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40 हजार की नौकरी छोड़कर मनरेगा में मजदूरी कर रहा सुपरवाइजर, पढ़िए अजय की कहानी
Thu, 04 Jun 2020 03:40 PM IST
शिखा पांडेय
प्रदीप अवस्थी, अमर उजाला, कानपुर
प्रदीप अवस्थी, अमर उजाला, कानपुर
Published by: शिखा पांडेय
Updated Thu, 04 Jun 2020 03:40 PM IST
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अजय
- फोटो : अमर उजाला
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कोरोना संकट की वजह से दूसरे प्रांतों से जैसे तैसे लौटे लोगों ने अब अच्छीखासी नौकरी का मोह त्याग दिया है। वे घर या घर के नजदीक रहकर ही अपनी जिंदगी आगे बढ़ाना चाह रहे हैं। कानपुर-सागर हाईवे किनारे स्थित बिठूर विधानसभा के बिधनू के मगरासा गांव के रहने वाले अजय की कहानी इनमें से एक है।
अजय नेशनल हाइवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) में काम करने वाली एक कंपनी में सुपरवाइजर थे। 40 हजार तक महीना कमा लेते थे। अब मनरेगा (202 रुपये प्रतिदिन) में मजदूरी कर जीवन बसर कर रहे हैं।
अजय राजस्थान के मेहंदीपुर में पिछले कई सालों से कंपनी के साथ काम कर रहे थे। वे हाइवे निर्माण कार्य में दक्ष हैं और सैकड़ों मजदूर उनके अधीन काम करते थे। लॉकडाउन में परेशानियां बढ़ीं तो जैसे तैसे गांव लौट आए।
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15 दिन पहले ही उन्होंने गांव में मजदूरी करनी शुरू कर दी। कभी मनरेगा में तो कभी मनरेगा के अलावा। अजय बताते हैं कि सरकारी निर्माण कार्यों को शुरू करने की मंजूरी मिली है तो कंपनी ने उन्हें वापस बुलाना चाहा। उनके लिए ट्रेन का कन्फर्म टिकट भी भेजा।
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अजय नेशनल हाइवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एनएचएआई) में काम करने वाली एक कंपनी में सुपरवाइजर थे। 40 हजार तक महीना कमा लेते थे। अब मनरेगा (202 रुपये प्रतिदिन) में मजदूरी कर जीवन बसर कर रहे हैं।
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अजय राजस्थान के मेहंदीपुर में पिछले कई सालों से कंपनी के साथ काम कर रहे थे। वे हाइवे निर्माण कार्य में दक्ष हैं और सैकड़ों मजदूर उनके अधीन काम करते थे। लॉकडाउन में परेशानियां बढ़ीं तो जैसे तैसे गांव लौट आए।
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15 दिन पहले ही उन्होंने गांव में मजदूरी करनी शुरू कर दी। कभी मनरेगा में तो कभी मनरेगा के अलावा। अजय बताते हैं कि सरकारी निर्माण कार्यों को शुरू करने की मंजूरी मिली है तो कंपनी ने उन्हें वापस बुलाना चाहा। उनके लिए ट्रेन का कन्फर्म टिकट भी भेजा।
तीन जून को उनकी रवानगी थी। वापसी की तैयारी कर रहे थे। पत्नी सीमा, बच्चे और मां महादेई उन्हें वापस न जाने के लिए मना रहे थे। सुबह से घर में इसी बात को लेकर चिककिच मची थी। रेलवे स्टेशन जाने से आधा घंटे पहले ही उन्होंने मूड बदल दिया कि अब नहीं जाएंगे।
अजय के इस फैसले से घर में खुशी का माहौल है। पत्नी सीमा इस बात से खुश हैं कि कमाई भले ही कम हो जाएगी लेकिन बच्चे पिता की छांव में रहेंगे। अजय के यहां न रहने से वे अभी तक कच्चे घर में ही गुजर बसर कर हैं, जबकि उनके दूसरे भाई ने गांव में रहते हुए भी पक्का मकान बनवा लिया।
वे कहते हैं कि बात प्रतिस्पर्धा की नहीं है बल्कि यह देखने की है कि बाहर रहकर वे ज्यादा कमाई के बावजूद बचत कितनी कर पाते हैं। कोरोना संक्रमण ने उन्हें घर पर रहने का मौका दिया है। वे अपने कौशल का इस्तेमाल कर यहीं पर काम ढूंढने का प्रयास करेंगे। तब तक मजदूरी करने से भी पीछे नहीं हटेंगे।
अजय के इस फैसले से घर में खुशी का माहौल है। पत्नी सीमा इस बात से खुश हैं कि कमाई भले ही कम हो जाएगी लेकिन बच्चे पिता की छांव में रहेंगे। अजय के यहां न रहने से वे अभी तक कच्चे घर में ही गुजर बसर कर हैं, जबकि उनके दूसरे भाई ने गांव में रहते हुए भी पक्का मकान बनवा लिया।
वे कहते हैं कि बात प्रतिस्पर्धा की नहीं है बल्कि यह देखने की है कि बाहर रहकर वे ज्यादा कमाई के बावजूद बचत कितनी कर पाते हैं। कोरोना संक्रमण ने उन्हें घर पर रहने का मौका दिया है। वे अपने कौशल का इस्तेमाल कर यहीं पर काम ढूंढने का प्रयास करेंगे। तब तक मजदूरी करने से भी पीछे नहीं हटेंगे।