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‘मैं तो रेहान को इंसाफ दिलाने के लिए लड़ रहा था पुलिस ने मुझे ही हत्याकांड में फंसा डाला’
टीम डिजिटल, अमर उजाला, कानपुर
Updated Fri, 29 Sep 2017 12:30 PM IST
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रेहान हत्याकांड के आरोप में बरी जय प्रताप की कहानी
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मैं बीसीए की पढ़ाई कर रहा था। भविष्य के सुनहरे सपने संजो रहा था। तब मेरी उम्र 19 साल थी। घर में ऐसी कोई परेशानी नहीं थी कि मुझे किसी बात की कोई चिंता हो। जूही लाल कालोनी में खुद का मकान था। पिता भगवान सिंह एयर फोर्स में वारंट अफसर हैं, बड़ा भाई रोहित इंजीनियर है। घर में सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था। केवल अपने भविष्य की चिंता थी। बीसीए करने के बाद एमसीए कर किसी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी पाने का सपना देख रहा था, लेकिन 26 अगस्त-2016 को पुलिस ने मेरी उड़ान पर ब्रेक लगा दिया। अचानक मेरे जीवन में एक तूफान आया, जिसने सब कुछ बर्बाद कर दिया। मैं रेहान की हत्या के मामले में जेल पहुंचा दिया गया, जबकि घटना दूर-दूर तक मेरा कोई वास्ता नहीं था। इस घटना ने मेरी मासूमियत छीन ली, मुझे समय से पहले परिपक्व बना दिया। 391 दिन तक जेल में रहा, क्या-क्या अनुभव नहीं हुए। एक अच्छी बात यह कि गलत का विरोध करना भी सीख गया। अब कोई गलत करेगा तो हर स्तर पर विरोध करूंगा, चाहे वह मेरे या किसी दूसरे के साथ हो।
ये कहानी है कानपुर के बीसीए छात्र जय प्रताप सिंह की। दस साल के बच्चे की हत्या में जय को कानपुर कोर्ट ने दोषमुक्त करार दिया है। कोर्ट ने विवेचक के खिलाफ कार्रवाई के लिए डीजीपी को पत्र भी लिखा है। यह छात्र बच्चे की हत्या के बाद से ही जेल में था। उसे जमानत तक नहीं मिली थी। वह एक साल जेल में रहा। गिरफ्तारी के समय भी छात्र और परिजन बार-बार कहते रहे कि उसे निर्दोष फंसाया जा रहा है, आला अफसरों से भी गुहार की लेकिन पुलिस ने किसी की नहीं सुनी और उसे ही हत्यारोपी बताते हुए जेल भेज दिया था। अब बरी होने के बाद छात्र ने कहा है कि पुलिस ने उसका करियर बर्बाद कर दिया। उसके जीवन का महत्वपूर्ण एक साल बर्बाद हो गया।
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ये कहानी है कानपुर के बीसीए छात्र जय प्रताप सिंह की। दस साल के बच्चे की हत्या में जय को कानपुर कोर्ट ने दोषमुक्त करार दिया है। कोर्ट ने विवेचक के खिलाफ कार्रवाई के लिए डीजीपी को पत्र भी लिखा है। यह छात्र बच्चे की हत्या के बाद से ही जेल में था। उसे जमानत तक नहीं मिली थी। वह एक साल जेल में रहा। गिरफ्तारी के समय भी छात्र और परिजन बार-बार कहते रहे कि उसे निर्दोष फंसाया जा रहा है, आला अफसरों से भी गुहार की लेकिन पुलिस ने किसी की नहीं सुनी और उसे ही हत्यारोपी बताते हुए जेल भेज दिया था। अब बरी होने के बाद छात्र ने कहा है कि पुलिस ने उसका करियर बर्बाद कर दिया। उसके जीवन का महत्वपूर्ण एक साल बर्बाद हो गया।
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रेहान को इंसाफ दिलाने के लिए कैंडल मार्च में हुआ था शामिल
जय प्रताप की कहानी
जय ने बताया कि 20 अगस्त को रेहान की हत्या हुई थी। 21 अगस्त को रेहान को इंसाफ दिलाने के लिए निकाले गए कैंडल मार्च में मैं बड़े भाई रोहित के साथ शामिल हुआ था। तब नहीं मालूम था कि पुलिस मुझे ही हत्याकांड में फंसाने का तानाबाना बुन रही है। 26 अगस्त की शाम 6:30 बजे पुलिस ने मुझे और रोहित को घर से पकड़ा था। पहले किदवई नगर थाने ले जाया गया।
वहां हल्की पूछताछ के बाद रोहित को छोड़ दिया गया। फिर मुझे बाबूपुरवा थाने, सीओ बाबूपुरवा के दफ्तर, जूही थाने में रखा गया। पराग डेयरी पुलिस चौकी, जूही थाने और साकेत नगर स्थित एक होटल के 203 नंबर कमरा में रखकर टार्चर किया गया। तत्कालीन सीओ (अपराध) विवेक त्रिपाठी, बाबूपुरवा थानाध्यक्ष एकेसिंह और किदवई नगर एसओ हरिशंकर मिश्रा समेत कई अफसरों की मौजूदगी में पुलिस वालों ने जुर्म कबूल कराने के लिए मुझे डंडे, चमड़े के पट्टे से जमकर पीटा। इससे मेरे कंधे, कोहनी, घुटने में चोट आई थी। जबड़ा और कान के पास की हड्डी टूट गई थी।
पुलिस ने 31 अगस्त-2016 को कोर्ट में पेश करने केबाद मुझे जेल भेजा था। पिटाई के कारण एक हफ्ते तक जेल में उठने-बैठने और खाने को मोहताज हो गया था। केवल पानी पीकर जीवित रहा। जेल के भीतर जाते ही मैं खूब रोया। चारों तरफ दीवारें नजर आ रही थीं। माहौल भी ऐसा नहीं था कि मैं अपने मन की बात किसी से कह सकता। सभी लोग किसी न किसी अपराध में जेल में बंद थे। मुझे बैरक नंबर-13 में रखा गया। तीन दिन तक बैरक में नींद नहीं आई। फिर मन को मबजूत किया। कुछ बंदियों से दोस्ती की और उन लोगों से बातचीत कर अपने मन को हल्का किया। फिर जेल केतौर तरीके सीखे और धीरे-धीरे सब कुछ ढर्रे पर आ गया। जेल अफसरों ने मुझसे बातचीत की। कहा कि परेशान न होना, अगर कोई दिक्कत होगी तो हम लोगों को बताना।
वहां हल्की पूछताछ के बाद रोहित को छोड़ दिया गया। फिर मुझे बाबूपुरवा थाने, सीओ बाबूपुरवा के दफ्तर, जूही थाने में रखा गया। पराग डेयरी पुलिस चौकी, जूही थाने और साकेत नगर स्थित एक होटल के 203 नंबर कमरा में रखकर टार्चर किया गया। तत्कालीन सीओ (अपराध) विवेक त्रिपाठी, बाबूपुरवा थानाध्यक्ष एकेसिंह और किदवई नगर एसओ हरिशंकर मिश्रा समेत कई अफसरों की मौजूदगी में पुलिस वालों ने जुर्म कबूल कराने के लिए मुझे डंडे, चमड़े के पट्टे से जमकर पीटा। इससे मेरे कंधे, कोहनी, घुटने में चोट आई थी। जबड़ा और कान के पास की हड्डी टूट गई थी।
पुलिस ने 31 अगस्त-2016 को कोर्ट में पेश करने केबाद मुझे जेल भेजा था। पिटाई के कारण एक हफ्ते तक जेल में उठने-बैठने और खाने को मोहताज हो गया था। केवल पानी पीकर जीवित रहा। जेल के भीतर जाते ही मैं खूब रोया। चारों तरफ दीवारें नजर आ रही थीं। माहौल भी ऐसा नहीं था कि मैं अपने मन की बात किसी से कह सकता। सभी लोग किसी न किसी अपराध में जेल में बंद थे। मुझे बैरक नंबर-13 में रखा गया। तीन दिन तक बैरक में नींद नहीं आई। फिर मन को मबजूत किया। कुछ बंदियों से दोस्ती की और उन लोगों से बातचीत कर अपने मन को हल्का किया। फिर जेल केतौर तरीके सीखे और धीरे-धीरे सब कुछ ढर्रे पर आ गया। जेल अफसरों ने मुझसे बातचीत की। कहा कि परेशान न होना, अगर कोई दिक्कत होगी तो हम लोगों को बताना।
त्योहार पर बहुत उदास होता था
जय प्रताप के वकील नागेंद्र सिंह
त्योहार पर परिजनों से दूर जेल में रहना काफी खलता था। परिजन मुलाकात करने जेल आते थे। परिजनों के जाने के बाद लगता था कि खुदकुशी कर लूं, ताकि परिजनों और उसकी खुद की परेशानी दूर हो जाए। बंदी दोस्त बन गए थे। जब मन उदास होता था तो वे लोग समझाते थे। सब मिलकर त्योहार मानते थे, जिससे किसी को भी परिवार की कमी न खले।
बेच दिया मकान
मेरे जेल जाने के बाद मुहल्ले के लोगों और रिश्तेदारों ने परिजनों से दूरियां बना ली थीं। मुहल्ले केलोगों का व्यवहार बदल गया था। इस वजह से पिता ने करीब आठ महीने पहले मकान बेच दिया था। पिता तो दिल्ली में रहकर नौकरी करते हैं। मां-भाई और मैं अब एक रिश्तेदार के घर में रहकर जीवन बिता रहे हैं।
बेच दिया मकान
मेरे जेल जाने के बाद मुहल्ले के लोगों और रिश्तेदारों ने परिजनों से दूरियां बना ली थीं। मुहल्ले केलोगों का व्यवहार बदल गया था। इस वजह से पिता ने करीब आठ महीने पहले मकान बेच दिया था। पिता तो दिल्ली में रहकर नौकरी करते हैं। मां-भाई और मैं अब एक रिश्तेदार के घर में रहकर जीवन बिता रहे हैं।
कुछ दिन घूमने जाऊंगा, फिर सोचूंगा क्या करना है
रेहान की फाइल फोटो
बुधवार को मेरी रिहाई का आदेश जेल पहुंचा, तो आंसू छलक आए। अभी तो यकीन नहीं हो रहा है कि रिहा हो गया हूं। बुधवार रात घर में नींद नहीं आई। रातभर जागता रहा। सुबह पांच बजे खुद ब खुद नींद खुल गई, लगा कि जेल में हूं और गिनती के लिए लाइन में खड़ा होना है। अभी तक जेल की गतिविधियों और बंदियों के बीच से खुद को बाहर नहीं कर पाया है। अब कुछ दिन शहर के बाहर घूमने जाऊंगा। दिमाग सही होने के बाद सोचूंगा कि आगे पढ़ाई के साथ क्या करना है।