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किसान मेला का पहला दिन फ्लॉप
अमर उजाला ब्यूरो/कानपुर
Updated Wed, 24 Feb 2016 12:50 AM IST
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एग्रो क्लाइमेटिक जोन (कानपुर और लखनऊ) का तीन दिवसीय किसान मेला पहले ही दिन फ्लॉप रहा। कानपुर नगर और देहात, कन्नौज, हरदोई, इटावा, औरैया और फर्रुखाबाद समेत 11 जिलों से किसान गाड़ियों से ढोकर लाए गए।
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उद्घाटन के वक्त कुर्सियां फिर भी नहीं भर पाईं। किसानों को उन्नत प्रजाति के बीज व खाद नहीं मिल पाई। इस पर भड़के किसानों ने भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान (आईआईपीआर) के स्टाल पर हंगामा किया। वहीं, कन्नौज के किसान दिनेश चंद्र द्विवेदी ने दो टूक कहा कि किसान मेले के नाम पर महज खानापूर्ति की जा रही है।
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उन्नत प्रजाति के बीजों के स्टालों तक नहीं लगाए गए। कृषि विभाग ने सूचना तंत्र के सुदृढ़ीकरण एवं कृषक जागरूकता योजना के तहत चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के स्टेडियम ग्राउंड में किसान मेले का आयोजन किया। इसका का उद्घाटन संयुक्त विकास आयुक्त नरेंद्र सिंह ने मंगलवार को किया।
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इस मौके पर किसानों को उन्नत बीज और तकनीक की मदद से खेती करने की सलाह जरूर दी गई। मेले में तमाम स्टाल प्राइवेट कंपनियों के लगे थे। इन स्टालों में बीज काफी महंगे थे। दोपहर बाद (ढाई बजे के आसपास) ज्यादातर स्टालों पर सन्नाटा पसरा था। मेले में किसानों की अपेक्षा महिला और बच्चों की संख्या ज्यादा थी।
इससे पहले उप निदेशक कृषि वीके सिंह, उप निदेशक रक्षा विजय कुमार सिंह, प्रगतिशील किसान बाबू सिंह, उप परियोजना निदेशक एसए पांडेय और एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के डॉ. महक सिंह ने किसानों को कृषि और फसल बीमा कराने के लिए जागरूक किया। बताया गया कि मेले के आयोजन पर करीब 18 लाख रुपये का बजट खर्च होना है।
फरवरी में बोएं मक्का
कृषि विज्ञान केंद्र के विज्ञानी डॉ. अरविंद कुमार सिंह ने बताया कि मक्का की बुआई 29 फरवरी तक हो जानी चाहिए। इसके बाद बुआई का कोई खास मतलब नहीं रहता। कहा कि अब खेती का तरीका बदल रहा है।
स्वायल कल्टीवेशन (मिट्टी की फसल) के साथ ही पानी में खेती की जा रही है। इस दिशा में तेजी से काम चल रहा है। भविष्य में हवा के जरिए खेती की तकनीक सामने आएगी। इस पर अमेरिका, जर्मनी और जापान में पहले से काम चल रहा है।
मिट्टी की सेहत कमजोर
सिर्फ धान और गेहूं की खेती करने और फसल चक्र न अपनाने से मिट्टी की सेहत कमजोर (उर्वरा शक्ति कम) हो गई है। इससे पैदावार पर भी असर पड़ रहा है। अब जैविक खेती की तरफ जाना होगा, तभी सकारात्मक नतीजे सामने आएंगे। फसल चक्र भी अपनाना पड़ेगा। इससे मक्के या अरहर की खेती के साथ-साथ दूसरी फसलों की खेती भी की जा सकती है।
तकनीक का स्टडी मैटेरियल बेचा
किसान मेला में आईआईपीआर का भी स्टाल लगा। वहां दलहन से संबंधित प्रजातियों का डिस्प्ले जरूर किया गया लेकिन इसकी तकनीक, बीज और खेती से संबंधित स्टडी मैटेरियल को बेचा गया। यह मैटेरियल किसानों को नि:शुल्क उपलब्ध कराए जाने का प्रावधान है। इस स्टाल से उन्नत प्रजाति के बीज उपलब्ध नहीं थे।