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Kaushambi News: रेलवे ट्रैक पार करने को मजबूर 149 मासूम, निगरानी पर शिक्षकों की नाराजगी
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सैयद सरावां रेलवे लाइन को पार कर स्कूल जाते छात्र
मूरतगंज विकासखंड के सैयद सरांवा स्थित कंपोजिट विद्यालय में 146 बच्चों के स्कूल की राह रेलवे ट्रैक की बाधा आ रही है। सुरक्षित रास्ता नहीं होने के कारण रोजाना बड़ी संख्या में बच्चे दिल्ली-हावड़ा रेलमार्ग पार कर विद्यालय पहुंचते हैं। बच्चों की निगरानी के लिए शिक्षकों की ड्यूटी लगाए जाने की व्यवस्था से शिक्षकों में नाराजगी है।
सैयद सरांवा स्थित कंपोजिट विद्यालय में प्राथमिक और उच्च प्राथमिक दोनों कक्षाएं संचालित हैं। यहां कुल 20 शिक्षक तैनात हैं। उच्च प्राथमिक में सात सहायक अध्यापक और एक अनुदेशक, जबकि प्राथमिक में 13 शिक्षक हैं।
कुल 416 बच्चे पंजीकृत, रेलवे लाइन पार कर आने वाले 146
उच्च प्राथमिक में 231 और प्राथमिक में 185 यानी कुल 416 बच्चे पंजीकृत हैं। विद्यालय के आंकड़ों के अनुसार रेलवे ट्रैक पार कर स्कूल आने वाले प्रभावित बच्चों में उच्च प्राथमिक के 97 और प्राथमिक के 49 बच्चे हैं। कुल मिलाकर 146 वे विद्यार्थी हैं जो रेलवे ट्रैक पार कर स्कूल पहुंचते हैं।
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ये बच्चे तलरी, कूड़ापुर, निबिहा, मुस्कान चौराहा, गड़ेरिया तारा, अस्पताल के पास, बैंक के पास और दोख्खरा आदि स्थानों से आते हैं। सबसे अधिक 91 बच्चे मुस्कान चौराहा से, निबिहा से 17, तलरी से 12 और कूड़ापुर से 13 आते हैं। रोजाना करीब 150 बच्चे इन इलाकों से विद्यालय पहुंचते हैं।
300 मीटर दूर अंडरपास
विद्यालय से करीब 300 मीटर दूर छोटा अंडरपास है, लेकिन उसमें पानी भरे रहने के कारण बच्चों को करीब एक किलोमीटर दूर दूसरा अंडरपास से आना जाना पड़ता है। ऐसे में अब बच्चों की निगरानी के लिए शिक्षकों को ट्रैक के पास खड़ा करने की व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
शिक्षकों का कहना है कि दिल्ली-हावड़ा रेलमार्ग पर लगातार तेज गति से ट्रेनों का आवागमन होता है। ऐसी स्थिति में बच्चों को ट्रैक पार कराना खुद शिक्षकों के लिए भी जोखिम भरा है।
बीएस ने प्रयागराज मंडल के डीआरएम को लिखा पत्र
बीएसए डॉ. कमलेंद्र कुशवाहा की ओर से प्रयागराज मंडल के डीआरएम को 19 सितंबर को पत्र भेजकर रेलवे खंभा संख्या 846/5 और 846/6 के बीच पैदल अंडरपास बनाने की मांग की है।
शिक्षक संघ ने बीएसए को भेजा पत्र
शिक्षक संघ ने बीएसए को पत्र भेजकर बताया कि समस्या का समाधान शिक्षकों की ड्यूटी लगाकर नहीं, बल्कि सुरक्षित रास्ते की व्यवस्था कर किया जाना चाहिए। यदि ट्रैक पर निगरानी के दौरान कोई हादसा होता है तो इसका जिम्मेदार कौन होगा।
50 साल बाद भी नहीं मिला सुरक्षित रास्ता
ग्रामीणों और शिक्षकों के अनुसार विद्यालय करीब पांच दशक से संचालित है लेकिन आज तक बच्चों के लिए सुरक्षित पहुंच मार्ग का निर्माण नहीं कराया जा सका है। सवाल यह है कि जब 146 बच्चों को रोजाना रेलवे ट्रैक पार करना पड़ रहा है तो क्या उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल शिक्षकों के कंधों पर डालकर पूरी हो सकती है।
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सैयद सरांवा स्थित कंपोजिट विद्यालय में प्राथमिक और उच्च प्राथमिक दोनों कक्षाएं संचालित हैं। यहां कुल 20 शिक्षक तैनात हैं। उच्च प्राथमिक में सात सहायक अध्यापक और एक अनुदेशक, जबकि प्राथमिक में 13 शिक्षक हैं।
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कुल 416 बच्चे पंजीकृत, रेलवे लाइन पार कर आने वाले 146
उच्च प्राथमिक में 231 और प्राथमिक में 185 यानी कुल 416 बच्चे पंजीकृत हैं। विद्यालय के आंकड़ों के अनुसार रेलवे ट्रैक पार कर स्कूल आने वाले प्रभावित बच्चों में उच्च प्राथमिक के 97 और प्राथमिक के 49 बच्चे हैं। कुल मिलाकर 146 वे विद्यार्थी हैं जो रेलवे ट्रैक पार कर स्कूल पहुंचते हैं।
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ये बच्चे तलरी, कूड़ापुर, निबिहा, मुस्कान चौराहा, गड़ेरिया तारा, अस्पताल के पास, बैंक के पास और दोख्खरा आदि स्थानों से आते हैं। सबसे अधिक 91 बच्चे मुस्कान चौराहा से, निबिहा से 17, तलरी से 12 और कूड़ापुर से 13 आते हैं। रोजाना करीब 150 बच्चे इन इलाकों से विद्यालय पहुंचते हैं।
300 मीटर दूर अंडरपास
विद्यालय से करीब 300 मीटर दूर छोटा अंडरपास है, लेकिन उसमें पानी भरे रहने के कारण बच्चों को करीब एक किलोमीटर दूर दूसरा अंडरपास से आना जाना पड़ता है। ऐसे में अब बच्चों की निगरानी के लिए शिक्षकों को ट्रैक के पास खड़ा करने की व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
शिक्षकों का कहना है कि दिल्ली-हावड़ा रेलमार्ग पर लगातार तेज गति से ट्रेनों का आवागमन होता है। ऐसी स्थिति में बच्चों को ट्रैक पार कराना खुद शिक्षकों के लिए भी जोखिम भरा है।
बीएस ने प्रयागराज मंडल के डीआरएम को लिखा पत्र
बीएसए डॉ. कमलेंद्र कुशवाहा की ओर से प्रयागराज मंडल के डीआरएम को 19 सितंबर को पत्र भेजकर रेलवे खंभा संख्या 846/5 और 846/6 के बीच पैदल अंडरपास बनाने की मांग की है।
शिक्षक संघ ने बीएसए को भेजा पत्र
शिक्षक संघ ने बीएसए को पत्र भेजकर बताया कि समस्या का समाधान शिक्षकों की ड्यूटी लगाकर नहीं, बल्कि सुरक्षित रास्ते की व्यवस्था कर किया जाना चाहिए। यदि ट्रैक पर निगरानी के दौरान कोई हादसा होता है तो इसका जिम्मेदार कौन होगा।
50 साल बाद भी नहीं मिला सुरक्षित रास्ता
ग्रामीणों और शिक्षकों के अनुसार विद्यालय करीब पांच दशक से संचालित है लेकिन आज तक बच्चों के लिए सुरक्षित पहुंच मार्ग का निर्माण नहीं कराया जा सका है। सवाल यह है कि जब 146 बच्चों को रोजाना रेलवे ट्रैक पार करना पड़ रहा है तो क्या उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल शिक्षकों के कंधों पर डालकर पूरी हो सकती है।