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Kasganj News: शारदीय नवरात्र में जीवंत होती है नौती-नौता की प्राचीन लोक परंपरा
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फोटो 51- सलेमपुर पीरौंदा में लोक परंपरा के अनुसार आयोजित नौती नौता विवाह कार्यक्रम। संवाद
मोहनपुरा। ग्रामीण अंचलों में प्राचीन लोक परंपराएं आज भी आस्था और उत्साह के साथ निभाई जा रही हैं। शारदीय नवरात्र के साथ शुरू और महानवमी को समाप्त होने वाली नौती-नौता की परंपरा इसका उदाहरण है।
सोमवार रात कस्बा मोहनपुरा सहित सलेमपुर, पीरौंदा और आसपास के गांवों में नौती-नौता का प्रतीकात्मक विवाह आयोजित किया गया। विवाह की पारंपरिक रस्मों के साथ बरात निकाली गई।
लोगों ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान देकर इसमें सहभागिता की। नौती-नौता का आयोजन सामान्य विवाह की तरह किया जाता है। इसमें विवाह की रस्में निभाने के साथ बरात निकालने की परंपरा भी शामिल है।
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मान्यताओं के अनुसार, नौती-नौता के खेल को सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। यही वजह है कि नवरात्र के दौरान इस आयोजन को लेकर महिलाओं और कन्याओं में विशेष उत्साह रहता है।
मोहनपुरा निवासी गुड्डो देवी गोला ने बताया कि वह करीब 15 वर्षों से नौती-नौता की परंपरा निभा रही हैं। इस आयोजन में मोहल्ले की अन्य महिलाएं और कन्याएं भी उनका सहयोग करती हैं। सभी मिलकर पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार प्रतीकात्मक विवाह की तैयारियां करती हैं।
उन्होंने कहा कि आधुनिकता के दौर में भी नौती-नौता जैसी परंपराओं का प्रचलन ग्रामीण समाज के सांस्कृतिक जुड़ाव को दर्शाता है।
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सोमवार रात कस्बा मोहनपुरा सहित सलेमपुर, पीरौंदा और आसपास के गांवों में नौती-नौता का प्रतीकात्मक विवाह आयोजित किया गया। विवाह की पारंपरिक रस्मों के साथ बरात निकाली गई।
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लोगों ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान देकर इसमें सहभागिता की। नौती-नौता का आयोजन सामान्य विवाह की तरह किया जाता है। इसमें विवाह की रस्में निभाने के साथ बरात निकालने की परंपरा भी शामिल है।
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मान्यताओं के अनुसार, नौती-नौता के खेल को सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। यही वजह है कि नवरात्र के दौरान इस आयोजन को लेकर महिलाओं और कन्याओं में विशेष उत्साह रहता है।
मोहनपुरा निवासी गुड्डो देवी गोला ने बताया कि वह करीब 15 वर्षों से नौती-नौता की परंपरा निभा रही हैं। इस आयोजन में मोहल्ले की अन्य महिलाएं और कन्याएं भी उनका सहयोग करती हैं। सभी मिलकर पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार प्रतीकात्मक विवाह की तैयारियां करती हैं।
उन्होंने कहा कि आधुनिकता के दौर में भी नौती-नौता जैसी परंपराओं का प्रचलन ग्रामीण समाज के सांस्कृतिक जुड़ाव को दर्शाता है।