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चंद्रशेखर आजाद की मौत के बाद मां ने देखे ऐसे दिन, सोचते ही भर आएगा मन

Mon, 24 Jul 2017 09:25 AM IST
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर Updated Mon, 24 Jul 2017 09:25 AM IST
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shaheed chandrasekhar azad mother saw painfull days of life after son death
शहीद चंद्र शेखर आजाद (फाइल फोटो)

23 जुलाई का दिन है। इसलिए हम बात करेंगे एक ऐसे शख़्स की जो पैदा चंद्रशेखर तिवारी के नाम से हुआ। इस शख्स को समस्त भारतवासी जानते हैं। आप सोच रहे होंगे कि इस नाम के शख्स को तो हम जानते ही नहीं..? 

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अरे आप भी इन्हें बखूबी जानते हैं लेकिन चंद्रशेखर तिवारी के नाम से नहीं बल्कि शहीद चंद्रशेखर आजाद के नाम से। चंद्रशेखर आजाद का नाम असल में चंद्रशेखर तिवारी ही था लेकिन बाद में इन्होंने खुद को आजाद घोषित कर दिया था और कभी अंग्रेजों के हाथो ना मरने की कसम खाई थी। पंडित सीताराम तिवारी उत्तर प्रदेश के उन्नाव ज़िले के बदर गांव के रहने वाले थे। लेकिन भीषण अकाल के चलते वे मध्यप्रदेश के ग्राम भाबरा में जा बसे थे। जी हां 23 जुलाई 1906 को मध्यप्रदेश के भाबरा गांव में ही सीताराम तिवारी और जगरानी देवी के घर एक बच्चा पैदा हुआ था। नाम रखा गया चंद्रशेखर तिवारी। 
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इन्ही का जन्म दिवस आज पूरा भारत चंद्रशेखर आजाद के जन्मदिवस के नाम से मना रहा है। जैसा कि इन्होंने कभी भी अग्रेंजों के हाथों ना मरने की कसम खाई थी वैसा ही इन्होंने किया भी। 27 फरवरी, 1931 को जब इलाहाबाद के एलफ्रेड पार्क में इन्हें अग्रेजों ने घेर लिया था तो काफी देर तक ये अकेले उनका मुकाबला करते रहे लेकिन जब अंत में उनके पास केवल एक गोली बची थी तो उन्होंने खुद को गोली मार ली थी।

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आजाद के शहीद होने के बाद मां ने कैसे काटी जिदंगी ​

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डेमो

क्या आप जानते हैं आजाद के शहीद होने के खबर उनकी मां को कई महीने बाद मिली थी। वो पहले ही ऐसी दुख की घड़ी से गुजर रही थी उस पर से जब उन्हें यह पता चला कि उनका बेटा नहीं रहा तो वह पूरी तरह टूट गई। आपको बताने जा रहा है कि चंद्रशेखर आजाद के शहीद होने के बाद उनकी मां ने कैसे जिदंगी काटी।

बतातें हैं कि चंद्रशेखर ने अपनी फरारी के करीब 5 साल बुंदेलखंड में गुजारे थे। इस दौरान वे ओरछा और झांसी में रहे। ओरछा में सातार नदी के किनारे गुफा के समीप कुटिया बना कर वे डेढ़ साल रहे थे।

आजाद की मां का हाल देख दोस्त की भर आई थी आंखें...

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झांसी स्थित श्मसान घाट
फरारी के समय सदाशिव उनके सबसे विश्वसनीय लोगों में से एक थे। आजाद इन्हें अपने साथ मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के भाबरा गांव ले गए थे और अपने पिता सीताराम तिवारी और माता जगरानी देवी से मुलाकात करवाई थी।

सदाशिव आजाद के शहीद होने के बाद भी ब्रिटिश शासन के ख‍िलाफ संघर्ष करते रहे और कई बार जेल गए। देश को अंग्रेजों से आजादी मिलने के बाद वह चंद्रशेखर के माता-पिता का हालचाल पूछने उनके गांव पहुंचे। वहां उन्हें पता चला कि चंद्रशेखर की शहादत के कुछ साल बाद उनके पिता का भी देहांत हो गया था।

आजाद के भाई की मृत्यु भी उनसे पहले ही हो चुकी थी। पिता के देहांत के बाद चंद्रशेखर की मां बेहद गरीबी में जीवन जी रहीं थी। गरीबी के बावजूद उन्होंने कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया।

वो जंगल से लकड़ियां काटकर लाती थीं और उनको बेचकर ज्वार-बाजरा खरीदती थी। भूख लगने पर ज्वार-बाजरा का घोल बनाकर पीती थीं। उनकी यह स्थिति देश को आजादी मिलने के 2 साल बाद (1949) तक जारी रही।

जब झांसी में हुआ आजाद की मां का निधन

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शहीद भगत सिंह की मां के देहांत के बाद झांसी में बनवाया गया स्मारक
आजाद की मां का ये हाल देख सदाश‍िव उन्हें अपने साथ झांसी लेकर आ गए। मार्च 1951 में उनका निधन हो गया। सदाशिव ने खुद झांसी के बड़ागांव गेट के पास शमशान घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया था। घाट पर आज भी आजाद की मां जगरानी देवी की स्मारक बनी है।
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