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नमाज और रोजे की तरह जकात अदा करना भी है फर्ज : इमाम

Sat, 28 Feb 2026 01:02 AM IST
कानपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कानपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, कानपुर Updated Sat, 28 Feb 2026 01:02 AM IST
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Paying Zakat is as obligatory as Namaz and Roza: Imam
राजपुर (कानपुर देहात)। मुकद्दस रमजान माह में अल्लाह की रजामंदी के लिए मुस्लिम लोग रोजा रखने के साथ-साथ पांच वक्त की नमाज भी अदा कर रहे हैं। मुबारक महीने के दूसरे जुमे पर शुक्रवार को नमाज अदा करने के लिए लोगों की भीड़ मस्जिदों में उमड़ी। उलेमाओ ने जकात और फितरा मुल्क में अमन चैन की दुआ की।
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उलेमाओं ने रमजान माह में रोजे नमाज की तरह जकात को भी फर्ज बनाया है। बताया गया कि जकात का मतलब दान देना है। अपनी आय के एक हिस्से को गरीबों में बांटने को ही जकात कहा जाता है। नमाज और रोजे की तरह जकात को भी मुसलमानों पर फर्ज किया हैं। खजूर वाली मस्जिद के इमाम हाफिज मुजीब रजा ने बताया कि साढे़ बावन तोला चांदी या फिर साढ़े सात तोला सोना या इसके बराबर की रकम जिस मुसलमान के पास है। उस पर जकात देना फर्ज हो जाता है।
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एक साल का समय बीत जाने के बाद जकात दी जाती है। हर साल जकात देना फर्ज होता हैं। जकात को पूरे साल भर में कभी भी दिया जा सकता है, लेकिन अधिकतर जकात को रमजान माह में दिया जाता है। इस माह में जकात देने से ज्यादा सवाब (पुण्य) मिलता है। जकात का सबसे पहला फर्ज अपने रिश्तेदारों, पड़ोसियों पर है। आपके रिश्तेदारों में कोई गरीब है तो उसको जकात दिया जा सकता है। पड़ोस में रहने वाले गरीब, यतीम, विधवा महिलाओं को जकात दी जा सकती है।
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इसके अलावा मदरसों जहां पर बाहर के और यतीम बच्चे पढ़ते हो, वहां पर भी जकात को दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि गरीब और बेसहारा लोगों को जकात देनी चाहिए। ऐसे लोगों को जकात देना बहुत बड़ा सवाब (पुण्य) का काम है। लोग जरूरत से ज्यादा खर्च न करें और गरीब बेसहारा लोगों की मदद करते रहें। नमाज के बाद मुल्क में अमन भाईचारा व खुशहाली की दुआ की गई। इसी तरह राजपुर, सट्टी, अफसरिया, जल्लापुर, पीतमपुर, रसधान, रमऊ समेत क्षेत्र की सभी मस्जिदों में सकुशल जुमे की नमाज अदा की गई।
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