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Kanpur News: पंडित कालूराम शास्त्री स्मारक नाट्य मंच पर 150 वर्ष होती आ रही रामलीला

Sat, 10 Oct 2026 01:12 AM IST
कानपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कानपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, कानपुर Updated Sat, 10 Oct 2026 01:12 AM IST
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Ramlila has been taking place for 150 years on the Pandit Kaluram Shastri Memorial Theatre Stage.
पुखरायां। अमरौधा की रामलीला का इतिहास करीब 150 साल पुराना है। वर्ष 1880 में शुरू हुई पंडित कालूराम शास्त्री स्मारक नाट्य मंच की रामलीला कभी स्थानीय कलाकारों के अभिनय, संवाद और अनूठे अंदाज के लिए पहचानी जाती थी। राम, लक्ष्मण, रावण, हनुमान से लेकर हास्य कलाकारों तक की भूमिकाएं कस्बे के लोग ही निभाते थे। समय बदला तो कलाकारों की पीढ़ियां भी बिखर गईं।
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अमरौधा की रामलीला का मंचन पंडित कालूराम शास्त्री के मंच पर होता रहा है। शुरुआती दौर में स्थानीय कलाकार ही रामलीला और नाटकों का मंचन करते थे। यह परंपरा किसी एक परिवार तक सीमित नहीं थी, बल्कि कस्बे के कई परिवारों के लोग अलग-अलग पात्रों का अभिनय करते थे। वर्ष 1970 के दशक तक आते-आते रामलीला के मंचन की जिम्मेदारी मनोराम बाजपेयी और हरिराम बाजपेयी ने संभाली। इसके बाद राम, लक्ष्मण, व्यास और नृत्य कलाकारों के लिए बाहर से कलाकार बुलाए जाने लगे। हालांकि, स्थानीय कलाकारों का जुड़ाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।
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रामलीला के पुराने कलाकारों में अमरौधा के हुब्बलाल यादव रावण की भूमिका अपने दमदार स्वर और खास अंदाज में निभाते थे। बलभद्र अग्रवाल और सिपाहीलाल अग्रवाल भी रावण का अभिनय करते रहे। धनुष यज्ञ के दौरान दुर्गा प्रसाद गुप्ता उर्फ बाबा छाप वाले रावण और रघुवर श्रीवास्तव बाणासुर की भूमिका निभाते थे। पुखरायां के देवी प्रसाद विश्वामित्र और गुरु वशिष्ठ के पात्रों में नजर आते थे। अरुण दीक्षित भरत की भूमिका करते थे। उनके झांसी में रहने के बाद यह जिम्मेदारी उनके भतीजे प्रियंक दीक्षित ने संभाली। प्रियंक आज भी भरत का अभिनय करते हैं। लक्ष्मण शक्ति प्रसंग में वह राम की भूमिका भी निभा लेते हैं।
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70 के दशक में रामशंकर तिवारी और सुंदरलाल अग्निहोत्री हास्य कलाकार के रूप में दर्शकों का मनोरंजन करते थे। विनोद बाजपेयी की टीम रामलीला के समापन पर नाटक का मंचन करती थी। कैलाश गुप्ता किसी भी पात्र की भूमिका निभाने में माहिर थे जबकि रामभरोसे सरल जनक का अभिनय करते थे। महावीर प्रजापति भी अलग-अलग पात्रों का अभिनय करते थे। लल्लूजी टंडन और भोलाजी टंडन बाली और सुग्रीव की भूमिका निभाते थे। कस्बे के पहले अध्यक्ष त्रिलोकी नाथ टंडन ने भी एक बार ताड़का का पात्र निभाया था।
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कलाकार बदले, लेकिन परंपरा से जुड़ाव बरकरार
अमरौधा की रामलीला की खासियत यह रही कि इसमें अलग-अलग परिवारों के लोग अपनी रुचि और प्रतिभा के अनुसार पात्रों का अभिनय करते थे। किसी ने रावण बनकर पहचान बनाई तो किसी ने हास्य अभिनय, संगीत और मंच संचालन के जरिये रामलीला को आगे बढ़ाया। समय के साथ स्थानीय कलाकारों की संख्या घटती गई और बाहरी कलाकारों पर निर्भरता बढ़ी। इसके बावजूद पुराने कलाकारों की यादें और उनके अभिनय के किस्से आज भी इस रामलीला की पहचान का हिस्सा हैं।
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रावण का पुतला दहन एकादशी को किए जाने की परंपरा
पंडित कालूराम शास्त्री नाट्य मंच समिति के अध्यक्ष हुब्बलाल यादव है। जबकि रामलीला के अध्यक्ष विकास मिश्रा हैं। कमल मेहरोत्रा, अनूप ओम गुप्ता, ललित गुप्ता है। जिन्होंने बताया कि अमरौधा में रावण दहन विजया दशमी के अगले दिन एकादशी को किए जाने की परंपरा है। आज भी यह परंपरा कायम है।
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फोटो-25- कपिल टंडन अमरौधा। संवाद
कपिल टंडन ने बताया की पहले स्थानीय कलाकार इसमें शामिल होते थे और बाहर से कोई कलाकार नहीं बुलाए जाते थे। अब समय के बदलते दौर में सभी कलाकार बाहर से बुलाए जाते है। स्थानीय केवल एक या दो कलाकार ही सम्मिलित होते हैं। वह भी विशेष दिन।

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फोटो-26-विकास मिश्रा रामलीला कमेटी अध्यक्ष
अमरौधा रामलीला कमेटी अध्यक्ष विकास मिश्र ने बताया कि दशहरा रामलीला आयोजन की जिम्मेदारी का यह पांचवां वर्ष है। सभी के सहयोग निभा रहा हूं। अमरौधा में आज भी पारंपरिक रूप से ही आयोजन किया जाता है। बस स्थानीय कलाकारों की कमी खलती है।
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