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कोरोना पर फतह के साथ मरीजों का दिल भी जीता
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बांदा के कोरोना योद्धा डॉ. करन राजपूत। (नाम यही सही है.. खबर में सही कर लें)
- फोटो : BANDA
बांदा। जिले कोरोना युद्ध में पहली जीत दिलाने वाले डॉक्टर करण के मन में कोरोना पॉजिटिव केस आने पर थोड़ी घबराहट तो थी लेकिन मरीज की मानसिक स्थिति का भी उनका पूरा ख्याल था। वह जानते थे कि छुआ छूत की बीमारी के डर से मरीज डिप्रेशन में जा सकता है। यह उसके लिए और खतरनाक है। इसलिए उन्होंने मरीजों को एक दोस्त की तरह ट्रीट किया। उन्हें भरोसा दिलाने के लिए वह मरीजों के कांधे पर हाथ भी रखते थे। हालांकि सुरक्षा किट व गलब्ज रहने थे।
दिन में दो बार देखने जाते थे हाल चाल लेने के साथ 15 से 20 मिनट तक बातें भी करते थे। उन्हें मायूस होने का मौका नहीं देते थे। इसी का नतीजा है कि एक अप्रैल और चार अप्रैल को यहां भर्ती किए गए दो कोरोना पॉजिटिव मरीजों की निगेटिव रिपोर्टें आनी शुरू हो गई हैं।
दो पॉजिटिव मरीजों में एक की दो निगेटिव व दूसरे की एक निगेटिव रिपोर्ट नौ अप्रैल तक आ चुकी है। दोनों खतरे से बाहर हो गए हैं। इस जीत ने बांदा की 17 लाख की आबादी को बड़ी खुशी दी है। लेकिन इस जीत के पीछे डॉ. करन राजपूत की 10 से 12 घंटे की रोजाना की मेहनत है। वह 22 मार्च से घर नहीं गए हैं। घर पर 13 साल की बेटी व सात साल का बेटा है, जो अब उनसे नाराज हैं। वह कहते हैं कि सब घर पर हैं लेकिन आप नहीं। इसका उनके पास कोई जवाब नहीं है।
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दिन में दो बार देखने जाते थे हाल चाल लेने के साथ 15 से 20 मिनट तक बातें भी करते थे। उन्हें मायूस होने का मौका नहीं देते थे। इसी का नतीजा है कि एक अप्रैल और चार अप्रैल को यहां भर्ती किए गए दो कोरोना पॉजिटिव मरीजों की निगेटिव रिपोर्टें आनी शुरू हो गई हैं।
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दो पॉजिटिव मरीजों में एक की दो निगेटिव व दूसरे की एक निगेटिव रिपोर्ट नौ अप्रैल तक आ चुकी है। दोनों खतरे से बाहर हो गए हैं। इस जीत ने बांदा की 17 लाख की आबादी को बड़ी खुशी दी है। लेकिन इस जीत के पीछे डॉ. करन राजपूत की 10 से 12 घंटे की रोजाना की मेहनत है। वह 22 मार्च से घर नहीं गए हैं। घर पर 13 साल की बेटी व सात साल का बेटा है, जो अब उनसे नाराज हैं। वह कहते हैं कि सब घर पर हैं लेकिन आप नहीं। इसका उनके पास कोई जवाब नहीं है।
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