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तस्कर एक और दो के सिक्के से ऐसे बना रहे लाखों, सिक्के से बन रही 'Daily Use' की कई चीजें
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
Updated Mon, 20 Nov 2017 09:41 AM IST
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पहले इंदौर और अब इटावा। दोनों शहरों में लाखों रुपये के सिक्कों की बरामदगी के मामले में ‘कानपुर कनेक्शन’ सामने आया है। इटावा में बरामद हुए सिक्कों को गलाने के लिए कानपुर से दिल्ली ले जाया जा रहा था। तीन माह पहले इंदौर में भी लाखों के सिक्के पकड़े गए थे जो कानपुर से भेजे गए थे। तब पकड़े गए सिक्कों को सूरत भेजा जा रहा था। तीन माह के भीतर सिक्कों की तस्करी के दो मामले सामने आने के बाद स्थानीय पुलिस, रिजर्व बैंक और आयकर विभाग के कान खड़े हो गए हैं। बाजार के सूत्र बताते हैं कि सिक्के गलाकर ब्लेड, वॉशर, पुर्जे और नकली ज्वैलरी बनाने के लिए इसकी तस्करी फिर शुरू हो गई है।
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एक और दो रुपये के सिक्के का इस्तेमाल अभी भी ब्लेड बनाने के लिए होता है
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सिक्कों का कारोबार करने वाले बताते हैं कि एक और दो रुपये के सिक्के का इस्तेमाल अभी भी ब्लेड बनाने के लिए होता है। एक रुपये के सिक्के में दो से तीन ब्लेड बन जाते हैं। ब्लेड की कीमत दो से पांच रुपये तक होती है। इसके अलावा एक और दो के सिक्कों से विभिन्न उपकरणों, मशीनों में लगने वाले वॉशर बनाए जाते हैं। इस तरह से यह सिक्कों के मुकाबले अधिक मूल्य देता है। इसी तरह पांच और 10 के सिक्के छोटे पुर्जे और नकली (आर्टिफिशियल) ज्वैलरी बनाने के काम आते हैं। राजस्थान, दिल्ली और पश्चिम बंगाल इस काम के गढ़ माने जाते हैं। काफी समय पहले कानपुर इन राज्यों में सिक्के सप्लाई करने का केंद्र रहा है।
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इंदौर में पकड़े गए थे कानपुर के दो व्यापारी
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इंदौर पुलिस ने 22 अगस्त 2017 को हंस ट्रैवल्स की बस से एक, दो, पांच और 10 के सिक्के से भरी बोरियां बरामद की थीं। इस मामले में कानपुर के दो व्यापारियों लाल सिंह और विजय प्रताप सिंह और विजय मिश्रा के अलावा ट्रैवल एजेंसी संचालक के खिलाफ केस दर्ज किया गया। तीनों ने बताया कि उन्होंने सिक्कों को सूरत भेजने के लिए लोड कराया था। इंदौर पुलिस ने इन सिक्कों से नकली ज्वैलरी बनाने के खेल का खुलासा किया था।
2012 में फजलगंज पुलिस ने पकड़ा था तस्कर
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शहर की फजलगंज पुलिस ने अप्रैल 2012 में 1.83 लाख के सिक्कों के साथ एक तस्कर को गिरफ्तार कर इस धंधे का खुलासा किया था। युवक ने अपना नाम लाल बंगला हरजिंदर नगर निवासी विनय सिंह बताया। यही आरोपी 2010 में भी दिल्ली के रोहिणी थाना क्षेत्र में सिक्के गलाने के आरोप में पकड़ा गया था। तस्कर ने इस गोरखधंधे में जुडे़ कई लोगों के नाम भी बताए थे। बोरों में 1.83 लाख कीमत के एक, दो और पांच रुपये के सिक्के निकले थे। उस समय तस्कर ने बताया था कि वह हर हफ्ते सिक्के लेकर जयपुर जाता है। वहां सिक्कों को गलाकर ईंट बनाई जाती है। बाद में ईंटों का उपयोग नकली ज्वैलरी बनाने में किया जाता है। उसे सौ रुपये के सिक्कों पर दस रुपये कमीशन मिलता है।
पहले से होती आई है तस्करी
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कोलकाता एक समय सिक्के गलाने का देश में सबसे बड़ा केंद्र था। यहां से सिक्कों की खेप बांग्लादेश भी जाती थी। पहले के बने सिक्कों में गिलट धातु होती थी। तब उन सिक्कों को गलाकर धातु निकाल लिया जाता था। यह तरीका सिक्के से ज्यादा कीमत दे जाता था। इस वजह से मार्केट में सिक्कों की कमी हो जाती थी। इसका तोड़ निकालने के लिए रिजर्व बैंक ने स्टील के सिक्के ढालने शुरू किए और धातु की मात्रा मूल्य से कम रखी। इस कदम से सिक्कों की तस्करी कुछ समय के लिए रुकी लेकिन बाद में छोटे सिक्कों का इस्तेमाल ब्लेड बनाने के लिए होने लगा। इस काम में लगे लोग सिक्कों का अवैध भंडारन करने लगे। बताया जा रहा है कि नोटबंदी के दौरान मुद्रा की कमी हुई तो अवैध भंडार किए हुए सिक्के बाजार में लौट आए। इससे बाजार में सिक्कों की अधिकता हो गई और उसका अवमूल्यन शुरू हो गया। व्यापारी और ग्राहक लेनदेन से बचने लगे। नतीजा ये हुआ कि सिक्कों की कीमत पाने के लिए इसकी तस्करी फिर शुरू हो गई है।