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सामाजिक रूढ़ियों को किया दरकिनार: सात बेटियों ने मां की अर्थी को दिया कंधा, छोटी बेटी ने दी मुखाग्नि
Sat, 05 Sep 2026 10:34 PM IST
Shikha Pandey
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, औरैया
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, औरैया
Published by: Shikha Pandey
Updated Sat, 05 Sep 2026 10:34 PM IST
सार
मां ने पति के निधन के बाद बेटियों की परवरिश बेटों की तरह की थी। पुत्रियों के इस फैसले ने बेटा-बेटी में भेदभाव न होने का संदेश दिया।
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कृष्णा देवी की फाइल फोटो व मुखाग्नि देती बेटी
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
एक मां ने अपनी सात बेटियों को बेटों की तरह पाला। बेटियों ने भी मां के निधन पर अपना फर्ज निभाया। सभी बेटियों ने बारी-बारी से मां की अर्थी को कंधा दिया। सबसे छोटी बेटी सोनी सविता ने बेटे का फर्ज निभाते हुए चिता को मुखाग्नि दी। इस दृश्य को देखकर मुक्तिधाम में मौजूद सभी की आंखें नम हो गईं। यह घटना बेटा और बेटी में अंतर न करने का सशक्त संदेश देती है। यह मामला दिबियापुर के मोहल्ला दुर्गा नगर का है। मोहल्ला निवासी कृष्णा देवी (59) के पति रामकिशोर सविता फौज में थे।
रिटायरमेंट के कुछ साल बाद उनका निधन हो गया था। उस समय कोई पुत्र न होने के कारण सामाजिक रीति-रिवाजों के चलते भतीजे से मुखाग्नि दिलाई गई थी। पति की मौत के बाद कृष्णा देवी ने सिलाई-बुनाई और छोटी-मोटी मजदूरी कर अकेले ही बेटियों की परवरिश की। उन्होंने अपनी सभी बेटियों की शादी भी की थी।
बेटियों का समर्पण
कृष्णा देवी पिछले कई महीनों से बीमार चल रही थीं। सभी बेटियां मिलकर उनका इलाज और घर का खर्च चला रही थीं। सबसे छोटी पुत्री सोनी सविता (25) ससुराल आगरा से मायके आकर मां की सेवा में लगी थी। उनके पति आगरा में निजी नौकरी करते हैं। शनिवार सुबह कृष्णा देवी ने अंतिम सांस ली तो घर में मातम छा गया।
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सामाजिक रूढ़ियों को दरकिनार
अंतिम संस्कार की तैयारी के दौरान गांव के कुछ लोगों ने मुखाग्नि के लिए पुरुष रिश्तेदार को बुलाने को कहा। तब सोनी ने सबको टोकते हुए कहा कि मां ने हमें कभी बेटी नहीं समझा। उन्होंने हमें हमेशा अपने बेटे कहा और हमने भी उन्हें बेटे की कमी महसूस नहीं होने दी। बड़ी बहनों बेबी, रानी, गुड्डी, पिंकी, रेखा और ममता ने भी सोनी के फैसले का समर्थन किया। दोपहर बाद करीब तीन बजे दिबियापुर के मुक्तिधाम में सोनी ने मां की चिता को मुखाग्नि दी।
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रिटायरमेंट के कुछ साल बाद उनका निधन हो गया था। उस समय कोई पुत्र न होने के कारण सामाजिक रीति-रिवाजों के चलते भतीजे से मुखाग्नि दिलाई गई थी। पति की मौत के बाद कृष्णा देवी ने सिलाई-बुनाई और छोटी-मोटी मजदूरी कर अकेले ही बेटियों की परवरिश की। उन्होंने अपनी सभी बेटियों की शादी भी की थी।
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बेटियों का समर्पण
कृष्णा देवी पिछले कई महीनों से बीमार चल रही थीं। सभी बेटियां मिलकर उनका इलाज और घर का खर्च चला रही थीं। सबसे छोटी पुत्री सोनी सविता (25) ससुराल आगरा से मायके आकर मां की सेवा में लगी थी। उनके पति आगरा में निजी नौकरी करते हैं। शनिवार सुबह कृष्णा देवी ने अंतिम सांस ली तो घर में मातम छा गया।
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सामाजिक रूढ़ियों को दरकिनार
अंतिम संस्कार की तैयारी के दौरान गांव के कुछ लोगों ने मुखाग्नि के लिए पुरुष रिश्तेदार को बुलाने को कहा। तब सोनी ने सबको टोकते हुए कहा कि मां ने हमें कभी बेटी नहीं समझा। उन्होंने हमें हमेशा अपने बेटे कहा और हमने भी उन्हें बेटे की कमी महसूस नहीं होने दी। बड़ी बहनों बेबी, रानी, गुड्डी, पिंकी, रेखा और ममता ने भी सोनी के फैसले का समर्थन किया। दोपहर बाद करीब तीन बजे दिबियापुर के मुक्तिधाम में सोनी ने मां की चिता को मुखाग्नि दी।