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भूल सरकारी, किसानों के हक पर आरी
ब्यूरो/अमर उजाला, कानपुर देहात
Updated Wed, 25 Mar 2015 01:29 AM IST
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सरकार की एक भूल ने किसानों के हक पर आरी ही चला दी। झींझक और तुरना में
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रेलवे ने डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर के तहत रेलवे लाइन निकालने के लिए भूमि
अधिग्रहण का गजट जारी कर राजस्व अभिलेखों में दर्ज ग्राम पंचायत के हिसाब
150 किसानों को मुआवजे के चेक थमा दिए।
किसानों को जब पता चला उनका गांव नगर पंचायत में दर्ज नहीं है तो वे लेखपाल से डीएम तक और फिर प्रदेश में राजस्व विभाग से मुख्यमंत्री की चौखट तक पहुंचे। कई प्रयासों के बाद गांव तो नगर पंचायत में शामिल कर लिया गया, पर रेलवे अपने पुराने गजट पर अड़ा रहा। किसानों को उनका संशोधित मुआवजा नहीं दिया गया।
बता दें कि झींझक नगर पंचायत 11 जनवरी 1916 को ब्रितानी हुकूमत में सृजित की गई थी। इसका सीमा विस्तार सामान्य प्रशासन विभाग उत्तर प्रदेश के शासनादेश पर 17 नवंबर 1972 को किया गया था। सीमा विस्तार में ग्राम झींझक की 53, तुरना की 59, टिकनगांव की 58 गाटा संख्याओं शामिल कर लिया गया।
इन गांवों के किसान 1972 के इस सीमा विस्तार से नगर पंचायत में शामिल हो गए और उन्हें नगर पंचायत में चेयरमैन व सभासद के चुनावों में वोटिंग का अंधिकार भी मिल गया। जब बात जमीनों के मुआवजे की आई तो उन्हें राजस्व विभाग की लापरवाही का नुकसान उठाना पड़ा। विभाग ने 1972 के इस सीमा विस्तार को राजस्व अभिलेखों में दर्ज नहीं किया था। रेलवे ने इन जमीनों के अधिग्रहण का गजट जारी किया तो ये जमीनें ग्रामसभा में दर्ज थीं और किसानों को उसी के हिसाब मुआवजा दे दिया।
झींझक रेलवे स्टेशन हावड़ा-दिल्ली रूट पर है। इसी रूट पर डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर का निर्माण किया जा रहा है। इसी कॉरिडोर में झींझक की इन जमीनों का रेलवे ने दो बार गजट जारी कर वर्ष 2008 और 2010 में अधिग्रहण भी किया है। रेलवे ने गजट के बाद जब अधिग्रहण प्रक्रिया शुरू कर खेतों में हदबंदी शुरू की तो किसानों ने इसका विरोध कर कब्जा नहीं लेने दिया।
किसान अब्दुल जब्बार ने सबसे पहले अपनी जमीनों के नगर पंचायत के हिसाब से मुआवजे की मांग को तहसील दिवसों में और एसडीएम, जिलाधिकारी और कमिश्नर के पास तक शिकायत तक की। जब मामले की सुनवाई कार्रवाई तक नहीं पहुंची तो वे सूबे के राजस्व विभाग भी गए। यहां पर भी कोई कार्रवाई न होती देख मुख्यमंत्री के जनता दर्शन के कार्यक्रम में गुहार लेकर वर्ष 2012 से लेकर 2014 तक तीन बार गए।
सीएम के जनता दर्शन कार्यक्रम में शिकायत पहुंचने पर विभाग हरकत में आया और उपसचिव ने जिलाधिकारी कानपुर देहात को एक नवंबर 2014 को झींझक, तुरना और टिकनगांव को नगर पंचायत में दर्ज करने के निर्देश दिए।
डीएम के निर्देश पर एसडीएम डेरापुर ने 25 नवंबर 2014 को इन छूटे तीनों गांवों को नगर पंचायत में दर्ज कर दिया।
इस आदेश से राजस्व विभाग ने 42 साल पुरानी अपनी इस भूल का सुधार तो कर लिया, लेकिन किसानों की मुआवजे की लड़ाई यहीं खत्म नहीं हुई। किसान अब रेलवे से दोबारा गजट जारी करने की मांग कर रहे हैं।
गांव के कैलाश चंद्र, केशव प्रसाद, राजेश्वरी, अखिलेश, सर्वेश तिवारी, अवधेश तिवारी, प्रेमलता, प्रेमचंद्र पोरवाल, कुलदीप, हरीकिशन, अरिंवद कुमार, अनिल कुमार, रामकिशन, विनम्र कुमार गुप्ता, राजनरायण शर्मा, चंद्रशेखर तिवारी, रामप्रसाद राजपूत समेत 150 किसान रेलवे अधिकारियों और प्रधानमंत्री तक को पत्र भेजकर दोबारा गजट जारी कर नगर पंचायत के हिसाब मुआवजे की मांग कर रहे हैं।
किसानों का कहना है कि जब वे रेलवे के इन अफसरों से मिले तो उन्होंने कहा कि वे अदालत का दरवाजा खटखटाएं।
किसानों को जब पता चला उनका गांव नगर पंचायत में दर्ज नहीं है तो वे लेखपाल से डीएम तक और फिर प्रदेश में राजस्व विभाग से मुख्यमंत्री की चौखट तक पहुंचे। कई प्रयासों के बाद गांव तो नगर पंचायत में शामिल कर लिया गया, पर रेलवे अपने पुराने गजट पर अड़ा रहा। किसानों को उनका संशोधित मुआवजा नहीं दिया गया।
बता दें कि झींझक नगर पंचायत 11 जनवरी 1916 को ब्रितानी हुकूमत में सृजित की गई थी। इसका सीमा विस्तार सामान्य प्रशासन विभाग उत्तर प्रदेश के शासनादेश पर 17 नवंबर 1972 को किया गया था। सीमा विस्तार में ग्राम झींझक की 53, तुरना की 59, टिकनगांव की 58 गाटा संख्याओं शामिल कर लिया गया।
इन गांवों के किसान 1972 के इस सीमा विस्तार से नगर पंचायत में शामिल हो गए और उन्हें नगर पंचायत में चेयरमैन व सभासद के चुनावों में वोटिंग का अंधिकार भी मिल गया। जब बात जमीनों के मुआवजे की आई तो उन्हें राजस्व विभाग की लापरवाही का नुकसान उठाना पड़ा। विभाग ने 1972 के इस सीमा विस्तार को राजस्व अभिलेखों में दर्ज नहीं किया था। रेलवे ने इन जमीनों के अधिग्रहण का गजट जारी किया तो ये जमीनें ग्रामसभा में दर्ज थीं और किसानों को उसी के हिसाब मुआवजा दे दिया।
झींझक रेलवे स्टेशन हावड़ा-दिल्ली रूट पर है। इसी रूट पर डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर का निर्माण किया जा रहा है। इसी कॉरिडोर में झींझक की इन जमीनों का रेलवे ने दो बार गजट जारी कर वर्ष 2008 और 2010 में अधिग्रहण भी किया है। रेलवे ने गजट के बाद जब अधिग्रहण प्रक्रिया शुरू कर खेतों में हदबंदी शुरू की तो किसानों ने इसका विरोध कर कब्जा नहीं लेने दिया।
किसान अब्दुल जब्बार ने सबसे पहले अपनी जमीनों के नगर पंचायत के हिसाब से मुआवजे की मांग को तहसील दिवसों में और एसडीएम, जिलाधिकारी और कमिश्नर के पास तक शिकायत तक की। जब मामले की सुनवाई कार्रवाई तक नहीं पहुंची तो वे सूबे के राजस्व विभाग भी गए। यहां पर भी कोई कार्रवाई न होती देख मुख्यमंत्री के जनता दर्शन के कार्यक्रम में गुहार लेकर वर्ष 2012 से लेकर 2014 तक तीन बार गए।
सीएम के जनता दर्शन कार्यक्रम में शिकायत पहुंचने पर विभाग हरकत में आया और उपसचिव ने जिलाधिकारी कानपुर देहात को एक नवंबर 2014 को झींझक, तुरना और टिकनगांव को नगर पंचायत में दर्ज करने के निर्देश दिए।
डीएम के निर्देश पर एसडीएम डेरापुर ने 25 नवंबर 2014 को इन छूटे तीनों गांवों को नगर पंचायत में दर्ज कर दिया।
इस आदेश से राजस्व विभाग ने 42 साल पुरानी अपनी इस भूल का सुधार तो कर लिया, लेकिन किसानों की मुआवजे की लड़ाई यहीं खत्म नहीं हुई। किसान अब रेलवे से दोबारा गजट जारी करने की मांग कर रहे हैं।
गांव के कैलाश चंद्र, केशव प्रसाद, राजेश्वरी, अखिलेश, सर्वेश तिवारी, अवधेश तिवारी, प्रेमलता, प्रेमचंद्र पोरवाल, कुलदीप, हरीकिशन, अरिंवद कुमार, अनिल कुमार, रामकिशन, विनम्र कुमार गुप्ता, राजनरायण शर्मा, चंद्रशेखर तिवारी, रामप्रसाद राजपूत समेत 150 किसान रेलवे अधिकारियों और प्रधानमंत्री तक को पत्र भेजकर दोबारा गजट जारी कर नगर पंचायत के हिसाब मुआवजे की मांग कर रहे हैं।
किसानों का कहना है कि जब वे रेलवे के इन अफसरों से मिले तो उन्होंने कहा कि वे अदालत का दरवाजा खटखटाएं।