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Kanpur News: कांशीराम ट्रॉमा सेंटर की क्षमता होगी डेढ़ गुनी

Tue, 03 Feb 2026 02:05 AM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Tue, 03 Feb 2026 02:05 AM IST
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The capacity of Kanshi Ram Trauma Center will be increased by one and a half times.
कानपुर। केंद्रीय बजट में जिला अस्पताल की इमरजेंसी ट्रॉमा केयर की क्षमता 50 फीसदी बढ़ाए जाने के मद्देनजर कांशीराम संयुक्त चिकित्सालय के ट्रॉमा सेंटर की क्षमता डेढ़ गुनी हो जाएगी। इसके साथ ही सेंटर में आईसीयू के बेड भी बढ़ने की उम्मीद है। इससे हादसों के घायलों के इलाज में आसानी होगी। संसाधन उपलब्ध होने की वजह से घायलों को हैलट या दूसरे हायर सेंटर रेफर करने की नौबत नहीं आएगी। उर्सला में इमरजेंसी ट्रॉमा केयर नहीं है।
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मान्यवर कांशीराम संयुक्त चिकित्सालय एवं ट्रॉमा सेंटर में घायलों के इलाज की सुविधा है। रामादेवी में हाई-वे के नजदीक होने की वजह से घायलों को पहले इसी ट्रॉमा सेंटर में लाया जाता है। अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डॉ. नवीन चंद्रा ने बताया कि ट्रॉमा सेंटर में इस संबंध में 32 बेड संचालित हैं। इसके अलावा 50 बेड का आईसीयू तैयार किया जा रहा है। 50 फीसदी क्षमता बढ़ती है तो सामान्य बेड की संख्या 48 हो जाएगी। आईसीयू के बेड बढ़े तो इनकी संख्या 75 हो जाएगी। 50 फीसदी क्षमता बढ़ने पर कुल 123 बेड हो जाएंगे। इससे रोगियों को बहुत राहत मिलेगी। कांशीराम ट्रॉमा सेंटर की क्षमता बढ़ने से हाईवे के घायलों को गोल्डन आवर में इलाज मिल जाएगा। इससे बहुत से घायलों की जान बच जाएगी। डॉ. चंद्रा बताया कि अस्पताल में बच्चों के इंटेंसिव केयर की भी व्यवस्था हो रही है। इसके साथ ही अन्य सुविधाओं को भी बढ़ाया जा रहा है। कई प्रस्ताव तैयार किए जा रहे हैं, उन्हें शासन को भेजा जाएगा।
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हैलट अस्पताल में ट्रॉमा के औसत 130-40 घायल प्रतिदिन आते हैं। यहां पहुंचने पर औसत तीन घायलों की ब्रेन डेथ हो चुकी होती है। सिर में चोट के औसत पांच घायलों की प्रतिदिन ब्रेन सर्जरी होती है। हैलट इमरजेंसी के ट्रॉमा सेंटर में जो घायल आते हैं उनमें अधिकतर रेफर होकर आते हैं। हाईवे पर जहां हादसा होता है वहां की सीएचसी और जिला अस्पताल से घायलों को हैलट रेफर कर दिया जाता है। जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के न्यूरो सर्जरी के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष डॉ. मनीष सिंह का कहना है कि सीवियर इंजरी के पांच घायलों की औसत ब्रेन सर्जरी होती है। बहुत से घायलों की अस्पताल तक आते-आते अधिक गंभीर हालत हो जाती है। अधिक ब्लीडिंग से मौत हो जाती है। घायल गोल्डन आवर पहुंच नहीं पाते। उनका कहना है कि जिला अस्पताल की इमरजेंसी में संसाधन युक्त ट्रॉमा केयर होने पर रोगी को तुरंत इलाज मिल जाएगा।
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