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Kanpur News: अब आंसुओं की बाढ़ और दुश्वारियों के पहाड़

Mon, 04 Aug 2025 12:02 AM IST
कानपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कानपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, कानपुर Updated Mon, 04 Aug 2025 12:02 AM IST
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Now there are floods of tears and mountains of sorrow
चकरनगर। चंबल नदी का जलस्तर बीते 24 घंटे में करीब पांच मीटर घट गया है लेकिन पानी अभी भी खतरे के निशान से 19 सेंटीमीटर ऊपर बह रहा है। पानी पांच मीटर घटने के बावजूद बाढ़ प्रभावित गांवों के हालात जस के तस बने हुए हैं।
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ककरैया, भरेह, हरौली बहादुरपुर,रनिया, खिरीटी, नीमाडाड़ा, गुरभेली, कचहरी चकरपुरा गांव में घरों के भीतर पानी भर गया था। भरेह व पचनद क्षेत्र में करीब 150 परिवार बेघर हो गये हैं वहीं कुछ लोग मजबूरी में छतों पर दिन-रात बिता रहे हैं। घरों से पानी निकलने के बाद लोग टीलों पर लगाए टेंट से वापस घरों में पहुंच रहे हैं लेकिन घर में रहने के लिए अभी उन्हें कई दिन मेहनत करनी पड़ेगी। घरों के अंदर से पानी तो निकल गया है लेकिन घर कीछड़ से लबालब हैं। वहीं प्रशासन से राहत सामग्री न मिलने से लोग अब खाने पीने काे मोहताज हो रहे हैं।
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हरौली गांव के प्रधान मनीष दीक्षित के अनुसार गांव के 15 परिवार ऐसे हैं जो टीले पर पन्नी का टेंट बनाकर रह रहे हैं। वहीं लगभग 60 परिवार ऐसे हैं जो घरों की छत पर अपना सामान रखकर गुजर कर रहे हैं।
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टीले पर टेंट में रहे रहे दिनेश कठेरिया, संतोष दोहरे, छोटे दोहरे, रामबरन सिंह, रामदास, राजेश कुमार, मनोज, जवाहर लाल, वीर सिंह, सियाराम, अशोक दोहरे, राकेश कठेरिया आदि ने प्रशासन पर आरोप लगाते हुए कहा कि एक सप्ताह से वह सब बेघर हैं और उनके पास खाने को पर्याप्त राशन भी नहीं है। इसके बाद भी कोई मदद नहीं मिली। सिर्फ रविवार को लेखपाल कुछ खाने के पैकेट लेकर पहुंचे तो इससे गुस्साए ग्रामीणों ने उन्हें लेने से मना कर दिया। ग्रामीणों ने बताया कि उनके मवेशी बीमार होने लगे हैं। इसके बाद भी उनके इलाज की कोई व्यवस्था नहीं की गई है। ककरैया गांव के राजेश ने बताया कि उनके पास राशन और सूखी लकड़ियां खत्म हो गई हैं। गीली लकड़ियों से मुश्किल से चूल्हा जलाकर खाना बना रहे हैं।


खिरीटी के प्रमोद तिवारी ने बताया कि पूरा मजरा पानी में डूब गया था। लोगों के पास एक-दो दिन का राशन ही बचा है। यदि प्रशासन जल्द मदद नहीं करता तो लोग दाने दाने को मोहताज हो जाएंगे। ककरैया के ही राजू ने बताया कि यमुना का पानी उनकी झोपड़ी में घुस गया है। वह डेढ़ किलोमीटर दूर तंबू में रह रहे हैं। बारिश के कारण ईंधन भीग गया है। नमक और तेल के बिना अधपका खाना बनाकर किसी तरह चार सदस्यों का पेट भर रहे हैं। राशन लगभग खत्म हो चुका है लेकिन कोई प्रशासनिक मदद नहीं मिली है। यही नहीं लोगों के पास मवेशियाें को खिलाने के लिए चारा भी नहीं हैं जिससे यह जानवर भी बीमार होने लगे हैं।
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