यूपी : केले की खेती ने बदल दी अंगद के परिवार की किस्मत, भूमिहीन परिवार आज है इतने बीघे का काश्तकार
मोज्जमपुर करारी निवासी 42 वर्षीय अंगद कुशवाहा की गिनती न केवल कौशाम्बी बल्कि आसपास के जिलों तक प्रगतिशील किसानों में होती है। उन्हें यह पहचान व सम्मान केले की खेती से मिला है। इस वक्त भले ही वह 42 बीघे के काश्तकार हों, लेकिन एक समय ऐसा था जब खेत के नाम पर एक बिस्वा भी भूमि नहीं थी।
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खेती से भी तरक्की की इबारत लिखी जा सकती है। जरूरत है तो सिर्फ लगन और कड़ी मेहनत की। उत्साह बढ़ाने के लिए कही जाने वाली ऐसी बातों को सदर ब्लॉक के अंगद कुशवाहा ने साबित कर दिखाया है। एक दौर वह था जब अंगद का परिवार पाई-पाई के लिए मोहताज था। लेकिन, मजबूत इरादों की बदौलत केले की खेती कर उन्होंने इसे खुशहाली में बदल दिया। अंगद दूसरे किसानों को भी केले की खेती करके चार गुना तक कमाई के लिए प्रेरित कर रहे हैं।
मोज्जमपुर करारी निवासी 42 वर्षीय अंगद कुशवाहा की गिनती न केवल कौशाम्बी बल्कि आसपास के जिलों तक प्रगतिशील किसानों में होती है। उन्हें यह पहचान व सम्मान केले की खेती से मिला है। इस वक्त भले ही वह 42 बीघे के काश्तकार हों, लेकिन एक समय ऐसा था जब खेत के नाम पर एक बिस्वा भी भूमि नहीं थी। 38 साल पहले अंगद का परिवार बेहद गरीबी से जूझ रहा था। पिता बच्चा लाल बटाई पर खेती करते थे। बहुत मुनाफा भी नहीं होता था।
उन्होंने खेती का तरीका बदला। पारंपरिक फसलों को छोड़ कर केले की खेती शुरू की। उनकी मेहनत रंग लाई और धीरे-धीरे तंगी दूर होने लगी। वर्ष 1995 तक बच्चा लाल 10 बीघे भूमि खरीद चुके थे। इसके बाद अंगद पिता के रास्ते पर चले और केले की खेती का दायरा बढ़ाते गए। मुनाफा हुआ तो जमीन भी खरीदी। अब तमाम सुख-सुविधाएं अंगद के घर-आंगन में हैं। अंगद और उनके पिता की प्रेरणा से जिले के सैकड़ों किसान भी केले की खेती से जुड़ रहे हैं।
70 बीघे में कर रहे केले की खेती, मिल रहा चार गुना मुनाफा
अंगद बताते हैं कि वह 70 बीघे में केले की खेती कर रहे हैं। 42 बीघे अपनी भूमि है, जबकि शेष दूसरे किसानों से ले रखी है। उनके मुताबिक, गेहूं, धान व अन्य पारंपरिक फसलों की अपेक्षा इसमें करीब चार गुना फायदा है। केले की फसल करीब 14 महीने की होती है। एक बीघे में लगभग दो लाख रुपये मिल जाते हैं। गेहूं और धान की फसलों से औसत रकम 50 से 60 हजार ही मिल पाती है।
खुद ही तैयार कर रहे पौध
अंगद पहले बाहर से पौध लाते थे। अब स्वयं तैयार करा रहे है। आज कौशाम्बी में केले की खेती हो रही है तो यह अंगद के पिता की ही देन है। अंगद का कहना है कि पहले भुसावल, गुजरात और महाराष्ट्र से पौधे लाते थे। अब साझे पर लखनऊ में फार्म बनाया है। उसी में केले की नर्सरी तैयार की जाती है। दूसरे किसानों को भी इससे फायदा मिल रहा है। यहां का केला यूपी के अलावा मध्य प्रदेश और दिल्ली तक जाता है।