एक बाल ब्रह्मचारी महंत जिसने अपना पूरा जीवन भगवान की सेवा में लगा दिया। अंत समय आने से पहले ही उसने आत्महत्या कर ली। महंत ने आत्महत्या क्यों की, हमेशा निर्विवाद रहे इस संत की सुसाइड से मौत सबसे बड़ी पहेली बनी हुई है। घटना की चर्चा पूरे शहर में जोरों-शोरों पर है। मामला यूपी के इटावा जिले का है।
जानें, इस बाल ब्रह्मचारी महंत की आत्महत्या कैसे बनी पहेली
सैकड़ों साल पुराने मंदिर के पुजारे थे महंत अभिमन्यु
इटावा चकरनगर के ग्राम भरेह में यमुना, चंबल के संगम तट पर स्थित भारेश्वर मंदिर के महंत की आत्महत्या की घटना किसी के गले नहीं उतर रही है। सैकड़ों वर्ष पुराने इस मंदिर में महंत अभिमन्यु गिरि पहले पुजारी रहे, उसके बाद करीब 20 साल तक महंत रहे। इस मंदिर पर न तो कोई संपत्ति का विवाद कभी रहा और न ही महंत पद को लेकर कभी कोई सवाल उठाए गए। फिर अचानक महंत के आत्महत्या करने की घटना चर्चा का विषय बन गई है।
जानें, इस बाल ब्रह्मचारी महंत की आत्महत्या कैसे बनी पहेली
राजा रूप सिंह के पूर्वजों ने बनवाया था मंदिर
ग्राम भरेह में ऐतिहासिक भारेश्वर मंदिर का निर्माण यहां के राजा रहे राजा रूप सिंह जूदेव के पूर्वजों ने कराया था। इस मंदिर पर किसी प्रकार की संपत्ति या जमीन नहीं है। यह राजपरिवार का मंदिर रहा था। देश आजाद होने के बाद इस मंदिर पर सार्वजनिक रूप से लोग पूजा अर्चना करने जाने लगे। वर्तमान में राज परिवार के उत्तराधिकारी हेमरुद्र प्रताप सिंह इस मंदिर के व्यवस्थापक हैं। उनके ही प्रबंधन में इस मंदिर की व्यवस्थाएं संचालित होती हैं।
जानें, इस बाल ब्रह्मचारी महंत की आत्महत्या कैसे बनी पहेली
60 वर्षीय अभिमन्यु बाल ब्रहमचारी थेहेमरुद्र प्रताप सिंह ने बताया कि ग्राम पथर्रा के निवासी 60 वर्षीय अभिमन्यु बाल ब्रहमचारी थे। करीब 20 साल से वे इस मंदिर के महंत थे। उनका कार्यकाल पूरी तरह से निर्विवाद रहा। उन्होंने बताया कि आत्महत्या के बाद पुलिस को मौके पर किसी प्रकार का कोई सुसाइड नोट नहीं मिला। उन्होंने बताया कि पिछले एक साल से महंत डिप्रेशन के शिकार थे।
जानें, इस बाल ब्रह्मचारी महंत की आत्महत्या कैसे बनी पहेली
खेतीबाड़ी से महंत को कभी कोई मतलब नहीं रहा
अभिमन्यु गिरि ग्राम पथर्रा निवासी बुद्ध सिंह सेंगर के पुत्र थे। उनके दो भाई अनिरुद्ध सिंह एवं पप्पू सिंह गांव में ही रहकर खेतीबाड़ी करते हैं। बुद्ध सिंह के हिस्से में करीब 60 बीघा जमीन थी। उनके तीनों पुत्रों के हिस्से में 20-20 बीघा जमीन आती है। खेतीबाड़ी से महंत को कभी कोई मतलब नहीं रहा। परिवार के लोग ही खेतीबाड़ी करते रहे। निधन के बाद महंत का नागा पंथ के अनुसार जल प्रवाह कर अंतिम संस्कार किया गया।