धर्मनगरी चित्रकूट में लगा नागवंशियों का मेला, यहां गधों की बिक्री का इतिहास कर देगा हैरान
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राजकुमार राम को मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम बनाने वाली भूमि.. चित्रकूट। लेकिन चित्रकूट का परिचय कुल इतना नहीं है। चित्रकूट तो देश की उस विविध संस्कृति का उन्नायक और पोषक है जो न केवल सर्व धर्म समभाव को दर्शाती है बल्कि वैदिक धर्म की तीन धाराओं शैव, शाक्त और वैष्णव परम्परा की युगों से ध्वज वाहक है, तभी तो यहां सीता-राम के स्वरों के साथ जय गोपालजी व ओम नमः शिवाय और जय माता के उद्घोष आम हैं। विश्व में यही एक पावन धाम है जहां पर सभी देवी या देवताओं को इस तरह का आदर मिलता है।
कृष्ण भक्ति की वास्तविकता
दीपावली के पर्व के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा के साथ बुन्देलखण्ड के गांव-गांव से युवा यहां आते हैं। पवित्र मन्दाकिनी में स्नान कर मंदिरों में जाकर मौन-व्रत लेकर गायों को चराने का संकल्प लेते हैं। वैसे तो यह आराधना अहीर (यादव) जाति की मानी जाती है, पर सभी जातियों द्वारा पशु पालन करने के कारण यह आराधना अब आम है। इसके बारे में एक कथा देश-विदेश में दिवारी का नाम कर रहे रमेश पाल बताते हैं, एक बार श्री कृष्ण व ग्वालों की गायें चरते-चरते दूर चली गई, गायों के न मिलने पर सभी उदास हो गए। तब श्री कृष्ण सहित सभी ने यह उपासना की और गाये मिल गयी।
क्या है मौनिया व्रत
गो पालन करने वालो को ग्वाला कहते हैं। मौनिया व्रत की परंपरा कृष्ण से जुड़ी है। इसमें गाय को मौन होकर केवल मोरपंख की सहायता से चराया जाता है। एक समय भोजन करने के साथ नंगे पैर रहा जाता है। केवल गोसेवा की जाती है, अतिरिक्त कोई कार्य नहीं।
कापालिकों की साधना
चित्रकूट के परिक्षेत्र में महाराज अत्रि और मां अनुसुइया के पहले पुत्र दत्रात्रेय भगवान शंकरजी के ही प्रतिरूप थे। शैव सम्प्रदाय में इन्हें प्रथम आचार्य माना जाता है। स्वामी मछन्दरनाथ से लेकर योगी गोरखनाथ आदि इसी परंपरा के संत हैं। दिवाली की महानिशा में अनुसुइया आश्रम से लेकर स्फटिक शिला के महाश्मशान तक हजारों कपालिक साधनाएं करते दिखाई देते हैं।
चित्रकूट में शक्ति की आराधना क्यो
पौराणिक कथा है कि राजा दक्ष की पुत्री सती का हवन कुंड से लेकर मृत शरीर लेकर जब महादेव पूरे ब्रम्हांड पर भ्रमण कर रहे थे, तो श्रीहरि विष्णु ने उन्हें काटने के लिए सुदर्शन चक्र को भेजा। चक्र से काटे गए अंग जहां गिरे तुरन्त पाषाण में परिवर्तित हो गए। ये 51 शक्तिपीठ बने। भारत मे 34, नेपाल, पाकिस्तान, बंग्लादेश में अन्य है। चित्रकूट में उनका दायां वक्ष (स्तन) गिरा था। आज भी यह परिक्रमा मार्ग पर चक्र तीर्थ पर सुदर्शन चक्र के साथ विद्यमान है। शक्ति आराधना के इस स्थल पर माँ मोक्षदा की आराधना होती है। वैसे माँ सीता जी ने यहाँ पर माँ दुर्गा व श्री राम ने वनदेवी की आराधना की थी।
गधा मेला का भी है आकर्षण
देश भर से आए नागवंशीय
चित्रकूट के जंगलों में औषधियों की भरमार है, सदियों से दीपावली की रात में यहां पर नागवंशीय जड़ियों को अभिमंत्रित कर उनका उपयोग करने के लिए आते रहे हैं। दो दिन पूर्व से चित्रकूट में आकर ये लोग डेरा डाल चुके हैं।