। कहीं कोई भ्रम की स्थिति नहीं है।